बुधवार, 15 जुलाई 2009

शर्म शर्म शर्म शर्म शर्म ...............


क्या आप किसी गैर पुरुष के साथ सोयी हैं ?क्या आपने कभी अपनी बेटी की उम्र की लड़की के साथ सम्भोग किया है ?क्या आपने अपने कभी अपने पिता को थप्पड़ मारा है ?क्या ये सवाल आपके मनोरंजन की वजह हो सकते हैं ?क्या आपको एक करोंड़ रूपए दिए जाएँ तो आप टीवी पर सबके सामने नंगे हो सकते हैं? अगर नहीं हो सकते हैं तो या तो आप निरा गंवार हैं या फिर आप मनोरंजन का मतलब नहीं समझते ,शायद यही सन्देश दे रहा है स्टार प्लस पर प्रसारित हो रहा धारावाहिक 'सच का सामना ' | आम आदमी की विवशता और उसके रुदन पर थोड़े से पैसे देने और ज्यादा से ज्यदा बटोरने को एक अमेरिकन धारावाहिक की हुबहू नक़ल करके बनाया गया ये हाई प्रोफाइल रियलिटी शो दरअसल रियलिटी शो नहीं रेप शो साबित होने जा रहा है ,आम आदमी की निजता को खुलेआम भरी भीड़ में नंगा कर देना और उसे दिखाकर ठहाके लगवाना ही इस रियलिटी शो का मकसद है ,ये मानवीय संवेदनाओं का खुलेआम बलात्कार करेगा और बार बार करेगा |आप में जिसके पास साहस हो वो ये सब कुछ देख सकता है, वैसे परम्पराओं और मूल्यों को एकता कपूर स्टाइल में टूटते देख रहे लोगों के लिए ये सब कुछ देखना बेहद आसान है | इस धारावाहिक में अब तक अपराधियों पर इस्तेमाल की जाने वाली पोलिग्रफिक मशीन जिंदगी की तमाम चुनौतियों से जूझते हुए आम इंसान के भीतर छुपे सच का पता लगायेगी | आपमें से जिसने भी १५ जुलाई के एपिसोड को देखा होगा ,वो शायद स्मिता को कभी जिंदगी में नहीं भुला पायें ,पोलिग्रफिक मशीन ने स्मिता के उस सवाल को झूट बताया जिसमे उसने अपने पति के अलावा किसी गैर मर्द के साथ सोने की इच्छा न होने की बात कही थी ,स्मिता अवाक थी उसके पति की आँखों में आंसू थे और दो जिंदगियों की तबाही की पटकथा लिख दी गयी थी |मैं थूकता हूँ हिंदी टेलीविजन इंडस्ट्री पर ,मुझे शर्म है सुचना एवंप्रसारण मंत्रालय की बुजदिली पर ,जो मत्रालय कम भाठियारखाना अधिक नजर आता है ,जिसके पास बार बार सब्र और शर्म की हदे तोड़ रहे इन चैनलों के ऊपर लगाम कसने की न तो इच्छाशक्ति है और न ही साहस ,,वो अपनी आँखों के सामने चैनलों पर जब छोटे बच्चों की कोमल मनोवृतियों को छिन्न भिन्न होते और बेहूदगी से एक बेहूदा अभिनेत्री को स्वयम्बर रचाते देख सकता है तो उसे ये सब देखने में क्यूँकर शर्म आएगी ? और माफ़ करिये मुझे शर्म खुद पर और आप पर भी है ,जो अपनी आँखों का सारा शील और सारी शर्म को ख़त्म करके कुछ भी देख सकते हैं ||
आइये अब वो देखने की बारी है जो अब तक आप नहीं देख सके ,एक देश की पूरी पीढी को धारावाहिकों के माध्यम से जिंदगी जीने का तथाकाथित सलीका सिखाने के बाद ये चैनल अब आपके भीतर छुपे सच को सबके सामने उगलवाएँगे,वो सच जो हर इंसान के भीतर छुपा होता है ,वो सच जो जिंदगी के उबड़ खाबड़ रास्तों पर पैदल चलते हुए पैदा होता है ,कभी कभी जीता है ,कभी कभी मर जाता है |अक्सर हम ख्यालों में बहुत कुछ ऐसा सोच लेते हैं जिन्हें सबके सामने कहना संभव नहीं होता वो सोच किसी भी नजदीकी के सम्बन्ध में हो सकती है परन्तु इसका मतलब ये तो नहीं की उसे व्यक्त किया जाए |हम सच कहते हैं कि जब मैं छोटा था तो खुद को पिता के हांथों पिटते देख मेरे मन में कई बार ख्याल आया की उठाऊं पत्थर, मार दूँ उन्हें ?परन्तु मैंने ऐसा नहीं किया ,वो क्षणिक था और आज मैं अपने पिता को शायद दुनिया में किसी भी बेटे से अधिक प्यार करता हूँ ,आज जो कुछ में हूँ उनकी वजह से हूँ ||शायद ऐसे सच की अभिव्यक्ति न करना ही हमें विक्षिप्तता से बचता है ,एक पागल इंसान और आम इंसान में यही फर्क होता है |मौजूदा समय में विवाहेतर सम्बन्ध ,विवाहपूर्व यौन सम्बन्ध आधुनिक भारतीय समाज का एक अनिवार्य हिस्सा बन गए हैं ,ये सही हैं या गलत लेकिन आप इनसे समाज को अलग करके नहीं देख सकते ,समाज के हर वर्ग के स्त्री पुरुष इसमें शामिल हैं ,ये स्वाभाविक है | इसे मर्यादा के विरूद्व भले मन जाए लेकिन अपराध कहना उचित नहीं होगा ,ये खुद को १०० फीसदी न उडेल पाने से उपजी कुंठा का प्रतिफल है जिसमे कभी भी जीवन के किसी भी मोड़ पर , किसी के साथ भी मन की कोमल भावनाएं जुड़ जाती है ,इसका विवाह से कोई ताल्लुक नहीं होता ,लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि हम भीड़ के बीच इन संबंधों का ढिंढोरा पीटें और पैसे की वसूली करें |उफ्फ्फ ,कैसे कर सकते हैं आप ऐसा ?

