गुरुवार, 6 अगस्त 2009

ब्लागर्स पार्क में रिसते रिश्ते

वो डरते हैं कि रिश्तों के रिसाव से जुडा सच, उनकी निजता को भंग कर देगा |वो डरते हैं अपनी पहचान बताने में !उन्हें डर हैं अभिव्यक्ति पर रिश्तों के गहराते असर से !उन्हें लगता है सच के सामने आने से उनकी बेबाकी ,बेईमानी में तब्दील होकर सबके सामने आ जायेगी !मुझे आज ब्लोगिंग करते करीब ६ महीने हो गए ,.पिछले ३-४ दिनों से पहले मित्र सुरेश चिपलूनकर के अपने ब्लॉग और फिर विवेक भाई की चिटठा चर्चा में की गयी पोस्टिंग प्रकाशित होने के बाद ,यहाँ इन्टरनेट पर और इन्टरनेट के बाहर मेरी अपनी दुनिया में जो जो मैंने सुना ,समझा और पढ़ा ,यकीं मानिए मुझे बेहद हताश करता है |हमने कभी कहा नहीं लेकिन ये सच है कि यहाँ हिंदी ब्लाग्स की दुनिया में भी ,समय के साथ साथ नए नए किस्म के रिश्ते ,समुदाय और ग्रुप पनप रहे हैं ,ये रिश्ते उन रिश्तों से अलग हैं जिनकी चर्चा विवेक सिंह ने की है | ये सिर्फ दुनिया से अलग गांव बसाने वाली जैसी बात नहीं है बल्कि उन गांवों में कई टोले बनाने जैसा है ,इसके बावजूद टुकडों टुकडों में बटें टोलों के लोग जो आज लिख रहे हैं वो हिंदुस्तान के इतिहास में अभिव्यक्ति का सबसे प्रभावशाली अध्याय है ,यहाँ न सिर्फ बेहद साफगोई से निजता बांटी जा रही है ,बल्कि खुद को १०० फीसदी उडेला जा रहा है |मगर ये भी सच है कि इन रिश्तों ने समय के साथ साथ संगठित होकर दूसरे टोलों पर वार करने का शर्मनाक तरीका सीख लिया है,पहले समानांतर मीडिया में और हिंदी साहित्यकारों के बीच ही ऐसा होता था |

