शनिवार, 17 जनवरी 2009

ख़बर हर कीमत पर !

खबरिया चैनलों पर सेंसर की कैंची इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है ,विभिन्न चैनलों के कर्ता धर्ता इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अतिक्रमण बता रहे हैं प्रधानमन्त्री कार्यालय से लेकर समाचार बुलेटिनों तक इस अतिक्रमण के ख़िलाफ़ संवाद किए जा रहे हैं लेकिन इन सबके बीच आत्म -मीमांसा की बात कोई नही कर रहा प्रश्न सेंसरशिप होने का या न होने का बाद में है ,पहले सवाल ये है की जिस अभिव्यक्ति पर अतिक्रमण की बात हो रही है,वो अभिव्यक्ति क्या है ?वो अभिव्यक्ति अगर राखी सावंत और उसके प्रेमी के मान -मनौवल के रूप में है तो शर्म है ,वो अभिव्यक्ति अगर देर रात प्रस्तुत किए जाने वाले अश्लील कॉमेडी शो के रूप में है तो भी शर्म है ,वो अभिव्यक्ति अगर दुनिया को ख़त्म कर देने वाले किसी फंतासी से जुड़ी है तो भी शर्म है अब आप अंदाजा लगायें बचता क्या है ?मुंबई हमले के बाद सरकार ने इस सेंसरशिप को लागू करने का मन बनाया,देश की जनता को आतंकवाद का चेहरा दिखाने वाले सारे चैनल साधुवाद के पात्र हैंलेकिन उस दौरान सिर्फ़ आतंक नही दिखाया गया ,कुछ चैनलों ने टी आर पी को लेकर घुड़दौड़ उस दौरान भी जारी रखी इंडिया टीवी उस दौरान एक आतंकवादी के साथ तथाकथित बातचीत का ब्यौरा निरंतर प्रसारित करता रहा ,सिर्फ़ इतना ही नही शहीद महेश काम्टे के एक पुराने विडियो का भी फुटेज प्रसारित कर दिया गया ,जिसमे वो गन्दी गालियाँ देते हुए दंगाईओं की भीड़ को खदेड़ रहे थे ,शहीदों का ये कैसा सम्मान ? मुंबई हमले के बाद तो हद कर दी गई जिस वक्त पुरा देश शहीदों की मौत पर विलाप कर रहा था ,उस वक्त इन चैनलों पर पाकिस्तान के साथ युद्ध लड़ा जा रहा था अगर सही शब्दों में कहा जाए तो जनता के भीतर पकिस्तान के ख़िलाफ़ दबे आक्रोश को संतृप्त किया जा रहा था हम मुंबई पर राज ठाकरे के विषवमन का वो दौर नही भूल पाते जब वो सिरफिरा, भाषाई आधार पर पुरे देश को विभाजित करने का खेल खेल रहा था ,ठीक उसी वक्त टीवी १८ ने मराठी भाषा में लोकमत का प्रसारण शुरू कर दिया
प्रश्न सेंसरशिप होने या न होने का बाद में है ,पहले नीयत और नीति बदलने की जरुरत है अब तक electronic न्यूज़ चैनलों पर जो दिखाया जा रहा है उनमे से ज्यादातर हाई प्रोफाइल ड्रामा है ,जिनमे जो कुछ भी देश ,समाज और परिवेश में न्यूनतम स्तर पर है ,गायब है ख़बरों के नाम पर जो कुछ भी परोसा जा रहा है उनमे से ज्यादातर उनके लिए है जिनके लिए टेलीविजन ड्राइंग रूम में रखे किसी बड़े शोकेस का हिस्सा है गरीब की झोपडी गायब ,उसमे रखा बक्सा गायब और बक्से पर रखे टीवी से वो ख़ुद गायबजिस वक्त ब्लॉग पर ये रिपोर्ट लिखी जा रही थी ,उस वक्त चैनलों पर लगातार सिर्फ़ और सिर्फ़ संजय दत्त के चुनावी समर में उतरने से सम्बंधित ख़बर दिखाई जा रही थी सच ये है कि खबरें नदारद हैं है ,गंभीरता गायब है ,अगर कुछ है तो केवल मनोरजन और उसको परोसने कि यथासंभव जुगत ,क्या यह कम आश्चर्य कि बात नही है कि दिल्ली के किसी पाश इलाके में देर रात अपने पुरूष मित्र के साथ घूम रही युवती के साथ बलात्कार कि ख़बर हफ्तों तक न्यूज़ चैनल्स कि सुर्खियाँ बनी रहती हैं ,लेकिन छत्तीसगढ़ के किसी गाँव में आदिवासी महिला के साथ हुआ सामूहिक बलात्कार को पट्टी पर भी जगह नही देती जिस वक्त ये चैनल बोरवेल में फेस किसी बच्चे कि कहानी घंटों बयां करते हैं उस वक्त वास्तविक धरातल पर कोई समाचार नही होता ,उस वक्त उस बच्चे के जीवन और मौत के बीच चल रही रस्साकसी से जुड़ा शर्मनाक रोमांच ख़बर बन जाता है ख़बरों का वर्गीकरण देखिये ,दिल्ली में सड़क दुर्घटना में एक कि मौत -ख़बर ,वारंगल में सरकारी बस कि चपेट में आकर ६ कि मौत -ख़बर नही ,जिंदगी से तंग आ चुकी नशे में धुत्त मॉडल का सड़क पर आ जाना -ख़बर ,भूख और दरिद्रता से हारकर सोनभद्र के ननकू अगरिया की आत्महत्या -ख़बर नही , ibn7 से जुड़े मेरे एक पत्रकार मित्र कहते हैं 'हम विवश हैं ,हमें खबरों को हाई प्रोफाइल और लो प्रोफाइल के आधार पर चुनना पड़ता है ,लो प्रोफाइल की खबरें करने को साफ़ मनाही हैं आख़िर जो बिकता है वही दीखता है ,सच ही है अगर ख़बरों को बेचना है तो ताज पर हमले के दौरान की गई कार्यवाही को लाइव दिखाया जाना जरुरी है ,चाहे उसके वजह से बंधकों के ऊपर कोई भी आफत क्यूँ न आ जाए ,अभी अधिक दिन नही हुए जब बनारस में कुछ चैनलों के संवाददाताओं ने अतिक्रमण के आरोपी कुछ पटरी के दुकानदारों को पहले जहर की पुडिया दी और फ़िर उसे खाकर प्रदर्शन करने को कहा ,जहर खाने के बाद जब कुछ दुकानदारों की हालत बिगड़ने लगी तो ये सच सामने आया सर्वाधिक आपतिजनक ये है की ख़बरों को न सिर्फ़ पैदा किया जा रहा है ,बल्कि उनकी नीलामी भी की जा रही है
इन सब बातों का ये मतलब कतई नही है की सरकार को सेंसरशिप लागू करने की इजाजत देनी चाहिए ,तमाम अपवादों के बावजूद इन समाचार चैनल्स के तमाम पत्रकार बेहद विपरीत परिस्थितयों में समाचार संकलन का काम कर रहे हैं थकी हारी शिखा त्रिवेदी नक्सली महिलाओं से बिहार जंगलों में इंटरव्यू लेने पहुँच जाती है तो IBN का मनोज राजन बुंदेलखंड में भूख को जीता दिखाई देता है कोशी की बाढ़ पर ndtv के अजय सिंह की कवरेज को ऐतिहासिक न कहना बेईमानी होगी तीसरी आँख की वजह से हमारा लोकतंत्र निरंतर मजबूत हो रहा है ,राजनीति परिष्कृत हो रही है ऐसे में सरकार अगर समाचार चैनलों पर किसी प्रकार कभी सेंसर लागू करती है तो उसे आदर्श स्थिति पैदा करने की कवायद तो कदापि नही कहा जा सकता ,हाँ ये ख़ुद को बार बार कटघरे मैं खड़ा किया जाने के रक्षार्थ की गई राजनैतिक चालबाजी जरुर होगी इस बात का मतलब कत्तई ये नही है की ख़ुद की विवेचना न करें ,ख़बरों के प्रति गैर जिम्मेदाराना रवैया हर कीमत पर छोड़ना होगा ,नही तो सरकार अपने दामन को पाक आफ रखने के लिए तिकड़मों का इस्तेमाल तो करेगी ही ,देश की जनता का एक बड़ा हिस्सा भी हमें किसी मॉल की बिकाऊ सामग्री समझ कर आँखें मूँद आगे
निकल लेगा