मुझे आश्चर्य होता है उन स्त्री पुरुषों पर जो इस तरह के धारावहिकों में शामिल होने के लिए सहर्ष राजी भी हो गए ,अपना अपना पोलिग्राफिक टेस्ट कराया ,और जिंदगी के सच की लड़ाई में तार तार होने के बावजूद बैठ गए हॉट सीट पर, धरावाहिक के प्रोमो में अब तक जिन चेहरों को दिखाया गया वो सिनेमा ,टी वी और खेल के क्षेत्र से जुडी हस्तियाँ थी ,जिनके लिए निजता भी प्रदर्शन की चीज होती है और जिसे वो बार बार पब्लिसिटी पाने के हथकंडे के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं,उन्हें फर्क नहीं पड़ता किबेहद व्यक्तिगत सच के प्रदर्शन से बेहद कोमल मानवीय संबंधों पर क्या असर पड़ने वाला है ,हाँ पहले एपिसोड को सनसनीखेज बनाने के लिए स्मिता को जरुर सामने बैठा लिया गया ,क्यूंकि इस एपिसोड में ऐसे सवाल थे जो अगर सामान्य जिंदगी में कोई किसी से पूछे तो वो जूता उठाकर मारने दौड़ा लेगा ,खैर वहां उत्तर के बदले पैसे थे |स्मिता अपने जीवन में किसी वक़्त अपने पति की हत्या कर देना चाहती थी ,उसके मन में एक बार बेवफाई का ख्याल आया था ,उसे लगता था की उसकी माँ उसके भाई को अधिक चाहती है न की उसे |जहाँ तक मैं सोचता हूँ मध्यमवर्गीय परिवारों में ,पति के साथ कड़वे संबंधों का बोझ उठा रही कोई भी महिला किसी एक वक़्त में उसकी हत्या के बारे में सोच सकती है जहाँ तक बेवफाई का सवाल है हमने पहले भी कहा बेवफाई के मायने अब बदल चुके हैं ,खैर स्मिता ने स्वीकार किया कि किसी एक वक़्त वो ऐसा कर सकती थी ,आने वाले एपिसोड में लोगों से ये भी पूछा जायेगा की क्या आप विवाह के बाद खुद को बंधा हुआ महसूस करते हैं ,शादी के बाद अपने किसी गैर मर्द से प्रेम किया की नहीं और आप अपने बेटे को अधिक प्यार करते हैं या बेटी को |जिंदगी की लड़ाई में बार बार हार रहे हम और आप, सामने बैठे स्त्री पुरुष की निजी जिंदगी के पन्नों को चाय की चुस्कियों के साथ आँख गडा कर देखेंगे,और उधर सच का सामना करने के नाम पर जिंदगी की सबसे बड़ी बेवकूफी कर रहे लोग आंसू बहा रहे होंगे ,जो शायद आने वाले कल में भी उनकी आँखों से बहता रहेगा |