अगर आज किसी को निजता के सामने आने से डर है तो उसकी वजह भी सिर्फ यही प्रतिघात है |ऐसे में होता ये है कि बहुत कुछ ऐसा पढ़ा नहीं जा पाता जिनको पढना और न सिर्फ पढना बल्कि उन ब्लाग्स के कंटेंट में खुद को शामिल करना ,हमारी नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए थी |मैं नाम नहीं लेना चाहूँगा अभी पिछले दिनों एक ब्लॉगर साथी की एक अश्लील पोस्टिंग पर को लेकर जबरदस्त अभियान छेड़ दिया गया ,हुआ यहाँ तक कि पहले काउंटर पोस्टिंग छपी गयी फिर फ़ोन कर करके उस ब्लॉगर के खिलाफ कमेन्ट मांगे गए ,मैं भी वैसी पोस्टिंग से दुखी हुआ था ,पर क्या ये ठीक नहीं होता कि उन्हें एक मेल करके उनसे पोस्टिंग हटा लेने को कहा जाता न कि तथाकथित तौर पर खुद को नारीवादी साबित करने के लिए उसे बहिष्कृत करने की साजिश की जाती |अगर चिटठा चर्चा में छपी विवेक सिंह की चर्चा निजी है तो उस ब्लोगर के खिलाफ छेडा गया अभियान उसकी निजता के साथ किया गया बलात्कार था |
मैं अपने एक ब्लोगर साथी को कभी भूल नहीं पाता जिसने मुझे मेरी पहली पोस्टिंग के वक़्त कहा था कि 'अगर तलवार न हो मुनासिब तो ब्लॉग निकालो '|मुझे याद है मेरा वो मुस्लिम दोस्त बटाला हाउस काण्ड के बाद निर्दोषों के खिलाफ की गयी कार्यवाही को लेकर अपने ब्लॉग पर की गयी पोस्टिंग का जिक्र करते वक़्त रो पड़ा था ,उसने कहा था कि हमने अपने ब्लॉग में कुछ भी निजी नहीं रखा ,मेरा सब कुछ सबके लिए है ,लेकिन शायद अब ये संभव न होसके ,ऐसे में अब ब्लॉग लिखना इमानदारी नहीं होगी ,आज उसने पिछले ६ महीने से एक भी पोस्टिंग नहीं की |मेरा मानना है कि अगर आप अपनी निजता के खोने के खतरे से इनते चिंतित हो तो घर बैठकर विभिन्न विषयों पर अपने मित्रों और रिश्तेदारों से चचाएँ कर लो ,ब्लॉग लिखने की आखिर क्या जरुरत ?वैसे ये भी बड़ा आश्चर्य है कि मित्र को मित्र ,पति को पति भाई को भाई और प्रेमी को प्रेमी मानना तमाम खतरे खडा कर देता है |अब ये तो मुनासिब नहीं है कि आप रिश्तों को बदल दोगे ,क्या फर्क पड़ जाता है अगर कविता वाचक्नवी की जगह रचना सिंह नारी को अपना ब्लाग कहती हैं या फिर रवि रतलामी ब्लागर्स के भीष्म पितामह हैं यहाँ समस्या सिर्फ निजता की नहीं है बल्कि ब्लागवाणी में खुद की टी.आर.पी और ब्लागरों के बीच मची घुड़दौड़ से भी जुडी हुई है |जिन में सभी खुद को और अपने टोलों को विजयी देखना चाह्ते हैं |आत्मप्रशंसा और अपने टोलों की प्रशंसा में अभिव्यक्ति ,अधूरी रह जाती है ,अगर मसला सिर्फ यहीं तक रहता तो ठीक था लेकिन उसके बाद शुरू होने वाला मल्लयुद्ध हमेशा निराशाजनक रहता है |

सच तो ये है सभी ब्लॉगर जानते हैं किसकी रीढ़ कितनी सीधी है ,जब कभी आप निजता को बचाने की कोशिश करते हैं तो वो कभी उदय प्रकाश ,कभी पिंक चड्ढी तो कभी आपकी टिप्पणियों के बहाने उघड जाती है और ऐसे किसी बहाने से निजता पर से पर्दा हटता रहता है |सभी अपनों और अपने जैसों को जानते हैं ,जो नहीं जानते हैं उन्हें जाने की कोशिश करनी चाहिए ,स्वतंत्रता और निजता दोनों साथ साथ नहीं रह सकते |और हाँ सुरेश जी इलेक्ट्रोनिक मीडिया के जिन नामचीन चेहरों के रिश्तों का अपने ब्लॉग में खुलासा किया है वो हिन्दू विरोधी हैं कि नहीं मैं ये नहीं जानता ,लेकिन हाँ उनके चेहरों से रिसती हुई पिब देख सकता हूँ ,जिस वक़्त महाराष्ट्र का सिरफिरा नेता हिंदी भाषियों को लाठी ,जूतों से पिटवाता है ठीक उस वक़्त राजदीप सरदेसाई मराठी भाषा में 'लोकमत 'चैनल शुरू कर देते हैं |खुद को निरपेक्ष और लिक से अलग दिखाने की निरंतर कोशिश में लगे प्रणब राय हिंदी ,हिन्दीभाषी पत्रकारों , हिंदी पढने वालों और हिंदी के कार्यक्रमों को देखने वालों पर अपनी अंग्रेजी सोच जबरन थोपकर और उन्हें दूसरे दर्जे पर रखकर ,अब तक की सबसे बड़ी सांस्कृतिक हत्या करते हैं |ये सब इसलिए है कि मीडिया का हिस्सा होकर भी इन लोगों ने खुद को भीड़ का हिस्सा नहीं बनाया |आज अगर वो हिस्सा होते तो शायद उनके रिश्तों से उनकी पहचान नहीं होती |ब्लॉगर साथियों ,हिंदी भाषियों की एक भारी भीड़ हमारे पीछे खड़ी है ,वो जरुरी नहीं कोई साहित्यकार ,कवि ,पत्रकार या लेखक हों ,उनमे वो लोग भी शामिल हैं ,जिनके होंठ अब तक सिले हुए थे और खुद को अभिव्यक्त न कर पाना उन्हें तिल तिल कर मार रहा था ,आइये उनको भी साथ लेकर चलें ,अपना सब कुछ बांटते हुए |जिनमे आपकी निजता भी शामिल है |