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही अद्भुत सुनियोजित और योजनाबद्ध तरीके से लिखा है आपने जो की काफ़ी प्रशंसनीय है/ मेरा ये कहना है की आपको अपनी जागरूकता पर फक्र होना चाहिए, क्योकि एक सुसुप्त मानसिक अवस्था का स्वामी इतने ज्यादा परिष्कृत और डाटा-बेस्ड तरीके से कतई नही लिख सकता है/ मैं ही क्या? हम सब आपके द्वारा परिभाषित इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से सहमत हैं/ लेखनी गज़ब की है/ आपके बारे में मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगा की आप हमेशा इसी धरातल पर रहकर इसी के निवासियों के मेंटल लेवल के साथ ऊंचे ढंग से सोचते हैं, जो की आज के समय में बहुत ही ज्यादा ज़रूरी है/ भविष्य के लिए शुभकामनाएं.

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  2. आप गजब का लिखते है इसमें कोई दो राय नही है, आपका विश्‍लेषण पढ़ा काफी अच्‍छा लगा। आपको हार्दिक बधाई।

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  3. awesh aap ka drstikon janker ek yakin to aaya ki sahi soch ka beej to hai, aur na hirf hai balki vipareet parisithitiyon .mai bhi ankurit ho raha hi aap log hi hai jo karoro logon ki aawaj banker.unke hiton ke liye khade hote hi .sahs to aap mai hi he.eshwer aaop ko awser aur aayu de.aap ke hote koi bahri sarkar bhi so nahi sakti.jame rahiye hamare liye .