32 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल सही हैं आपकी भावनायें सच मे ही हमारे समाज मे जो गँदगी इन चैनलों दुआरा फैलाई जा रही है उसे अब मूक बन कर देखने का समय नहीं रहा इस शर्मनाक स्थिति के् खिलाफ आवाज़ बुलन्द करने का समय आ गया है बहुत बडिया आलेख है आभार्

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  2. आवेश आपकी बातों से मैं सहमत हूँ ..कल जब इसे देख रही थी तब ऐसा ही मन में आ रहा था ...ये मीडिया अब किसी का कुछ भी व्यक्तिगत नहीं रहने देगा ... .इंसानी मन के अन्दर भी इसने घुसपैठ कर ली है ....किसी तरह से टी. आर. पी. बढ़ जाए .....रोमांच फैले ....पब्लिसिटी हो ...इसके लिए ये किसी भी हद तक जा सकते हैं ...

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  3. आवेश जी !
    सादर वन्दे ,
    ये जो आज कल आधुनिकता के नाम पर खुले विचारो कि दुहाई देकर समाज को विकृत करने का कार्य चल रहा है यह अत्यंत ही घातक है, एक तो हमारा समाज गलत दिशा कि और जा रहा है और दुसरे हमारी नौजवान पीढी दिमागी तौर पर विकृत हो रही है,
    और रही बात सूचना प्रसारण मंत्रालय व सरकार कि तो इनको समलैंगिकता जैसे विषयों पर सोचने व कार्यान्वित करने से ही फुर्सत नहीं है तो इन विषयों कि क्या चिंता करेंगे,
    जरुरत इस बात कि है कि समाज के हर वर्ग को मिलकर यैसे कार्यक्रमों तथा विषयों पर खुलकर सामने आना चाहिए ताकि वास्तव में इस देश कि सूरत बदली जा सके,
    इस विषय को इतने अच्छे प्रकार से उठाने के लिए आभार.
    रत्नेश त्रिपाठी