40 टिप्‍पणियां:

  1. अंकल आपकी सारी बातें सही है .बड़े अच्छे ओर साफ ढंग से कही गई है .उनमे काफ़ी सचाई भी है .बस एक बात थोडी करेक्ट कर दूँ जिन ब्लोगर को आप मेल भेजने की बात कर रहे है .उनकी बाद की पोस्ट देख लेते .उसमे एक घमंड था ,हुंकार था .

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  2. बहुत बढ़िया ऐसे लोगों को तो कतई छोड़ना ही नहीं चाहिये, सब टी.आर.पी. का खेल है।

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  3. इस ब्लोगिंग की दुनिया में अभी मैं नई हूँ, ज्यादा तो इस बारे में नहीं जानती हाँ जैसा आपने कहा "टोलों" का अनुभव अवश्य किया है,जो " मैं तुझे पन्त कहूँ तू मुझे निराला "की कहावत को चरितार्थ्र करते हैं.सच कहा आपने इस तरह का groupism साहित्यकारों में देखने को मिलता था और अब ब्लोगिंग की दुनिया में भी नजर आ रहा है.सच्चाई को उजागर करता हुआ बहुत ही शशक्त लेख लिखा है आपने आवेश जी! लगे रहिये शायद आप जैसे जागरूक लोगों की मुहिम ही कुछ रंग लाये.

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  4. आवेश भैया, आवेश में आने की ज़रूरत नहीं है....बस अपना काम करते चलिए...रास्ता खुद ब खुद बन जाएगा:)

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  5. बेहतरीन पोस्ट लिखी आपने

    मगर कुछ वाक्यांश पढ़ कर अचरज भी हुआ

    ""हुआ यहाँ तक कि पहले काउंटर पोस्टिंग छपी गयी फिर फ़ोन कर करके उस ब्लॉगर के खिलाफ कमेन्ट मांगे गए""

    ऐसा तो आज तक न देखा ना सूना

    रही बात ब्लॉग का "टोला" में बटने की तो ऐसा तो होना ही है पहले जब कुछ ब्लॉग थे लोग सबको पढ़ते थे,

    जैसे जैसे ब्लॉग की संख्या बढ़ रही है सबको पढना मुमकिन नहीं है इस लिए लोग अपनी पसंद के ब्लॉग को पढ़ना सुरु कर चुके है मई भी एक दिन में अधिकतम ७० से ८० ब्लॉग पढ़ पाटा हूँ जबकि प्रतिदिन austan ३०० ब्लॉग apdet हो रहे हैं

    venus kesari

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  6. कविता वाचान्वी -सुधारें ,कविता वाचक्नवी

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  7. आपकी कतरने देख कर 'काकेश की कतरने' याद आ गई.