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  4. सिर्फ़ संजय दत्त के चुनावी समर में उतरने से सम्बंधित ख़बर दिखाई जा रही ये है कि खबरें नदारद हैं है ,गंभीरता गायब है ,अगर कुछ है तो केवल मनोरजन और उसको परोसने कि यथासंभव जुगत......
    yahi baaten pramukh ho jati hain,kadwa sach parde ke piche kar diya jata hai

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  5. aweshjee aap ki lekhni bahut hi bindas or sajag hai..........
    padkar accha laga........
    god bless u......apki lekhni ki shakti aisey hi bani rahey

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  6. aapne jitna bataaya hai usse kahee jyada ghatiya khabaren "breaking news' bankar parosi jaati hain. ab to ye sab hajam nahi hota.. chupchaap agle din ka newspaper dekh lete hain...

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  7. Aavesh ji

    Namaskar ,

    aapka ye lekh padha , aapne bahut hi prabhavpoorn tarike se electronic media ke baaren me nagn sacchai ko darshaya hai ... aur ye baat bhi sabit karti hai ki
    aajkal electronics media , bhedchaal men shamil hokar , darshoko ko lubhane ke chakkar mein rahta hai ...
    desh mein aisi kai aur jwalnt samasyane hai , par unki taraf ye dhyaan nahi dete..

    main aapko dil se badhai deta hoon.


    aapka

    vijay
    hyderabad
    09849736500

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  8. hello Awesh,
    tumne kafi sach likha hai.tum jaise jagruk insan sayad soye huo ko jaga de,koshish jari rakhna.
    thanks

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  9. aawesh bhai
    yeh samay bada durdant hai aur ise dasyu ki tarah jaalim banane ka kaam media se jude log bahut chaturai se kar rahe hai. ek baar media maafi maangane ko taiyar hai kya ki haa, mumbai ki ghatna ko usne he aur jya vidhwanshak banaya.
    aapne bahu pbadhiya post likha hai. shukriya.
    nirala
    www.bidesia.co.in

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  10. आपने अच्छा लिखा है। सही लिखा है। न्यूज चैनलों में जो कुछ हो रहा है, उसमें काफी कुछ ठीक नहीं है। लेकिन सबकुछ खराब भी नहीं है। खबरी चैनलों में अगर मनोरंजन खाने में अचार की तरह हो, तो ठीक। अगर सामाजिक सरोकार से जुड़ी खबरें गायब हों, अश्लीलता परोसी जाए, तो गलत है। अफसोस ज्यादातर चैनल यही कर रहे हैं। हम हर समय हिंदी चैनलों को गरियाते हैं। अंग्रेजी चैनल देखिए- ड्राइंगरूम वहां सजते हैं। भदेस हिंदी चैनलों में नहीं। वक्त लगेगा हिंदी चैनलों को परिपक्व होने में। अभी प्रयोग और प्रतियोगिता का दौर है। मुझे लगता है-एक समय ऐसा आएगा, जब न्यूज चैनल पत्रिकाओं की तरह हो जाएंगे। इंडिया टूडे या फ्रंटलाइन पड़ना है तो फलां चैनल देखिए, मनोहर कहानियां पसंद हैं, तो उसे देखिए। यानी हर चैनल को पता होगा, दरअसल उसे करना क्या है। दर्शक भी एक हद तक फिक्स होंगे।
    दूसरे एक मजेदार बात आपसे शेयर करना चाहता हूं। लोग एक कुख्यात चैनल को काफी गालियां देते हैं। कहते हैं, घंटे भर तक दिखाता रहा साधु सूखकर लकड़ी बन गया, पाताल में छिपा है स्वर्ग का रास्ता। क्या हो गया है इस न्यूज चैनल को। हंस-हंस कर मजाक उड़ाते हैं। एक किस्म का बतरस हो जाता है। मजा आता है। तो मेरा विनम्र निवेदन है कि आप घंटे भर तक देखते क्यों रहे। चैनल पर आपका नियंत्रण नहीं है- रिमोट तो आपके नियंत्रण में है।
    अच्छे लेख के लिए बधाई।

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  11. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  12. khabriya channelon par aaj khabren puri tarah nadarat hai ,par kuch exception bhi mojood hai jo acha kaam kar rhi hai,par aaj ka daur aisa aa chuka hai agar jo bikta hai wo dikhta hai ki baat na maani jae to vigyapan kahan se aayega?
    channel kaha se chalega,darshakon ke paas remote to hai,jis se wo channel badal sakta hai,par tab kya jab har channel "lakeer ka faqeer"ban chuka ho,tab darshak khud ko thagasa mehsoos karta hai,har jagah ek he raag "bla bla bla"

    March 8, 2009 1:53

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