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  4. आवेश जी,
    आपकी प्रतिक्रिया ऐसे reality show के लिए बिल्कुल सही है| बेहद आश्चर्य और दुःख हुआ इस कार्यक्रम के प्रसारण पर| अपनी निजी ज़िन्दगी को सार्वजनिक करने को साहस का नाम देकर यूँ वाहवाही बटोरना जाने किस दिशा की ओर हमें ले जा रहा| सिर्फ एक एपिसोड से एक नहीं कई जिंदगियां तमाम उम्र के लिए शर्मसार हुई, और पूरी ज़िन्दगी इसकी सज़ा भुगतती रहेगी|
    आश्चर्य है कि ऐसे कार्यक्रम के प्रसारण के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अनुमति दी कैसे? स्मिता जब इस कार्यक्रम का हिस्सा बनने आई तो ये सारे प्रश्न उससे पहले ही किये गए थे, वो उसी वक़्त इसे छोड़ कर क्यूँ नहीं गई? क्या पैसा इतना महत्व रखता कि वो अपने साथ अपने घर परिवार सभी को शर्मिंदा कर सकी? सवाल सिर्फ इस एक शो का नहीं है, बल्कि समाज में पनप रहे जीवन-मूल्यों का है|
    सभी सवाल जो किये गए वो सामाजिक परिवर्तन की दिशा जानने केलिए एक अच्छा सर्वे हो सकता था बशर्ते कि ये महज सामाजिक अनुसंधान के लिए किया जाता, न कि मनोरंजन केलिए| और ऐसे सर्वेक्षण में पूर्णतः गोपनीयता रखी जाती है, न कि यूँ मानवीय रिश्तों को शर्मसार किया जाता है|
    स्त्री हो या पुरुष किसी की भी निजी ज़िन्दगी में झांकना अपराध है|
    सच-झूठ जानने के इस मशीन को देश के हित में लाया जाना चाहिए, न कि किसी के गोपनीय और निहायत ही निजी मामले को सार्वजनिक करना| अगर ऐसे चैनल इतना बड़ी हिम्मत रखते हैं तो उन्हें चाहिए कि हमारे पथ भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों और अपराधियों से सच उगल्वाएं जो देश का अहित कर रहे| बल्कि उनसे भी ऐसे व्यक्तिगत शर्मनाक प्रश्न नहीं किये जाने चाहिए जो हमने पहले एपिसोड में देखा है, सिर्फ देश और समाज से जुड़े प्रश्न होने चाहिए|
    हम सिर्फ चैनल को दोष नहीं दे सकते, ये हममें से हीं हैं जो ऐसे कार्यक्रम बनाते हैं, दिखाते हैं, इनका हिस्सा बनते हैं|
    आपको बहुत धन्यवाद जो इतने संवेदनशीलता से आपने इसे लिखा है| ऐसे आपत्तिजनक प्रसारण पर तुंरत रोक लगना चाहिए|

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  5. बहुत बढिया तरीके से आप्ने ये दर्द उठाया है. समाजिक मूल्य लग्ता है ताक पर रख दिये गये है़

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  6. वे भारतीय अवाम पर जताना चाहते हैं कि देखो हम कितने आधुनिक हो गए हैं। अगर ऐसे ही सचों से यह दुनिया चलने लगे तो दिन सब कुछ खत्म हो जाएगा।

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  7. मेरा सोचना कुछ अलग है, प्रतियोगियों को पहले से ही सवाल बता दिए जाते है, उसके बाद भी यदि कोई सच का सामना करने तैयार होता है तो इससे हुई शर्मिंदगी और नुकसान के लिए वह ही जिम्मेदार है. लोग सब जानते हुए भी इस गेम शो में आ क्यों रहे हैं? क्या वे ज़रा भी दूरदर्शी नहीं हैं?

    अगर प्रतियोगी सब जानता है तो चैनल की कोई ख़ास ज़िम्मेदारी नहीं बनती.

    सारी दुनिया की तरह भारत की जनता भी वोयूरिस्टिक किस्म की है, हमारे बीच से ही लोग देख रहे हैं और कार्यक्रम को सफल बना रहे हैं!

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  9. Awesh ji ! मैं यहाँ ये शो. देखने में तो असमर्थ हूँ परन्तु जो आपने कहा उससे पूरी तरह सहमत हूँ. मुझे एसा लगता है की भारतीय मिडिया सचमुच पगला गया है.और यथाकथित सूचना प्रसारण मंत्रालय सिर्फ नाम के लिए रह गया है...हालत ये हैं की आप जो चाहें ,जैसे चाहे टी वी पर दिखा सकते हैं..मुझे आश्चर्य है की जनता को क्या हो गया है...वो कैसे ऐसे कार्यक्रमों में सम्मिलित होने के लिए तैयार हो रहे हैं क्या सिर्फ पैसे के लिए?वेसे तो कुछ खास तबके के लोग वैलेंटाइन डे जेसे इवेंट पर जलूस निकलने लगते हैं...कोई फिल्म सच्चाई को दिखाती हुई आती है तो हंगामा हो जाता है ..और यहाँ आम आदमी की जिंदगियों से सरे आम खेला जा रहा है ,उन्हें सरेआम निर्वस्त्र किया जा रहा है तो सब मौन हैं? न जाने कितने घर तबाह हो जायेंगे .........
    आवेश जी आपने ये लेख इतनी संवेदनशीलता से लिखा उसके लिए आप की प्रशंशा की जानी चाहिए.कोई तो अपने फ़र्ज़ को अंजाम देने की कौशिश कर रहा है.