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  8. इत्ता भी परेशान होने की जरूरत नहीं भाई। गुट्बाजी-उटबाजी सब धरी रह जाती है कुछ दिन में। जो अच्छा,मजेदार होता है वही पढ़ा जाता है।

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  9. उन्हें एक मेल करके उनसे पोस्टिंग हटा लेने को कहा जाता न कि तथाकथित तौर पर खुद को नारीवादी साबित करने के लिए उसे बहिष्कृत करने की साजिश की जाती |

    i was in japan when i made that post and before making that post i commented on the albelas post but since my comment got moderated i placed a entry on my blog and precisely i think you fail to understand the very meaning of the word bloging . why should we mail him personally , i am not intersted in having any personal relationship with him .

    क्या फर्क पड़ जाता है अगर कविता वाचक्नवी की जगह रचना सिंह नारी को अपना ब्लाग कहती हैं
    dont just go by what you read of viveks writings. I am the owner of Naari Blog and rest others are memebers . In joint blog one is owner and others members , I also moderate naari blog and ITS MY BLOG

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  10. खुद को नारीवादी साबित करने के लिए

    yae naarivaadi term kisnae aur kab baanayaa aur agar ashleeltaa kae khilaaf aavaj uthana galat haen to mujhe aap naarivadi yaa jis naam sae chaahey pukarey mujhe koi ujr nahin haen

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  11. Kisi bhi post par jab ham kisi kae parivaar ki jaankari saarvjanik kartey haen to google ko bhi us par aapti hotee haen . aap ek baar google kae niyam jarur padhey abuse chapter mae mil jaayegae
    aur aaj ki khabar bhi daekhae jahaan sunny deol ne fm par dava dhoka haen kyuki wo unkae naam sae spoof kar rahjey they

    kyaa kisi ko adhikaar haen kisi parivaar , vyakti vishaesh yaa smaudaay vishesh kae prati koi jaankari jo personal haen usko blogpar daalney kaa

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  12. पना सब कुछ बांटते हुए |जिनमे आपकी निजता भी शामिल है |

    aapkae profile mae to aapki aayu , aap kae ghar kaa pataa kuch nahin haen
    aap vivahit haen yaa aviviahit
    bhadaas kae yaswant kae dost haen ya mohalla kae avinaash kae dost
    aap kae maata pita kyaa kartey haen ityadi sab information daal dae
    nijtaa ki kyaa jarurat haen
    haen bandhu apni hi nahin dusro ki nijtaa ki bhi jarurat hotee haen

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  13. अनूप शुक्ल जी कि बातों पर ध्यान दें.. उनकी बातों में पिछले कई सालों का ब्लॉगिंग अनुभव उसमे मिला हुआ है..

    वैसे किसी को मिर्ची बहुत जल्दी लग जाती है.. :)
    (देखता हूँ कि इस बात से लगती है या नहीं? :D)

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  14. उफ़ यहाँ भी टीआरपी का खेल!!!!

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  15. जिसके कन्धे पर बन्दूक रखी जा रही है वह भला और समझदार व्यक्ति है,

    बिचौलियों के क्या मुँह लगना !

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  16. काउंटर पोस्टिंग और फ़ोन कर कर के उस ब्लॉगर के खिलाफ कमेन्ट मांगने का सिलसिला अभी भी जारी है?

    इस पर तो कोई बन्दूक नहीं चल रही। मतलब बात सही ही है।

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  17. हे हे हे हे मुझे नहीं पता था कि मेरे द्वारा उजागर किये गये मीडियाई रिश्ते, दूर तक जाकर किसी और प्रकार के रिश्तों के रिसाव में बदल जायेंगे… यानी अब चिठ्ठाचर्चा भी विवादों के घेरे में आ गया… क्या कहने…

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  18. आवेशित व्यक्ति ऊर्जा का केन्द्र होता है। आवेशित रहिए - इस पोस्ट में आप ने बहुत कुछ समेट दिया है।

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  19. आदरणीय रचना दीदी ,सादर प्रणाम ,आपकी प्रतिक्रिया मिली ,ख़ुशी हुई ,लेकिन गुस्से में दिया इसलिए निराशा भी ,आपकी प्रतिक्रिया से उपजे सवालों के जवाब देना मुझे लगता है जरुरी है
    १ -दीदी आपने कहा कि हमने अलबेला जी की पोस्ट पर कमेन्ट कियाथा ,मगर उन्होंने उसे हटा दिया ,दीदी हो सकता है उन्हें ऐसी प्रतिकिर्या की अपेक्षा न रही हो ,एक बहन बनकर मेल करने में क्या बिगड़ जाता ,मुझे विश्वास है वो हटा लेते |और दीदी ,ये क्यूँ कहा कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती आप उनसे ?किसी परिवार के सदस्य से कोई गलती हो जाए तो सीधे तलवार से गला काटना कहाँ का न्याय है |
    २ दीदी मुझे ये सुनकर बेहद अफ़सोस है कि आप 'नारी' ब्लॉग की मालकिन हैं और बाकी आपकी सहमति असहमति पर खुद को अभिव्यक्त करने वाले |आपकी ये बात सुनने से पहले मुझे लगा था 'नारी' ब्लॉग ऐसी महिलाओं का समूह है जहाँ सब एक दूसरे के हाँथ में हाँथ डाले महिला अधिकारों ,न्याय और अस्मिता के सवाल पर वैचारिक आन्दोलन कर रही हैं
    ३- ये तथाकथित नारीवाद ही है कि किसी एक व्यक्ति की पोस्ट पर अपनी सारी उर्जा खर्च करके अभियान चलाया जा रहा है ,जिस वक़्त और जिस दिन आपने अलबेला जी के खिलाफ अभियान शुरू किया ,ठीक उसी दिन असम की निशा सेट्टी जिस्मफरोशी के आरोप में छत्तीसगढ़ में पकड़ी गयी थी ,ये निशा शेट्टी देश की पूर्व एथलीट चैम्पियन थी |और उसने ऐसा इसलिए किया कि उसका पति किडनी की बिमारी में मर गया था ,और उसके पास दो जून की रोटी नहीं थी ,मुझे जानकारी मिली है कि इससे सम्बंधित पोस्ट आपको भेजी गयी थी ,ये बड़ी खबर मैं काफी देर तक आपके ब्लॉग पर ढूंढ़ता रहा ,मगर अफ़सोस |
    ४ आप ग़लतफ़हमी की शिकार हैं ,निजता का मेरा मतलब सिर्फ ये है कि जो परदे के पीछे टोले बन रहे हैं उन टोलों का सच सबको मालूम होना चाहए और अगर आप अपने टोलों से दूसरे टोलों पर आक्रमण नहीं करती ,तो फिर किस बात का डर ,|ऐसे टोलों का सच जानने का अधिकार सबको है ,मैं आपका छोटा भाई हूँ ,हूँ किसी को आपति ,मुझे क्या
    ५-सच कहूँ दीदी ,मैंने कभी ध्यान ही नहीं दिया इस बात पर की अपनी प्रोफाइल को कैसे बनाऊं .फिर भी पूछती हैं तो बताता हूँ
    ए -मेरे घर का पता 9fh3-159,ae hostel ,obra ,sonbhadra (up)
    cell number-०९८३८३४६८२८ ,मेरी सम्प्रति -ब्यूरो प्रमुख -डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट ,विवाहित
    बी- दीदी यशवंत का दोस्त हूँ ,मगर कभी मिला नहीं ,फ़ोन पर ही बात होती है
    सी - मेरी माँ शिक्षक ,मेरे पिता एक लेखक हैं

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  20. hoti hai daud ....behtar ho hum apni raah par rahen,udhar dhyaan dene se sirf tanaw hoga

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  21. no i did not comment in anger i clarified and i dont intend sending any mail to anyone till i feel i want to do it

    privacy has to be maintained

    in a joint blog the blog owner or adminstrator is the one who creates the blog and all rest are members i am sure since you are member of many community blogs you yourself know this