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  10. मैंने यह शो तो नहीं देखा ,पर आपकी बैटन से शब्दशः सहमत हूँ.......मन आक्रोश से भरा हुआ है....पर किया क्या जाय ,यह समझ नहीं पड़ रहा......
    अपनी तरफ से यही करती हूँ की ऐसे कार्यक्रमों को देखने से सख्त परहेज रखती हूँ....पर एक मेरे न देखने से क्या होता है..........

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  11. बहुत बेहतरीन लेख, मेरे दिल की आवाज़ है यह… TRP के भूखे सूअरों को घूरे की गन्दगी पूरे देश में फ़ैलाने की इजाजत नहीं होना चाहिये…

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  12. सही लिखा है आपने कल का शो देख कर इसी तरह के विचार दिल में आ रहे हैं ,पैसों के लिए यह किस तरह से इन प्रश्नों के उतर दे रहे हैं समझ से बाहर है ..

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  13. आवेश जी, आपका और समस्त जन समुदाय का आक्रोश समझ सकती हूँ मै, परन्तु बस एक बात की परेशानी है,कहीं हम गलत का साथ तो नही दे रहे? क्या जबरन किसी से उसके अंतरग सम्बंधों का लेखा-जोखा लिया जा सकता है? हम कोई दूध पीते बच्चें तो नही हैं, क्या हम नही समझते की यह सब टी आर पी बटोरने का एक जरिया मात्र है, राखी सावंत का स्वंयवर भी काफ़ी पब्लीसिटी बटोर रहा है,शायद इस चैनल का भी यही उद्देश्य रहा होगा। ज्यादा से ज्यादा लोग इसे देखें। बड़े बड़े सैलिब्रिटीज़ का आना और सच बोलना तो यही दर्शाता है की जो काफ़ी समय से पब्लिक को कुछ नया नही दिखा पाये, इस बुध्दू बक्से के जरिये एक बार फ़िर पब्लिसिटी आई जाये... बाकी कुछ नही, जिंदगी की सच्चाई को कोई क्या बतायेगा भला, जब इन्सान खुद से ही सच बता न पाया। हजार कोई कहे की जिन्दगी खुली किताब की तरह हैं मगर उस किताब के जिल्द के नीचे ही लोग बहुत कुछ छिपाये हुए हैं। आपके साहस की मै दाद देती हूँ, आपने बहुत अच्छा लिखा,आपने अच्छे-अच्छों की बखिया उधेड़ कर रख दी है।मगर मुझे टी वी शो से अधिक गुस्सा उन लोगो से होता है, जो चन्द पैसों की खातिर या पब्लिसिटी की खातिर अपने दामन को तार-तार कर देते है।

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  14. (सोनभद्र से विजय विनीत भाई की comment मेल से मिली है जिसे हम ज्यों का त्यों प्रकाशित कर रहे हैं |)