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  22. मुझे जानकारी मिली है कि इससे सम्बंधित पोस्ट आपको भेजी गयी थी ,ये बड़ी खबर मैं काफी देर तक आपके ब्लॉग पर ढूंढ़ता रहा ,मगर अफ़सोस |

    i dont know who gives you all this information because we all members on naari write what we feel like writing and not what others want us to write

    vivek has been trying to post comments on naari blog which not in keeping with the tought of naari blog so he tries time and again to mislead people about the administrator and owner of naari blog

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  23. बाठला पर आपके मित्र रो पड़े, कश्मीर के दस लाख हिन्दुओं के लिये कभी रोये, जरूर पूछियेगा.

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  24. aawesh babu...
    bahut hi achhe mudde ko uthaya aapne...
    rajdeepsardesai k dwara marathee channel shuru kiya jan wo v galat waqt pe....
    aapke kuch aise hee tewar mujhe pasand aate hain..
    aapse judne k bad aapke har post ko padhta hun...jee chahta hai aap jaise hee bebak logon k sath kam karun....
    parantu....

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  25. आवेश जी क्यों बेकार के पचड़े मे पड़ते हैं आप? वैसे मुझे भी समझ नही आता यह सब क्या हो रहा है? मामला गम्भीर है या फ़िल्मी? न ही अच्छा लगता है इस तरह ब्लॉग पर अंट शंट नारे बाजी में अपना समय बर्बाद करना, यह सब क्यों नही सोचते की वक्त का कितना कीमती है, इसे बेकार की बहस में बर्बाद न किया जाये, आप जैसे ऊर्जावान लेखक को भी आज इस तरह की बहस ने आहत किया, सचमुच अफ़सोस की बात है, आपकी अगली रचना की प्रतिक्षा रहेगी...
    दोस्त के लिहाज से एक मशवरा है, अगर आप बुरा न माने...स्वयं को इन सब बहस बाजियों से दूर ही रखें

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  26. सुनीता शानू जी से सहमत हूँ।


    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  27. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  28. विचारणीय लेख।

    १)
    सामूहिकता, सामुदायिकता व पारस्परिकता आदि सभी सकारात्मक मूल्य हैं, भारतीय इतिहास, परम्परा और संस्कृति की पहचान हैं ये मूल्य। भारतीय अपने संबन्धों की गुरुता, उनके प्रति कर्तव्यभाव और प्रतिबद्धता के लिए सदा से ख्यात भी रहे हैं व सराहे भी गए हैं। अत: किसी को भी किसी सम्बन्ध के प्रति लज्जित अनुभव करने का कोई कारण ही नहीं है (बशर्ते हम सभी अपने रिश्तों में ईमानदार व निस्स्वार्थी हों।

    २)
    इस उपर्युक्त कथन का पूरक यह भी है कि ये रिश्ते खेमेबाजी, गुटबन्दी, दूसरों के खिलाफ़ मोर्चा खोलने जैसी रणनीति या चोर चोर मौसेरेभाई जैसे किसी कारण से बने/बनते हों, या इस उद्देश्य व सरोकार को लेकर चलते हों/चलें, तो ये सभी निन्दनीय हैं। वे वस्तुत: रिश्ते नहीं साँठगाँठ हैं और स्वार्थपूर्ण उद्देश्य से केवल अति संकुचित अपने-पराए का भेदभाव हैं, बनिस्बत सही और गलत के बीच, सही की पक्षधरता के।

    अत:

    ३)
    कुटिल उद्देश्यों की पूर्ति में लगी किसी भी प्रकार की क्षुद्र रणनीति
    की भर्त्स्ना अनिवार्य है और उसका बहिष्कार किया जाना चाहिए। सरोकार की व्यापकता, मानवीयमूल्य,राष्ट्रीयता और आत्मकेन्द्रित/स्वार्थ की पहचान व पुष्टि हो जाने पर।


    नारी ब्लॊग रचना का ही है, मेरा न था, न है। मैं तो केवल रचना के आमन्त्रण को स्वीकर करने के बाद ही उसमें जुड़ी थी। वैसे स्त्रीप्रश्नों पर केन्द्रित मेरा एक निजी ब्लॉग भी है- "Beyond The Second Sex : स्त्रीविमर्श" ( http:streevimarsh.blogspot.com |



    अन्त में, यही सत्य है कि जो जितना खरा होगा उतना दीर्घजीवी होगा। कालजयी होने के लिए काल पर जय पाने में समर्थ सर्जना अश्यम्भावी होती है वरना समय की तलछट में सब कुछ खो जाता है।

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  29. @ कविता वाचक्नवी ji


    अन्त में, यही सत्य है कि जो जितना खरा होगा उतना दीर्घजीवी होगा। कालजयी होने के लिए काल पर जय पाने में समर्थ सर्जना अश्यम्भावी होती है वरना समय की तलछट में सब कुछ खो जाता है

    aapki kahee ye laain dil me utar gai

    venus kesari

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  30. are awesh!!
    aapke katnare ki TRP.. teji se badhi hai...
    badhai..

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  31. आपका लेख वास्‍तव में शोध परक है, किन्‍तु कुछ रिश्‍ते अट्टू रहते है जो आत्‍मीयता से बने होते है। बाकि बहुत बार सगा भी सगा नही होता।

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  32. यह क्या बात हुई? मैं ने तो केवल शानू जी की टिप्पणी की ओर ध्यान दिलाया था। जब आप दूसरों के रिश्तों की बात पर एक लम्बा लेख लिख सकते है तो अपने रिश्तों से मुंह क्यों छिपायें!!!!!!!

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  33. यही सत्य है कि जो जितना खरा होगा उतना दीर्घजीवी होगा।

    कविता की बात पर ध्यान दे
    और
    हिंदी ब्लॉग जगत मे झूठ और मसखरी के सहारे
    भ्रांतिया पहलाने वालो के आलेखों को पढ़ कर
    पहले तहकीकात करे तभी किसी पर आक्षेप
    करे .