    आवेश जी आपने बिलकुल सच लिखा है सच का सामना स्टार प्लस पर शुरू हुआ इसमें जो कुछ स्मिता से पूछा गया क्या वह इस देश के लिए उचित कहा जा सकता है ! इस चैनल के मालिक व उसके संचालक व एंकर खुद बड़े लोग हैं , यह लोग क्या इस कार्यक्रम में अपनी बहू .बेटी व बीबिओं से इस तरह का सवाल कर सकते हैं ! पहले इन्हें इसकी शुरुआत अपने से करनी चाहिए थीं !
    सबसे शर्मनाक तो यह है की इस देश की राष्ट्रपति महिला लोकसभा अध्यक्ष महिला देश पर शासन करने वाली पार्टी की अध्यक्ष महिला इसके अलावा शुषमा स्वराज वृंदा करात , उमा भारती , मायावती , मेधा पाटकर जैसी तमाम महिलाए हैं फिर भी इस तरह के कार्यक्रम पर रोक नहीं
    छि , छि , छि
    विजय विनीत
    मो न . - ९४१५६७७५१३

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  15. मैं आपके इस आलेख के हर प्रस्ताव का समर्थन करता हूँ. आधुनिकता की अंधी दौड में हम नैतिकता को गिरवी रख काफी आगे जा चुके हैं.

    लोगों के सुप्त मानस को जगाने के लिये इस तरह के सामयिक आलेख बहुत जरूरी हैं.

    सस्नेह -- शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

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  16. आखिर ऐसे चैनलों में फिर भी लोग भाग क्यों ले रहे हैं और इन कार्यक्रमों की टी आर पी क्यों बढ़ रही है ?

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  17. कहते है मीडिया समाज का आइना है मगर जब उस आइने मैं अपनी ही सूरत नग्गी दिखने लगे तो उस आइने को तोड़ देना चाहिए हमारा देश नारी प्रधान देश है और जिस देश की रास्त्रपति महिला हो और जिस देश को चलने वाली महिला हो उस देश मैं किसी महिला से भरे मंच मैं इस तरह के सवाल किसी महिला को सम्मान तो दे नहीं सकते बजे उसको आपने मतलब के लिए सारे बाजार नंगा कर दिया जाता है और इसको हम और हमारा समाज बड़े ही चाव से देखते है सरम आणि चाहिए हमको आपने आप पार की हम गर्व से खाते है की मेरा देश महान है
    ब्रजेश निगम {मेनेजिग डाइरेक्टर}{विधाता मीडिया नेटवर्क लिमटेड }

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  18. आवेश भाई, मैं "सच का सामना" के विरूद्व आपके इस लेख से पुर्णतः सहमत हू | भारतीय परिपेक्ष में इस तरह के गेम शो के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए |

    लेकिन फिर भी मैं इस बारे में थोडा विपरीत विचार रखता हू | ये गेम शो आम भारतीय मानसिकता वाले लोगो के लिए कदापि नहीं है, जिनका हमेशा से यह मनना रहा है की "वैसा झूठ कदापि गलत नहीं होता, जिसके बोलने से कोई बड़ा अहित टलता हों" |

    यह गेम शो मूल रूप से तीन तरह के लोगो को ही आमंत्रित करता है |

    १) वैसे लोग, जिन्होंने अपना पूरा जीवन में एक ही चेहरे में व्यतीत किया हों |
    २) वैसे लोग, जिन्होंने अपने पुरे जीवन में कई मुखोटे बदले है, लेकिन धन के लोभ से ही सही, सच का सामना करने का माद्दा रखते है, येसा भ्रम पाल रखा है |
    ३) या फिर वैसे लोग, जो झूठ भी कुछ इस सलीके से बोल जाये की साबित करने में पोल्य्ग्रफिक मशीन के भी पसीने छुट जाये |

    और मेरे हिसाब से ये तीनो किस्म के लोग ही देखने लायक होंगे |

    अब गेम शो को दूधारु गाय बनाने के लिए वैसे मुद्दे चुनना, जिनका झूठा जबाब देना ही लोग श्रेयकर समझते है, चैनल वाले की मजबूरी भी है और शो के मूल अवधारणा के अनुरूप भी |

    मेरे हिसाब से इस गेम शो का दो ही भविष्य है, एक तो बहुत संभव है की पुरजोर विरोध के साथ ये बंद कर दिया जायेगा या फिर अप्रत्यार्षित सफलता दर्ज करेगा | देखते है क्या होता है |