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  34. आज ब्लॉग्गिंग में कोई नौ महीने होने को हुए....मैं कभी किसी झमेले से दूर ही रहा....सच तो यह है....महीने-दो-महीने में ही मैंने ब्लोग्गरों में इस "तोलेपन को भांप लिया था....और इस बात की तस्दीक़ रांची में हुए ब्लोग्गर सम्मेलन में भी भली-प्रकार हो गयी थी....मैं किसी से ना दूर हूँ ना नज़दीक.....आज पहली बार किसी भी ब्लॉगर की पोस्ट पर इतनी ज्यादा देर ठहरा हूँ...शायद आधे घंटे से भी ज्यादा....पूरी पोस्ट और हर एक टिप्पणी पर ठहर-ठहर कर सोचते हुए बहुत से विचारों का कबाडा मैंने भी अपने दिमाग में इकठ्ठा कर लिया था.......और सोचा कि ना जाने क्या-क्या कुछ लिख मरूँगा.....मगर कविता वाचक्नवी जी की टिप्पणी पर पहुँचते ही सारी बातें अपने-आप ही व्यर्थ हो गयी....और तह सब समय की ऐसी-की-तैसी करना लगा...बेशक आपके मुद्दे बिलकुल सही हैं....तथ्यवार हैं......और गंभीरता-पूर्वक "सोचनीय" भी....मगर जैसा की कविता जी ने कहा.....अन्त में, यही सत्य है कि जो जितना खरा होगा उतना दीर्घजीवी होगा। कालजयी होने के लिए काल पर जय पाने में समर्थ सर्जना अश्यम्भावी होती है वरना समय की तलछट में सब कुछ खो जाता है......सारी बातों का यही विराम है.......!!.......मैं ऐसा मानता हूँ....जब -तक आदमी है.....उसमें टोले बनाने का भाव रहेगा ही....टोलों में सुरक्षा होती है....पहले पशुओं से थी....फिर प्रकृति से...फिर अन्य समाजों से....या टोलों से.......फिर राज्यों या देशों से....और अब.....अपनी ही भाषा बोलने वाले....लिखने वाले....की विभिन्नताओं से....विभिन्न "सोच" से....!!....रचनाकर्म सर्जन-धर्मिता या स्रजनात्मक्ता नहीं....बल्कि विभिन्न तरह के "वाद" हैं....ये "वाद"....क्योंकर बनाए हुए हैं या बनाए जाते हैं....सर्जन-कर्म सिर्फ एक कला-कर्म ना होकर "वादों की बपौती क्यों हैं.....और क्यों पसंदीदा चीज़ों के टोले निर्मित हो जाते हैं....और उनसे विलग दूसरी चीज़ें क्यों उपेक्षा का शिकार बन जाती हैं....किन्हीं लोगों के निजी संस्मरण क्यों प्रशंसा पाते हैं... और क्यों अच्छे-से-अच्छी बात लोगों के गले नहीं उतरती....लोगों में देश को बनाने और उसके लिए कुछ कर जाने वाली संजीदा चीज़ें भी क्यों घर नहीं कर पाती...और अन्य मनोरंजनात्मक चीज़ें कैसे "लिफ्ट" होती हैं....!!....क्या लोगों में उपयुक्त संजीदापन नहीं है....या कि भारत के ब्लागर अभी उतने "समझदार" नहीं हुए हैं....या....कि अभी पाठकों का एक बड़ा वर्ग संजीदा चीज़ों से अभी-तक अ-जानकार है....या कि एक दुसरे को टिपियाकर आत्मरति का सुख लेने का भाव है हम लोगों में.....याकि हमारा ब्लॉग उसके ब्लॉग के पीछे क्यों........?????........आवेश.....जहां तक मैं जानता हूँ.....आदमी मनोरंजन पहले पसंद करता है....संजीदगी उसके बाद....और ब्लॉग्गिंग करने वाले लोग भगवान् की दया [अरे-रे-रे क्या बोल गया मैं....भगवान नहीं भाई{सांप्रदायिक हो जाएगा ना....!!}.....उपरवाले की दया] से ""पेट से भरे हुए हैं....भरे पेट में खामख्याली ज्यादा आती है....संजीदगी कम....अरे-अरे-अरे खुद मैं इससे अलग थोडा ना कर रहा हूँ.....नेट पर हम सब अपने-अपने काम के बीच या सारा काम-धाम निबटा कर आते हैं....काम के बीच हो या काम के बाद.....दिल को मनोरंजन ही चाहिए होता है....और ब्लॉग्गिंग के नाम पर मनोरंजन ही कर रहे हैं....बल्कि साफ़-साफ़ कहूँ तो मनोरंजन ही कर रहे हैं...ब्लॉग्गिंग तो इसके बीच कहीं-ना-कहीं हो जा रही है....मुई इतना के बाद भी ना होगी...तो भला कब होगी....इतना कहने के बाद मैं यह कह कर अपनी समाप्त करना चाहता हूँ....कि मेरी इस बात से कोई सहमत ना भी हो तो मुझे कतई माफ़ ना करे...क्योंकि यह तो खुला विद्रोह है भई....ऐसे बन्दे को तो ब्लॉग्गिंग की रह से सदा के लिए हटा ही देना ही चाहिए....!!.....और ऐसी बातों की चुनौतियों को मैं भूतनाथ अपने पूरे होशोहवास के साथ स्वीकार करता हूँ....!!.....आवेश तुमने शुरुआत कर दी है....तो इसकी इन्तेहाँ अब मैं करूंगा....बेशक मुझे यहाँ से हट ही क्यों ना जाना पड़े....!!

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