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  19. पहली बात तो ये है की पोली ग्राफिक टेस्ट एकदम परफेक्ट मापदंड नहीं है सच ओर झूट को मापने का....इसलिए नार्को टेस्ट उससे बेहतर माना गया है...पोली ग्रफिक टेस्ट में केवल शरीर की कुछ अवस्थायों पर नजर रखी जाती है जो किसी भी ऐसी अवस्था में जब आप परेशान या विचलित है ....बदल जाती है..
    दूसरी बात जो @ab inconvient ji ने कही है
    "प्रतियोगियों को पहले से ही सवाल बता दिए जाते है, उसके बाद भी यदि कोई सच का सामना करने तैयार होता है तो इससे हुई शर्मिंदगी और नुकसान के लिए वह ही जिम्मेदार है. लोग सब जानते हुए भी इस गेम शो में आ क्यों रहे हैं? क्या वे ज़रा भी दूरदर्शी नहीं हैं?"


    ठीक कही है....ये फैसला उन्हें करना है ...
    आम जीवन में हम सब गलतियों के पुतले होते है ...कुछ सच हमारे वर्तमान जीवन को परेशान कर सकते है....वैसे भी कुछ सच एक समय .एक लम्हे .एक हालात .... के सच होते है......
    सबसे बड़ा सच यही है की हम सब मुखोटे पहन कर जीवन बिताते है .पर ये भी एक सच है की कुछ सच वर्तमान जीवन में तूफ़ान ला सकते है ...समाज की धज्जिया बिखेर सकते है ,फिर सबके हिस्से का सच जुदा होता है ....एक ही परिवार के लोगो का भी ....
    हाँ भारतीय समाज इसे कैसा लेगा ते आने वाला वक़्त बताइयेगा....दूसरा जैसा की संत शर्मा जी ने कहा या तो बहुत लोकप्रिय होगा या बंद करना पड़ेगा .फ़िलहाल आसार पहले के नजर आ रहे है....

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  20. शर्म???????????????????कहाँ?किसे?
    यह सब अब पिछडेपन में आता है भाई, माँ,पिता के साथ बेटा बेटी जाम टकराते हैं अब तो,और गताल में जाने को रहा क्या?

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  21. the difference between indian culture and western culture is that indians believe in doing many things but in wraps . they commit adultery but when it comes to admit they will say to admit is to be shameless . the act of adultery is shameless not the acceptence of it

    speaking and admitting truth in public is not acceptable to indian society but western society believes in speaking truth and admitting it

    they may have several partners but they will not deny it here people have several partners and yet when they come in open all would like to show how "good they are "

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  22. 21 सवाल और जिंदगी बर्बाद

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  23. संफ्रान्सिस्को से भारती पालीवाल जी का मेल से कमेन्ट मिला है ,जिसे हम यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं 'tumhara bllog pada abhee , log vaha bhee yahan kee terahh sadko per nangey daudne lageygey , jo frustatios jo gandgee yaha kee hai voh sab vahan sathapit ho hee jayeygee orr juladd hee shadee bhee history hone ko hai , America aisa ideal hai India ke liye kee Indians kujh deek galat ke bare main sochna hee nahee chahte . ASSAAN HOTA HAI ANOOSARAN . it was good reaction , but did it work ???orr ya sirf chai kee chuskee ke sath kee cookies hai ????'

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  24. शर्म शर्म शर्म शर्म शर्म ...............

    किसे और क्यों ? आज पैसो के लिए सब बिक रहा है .. पैसा जहा सच्चाई वहा. यही हो रहा है बस...!

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  25. कोई भी रियलिटी शो रियल नहीं है.. ये एक सोची समझी strategy और प्लानिंग के बाद प्रसारित किया जाता है ..
    शर्म का प्रश्न कहाँ...आप सबकुछ जान कर कुए में कूद रहें है..

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  26. आप के लेख की हम कद्र करते हैं
    दुनिया में पैसा बहुत कुछ हैं /लेकिन सब कुछ नहीं

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