बुधवार, 8 जुलाई 2009

बारूद के ढेर पर बैठा हिन्दुस्तानी स्विट्जरलैंड


{देश की उर्जा राजधानी में महज एक सप्ताह के भीतर अलग अलग हुए विस्फोट में लगभग ४२ जाने गई हैं ,देश की उर्जा जरूरतों को पुरा करते करते थक चुकी सोनभद्र -सिंगरौली पट्टी ,जिसका नाम भी बहुतों ने नही सुना होगा ,फ़िर भी सुर्खियों में नही है |मेरी ये पोस्ट वहां की स्थिति का विश्लेषण कर रही है ,ये आज हिन्दी दैनिक 'डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट' में प्रकाशित भी हुई है ,

-आवेश तिवारी


पंडित नेहरु का स्विट्जरलैंड आज बारूद के ढेर पर बैठा है , एशिया के सबसे बड़े एनर्जी पार्क में प्रतिदिन ४० से ५० टन जिलेटिन रोड्स और लगभग १.५ लाख खतरनाक डिटोनेटर का इस्तेमाल हो रहा है ,इन विस्फोटकों की चपेट में आकर प्रति माह औसतन ३ से ४ मौतें हो रही हैं ,भूगर्भ जलस्तर रसातल में चला गया है ,वहीँ समूचा पारिस्थितिक तंत्र छिन्न भिन्न हो गया है ,शायद इस बात पर यकीं करना कठिन हो मगर ये सच है कि सोनभद्र सिंगरौली पट्टी आतंकवाद की नयी चुनौतियों से जूझ रहे देश में गैरकानूनी बारूदों की खरीद फरोख्त का सबसे बड़ा केंद्र बन गयी है ,शर्मनाक ये है कि ये सारा गोरखधंधा उत्तर प्रदेश सरकार ,सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस की जानकारी में फल-फूल रहा है |विस्फोटकों के इस गोरखधंधे में जहाँ नवधनाड्यों की फौज तैयार हो रही हैं ,वहीँ मंत्री से लेकर संतरी तक लाल हो रहे हैं |स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों जब एक ट्रक से जब लगभग ४० टन अमोनियम नाइट्रेट बरामद हुआ तो एकबारगी हड़कम मच गया लेकिन महज तीन दिनों बाद ही पुलिस की मिलीभगत से गैरकानूनी अमोनियम नाइट्रेट की आमद फिर से शुरू हो गयी |आज आलम ये है की सारे विस्फोटक गाजर मूली की तरह यहाँ के खनन क्षेत्र में बेचे जा रहे हैं ,न सिर्फ बेचे जा रहे हैं, बल्कि इनकी क्षमता से अनभिज्ञ मजदूरों से इनका इस्तेमाल कराया जा रहा है | ये सब कुछ तब है जब खुद प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर अपनी आपति दर्ज करा चूका है |मौजूदा समय में बिल्ली मारकुंडी खनन क्षेत्र की लगभग ३०० अवैध खदानों में गैर कानूनी विस्फोटकों का इस्तेमाल हो रहा है,जो अंतर्राज्यीय तस्करों के माध्यम से यहाँ पहुंचाए जा रहे हैं ,सिर्फ इतना ही नहीं यहाँ मौजूद लाइमस्टोन ,.डोलोमाईट और कोयलों की खदानों में विस्फोटकों के सुरक्षित इस्तेमाल को लेकर भी किसी प्रकार की कोई कवायद नहीं चल रही है ,पिछले एक सप्ताह के दौरान बैढन और बिल्ली मारकुंडी में घटी अलग अलग घटनाएँ इसका सबूत हैं |
अगर आप सोनभद्र पहली बार आ रहे हैं तो यहाँ के खनन क्षेत्रों का दौरा जरुर कीजिये ,अगर आपको हाथ में डिटोनेटर लेकर घूमते बच्चे नजर आ जाएँ तो आश्चर्य मत करियेगा ,मजदूरों की झोपडियों में आपको बोरे में रखा अमोनियम नाइट्रेट मिलेगा ,वहीँ खदानों में माइनिंग जाल बिछाती आपको महिलायें नजर आएँगी ,एक्टिविस्ट को जानकारी मिली है कि यहाँ की खदानों में जितने भी लोगों को विस्फोटक नियंत्रक कार्यालय ,आगरा से लाइसेंस निर्गत किये गए हैं उन सभी ने लाइसेंस प्राप्त करने की निर्धारित योग्यता पूरी नहीं की है |कमोवेश यही हाल सिंगरौली क्षेत्र का भी है ,जहाँ रेवड़ियों की तरह कारखानों को लाइसेंस बांटे गए हैं|
-क्या कभी आपने लाशों की खरीद फरोख्त देखी है ,अगर नहीं ,तो भी आपको सोनभद्र आना चाहिए |यहाँ के खनन क्षेत्रों में होने वाली ९० फीसदी मौतों में गुनाहगारों को कोई सजा नहीं मिलती ,वजह साफ़ है पुलिस द्वारा ऐसे किसी भी मामले में मुकदमा दर्ज करने के बजाय मामले को ले- देकर निपटाने में लग जाती है ,जिस किसी की खदान में घटना होती है ,पुलिस उसके मालिकों से मोटी रकम लेकर मृत व्यक्ति के परिजनों को भी थोडी बहुत रकम दिला कर मामला ख़त्म करने की कोशिशें करने लगती हैं पीड़ित पक्ष को ये नसीहत दी जाती है कि तुम गरीब आदमी हो मुकदमा नहीं लड़ पाओगे ,थका हरा मजदूर मरता क्या न करता मुँह बंद रखता है |स्थिति का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि पिछले ६ माह के दौरान डाला - बिल्ली खनन क्षेत्र में घटी किसी भी दुर्घटना में कोई भी प्राथमिकी दर्ज नहीं की गयी ,जबकि इस दौरान कूल १६ मौतें हुई |हमने इस रिपोर्ट के लिए खदानों में मारे गए लोगों के परिजनों से मुलाक़ात कि तो ये एक बड़ा सच सामने आया कि लगभग सभी मामलों में पुलिस की भूमिका संवेदनहीन रही |
नौतौलिया की सविता का पति पिछले साल ,खदान में हुई ब्लास्टिंग के दौरान बोल्डर गिरने से अकाल मौत का शिकार हो गया था ,अब पहाड़ सी जिंदगी और सविता के दो छोटे बेटे ,जब हम उसके दरवाजे पर पहुँचते हैं तो न जाने क्यूँ सविता के साथ साथ उसके बच्चे फ़ुट फ़ुट कर रो पड़ते हैं ,वो कहती है 'पुलिस ने केवल पांच हजार रूपया दिलवाया था ,हम कोर्ट कचहरी कुछ नहीं जानते ,?क्या करते |आज मेरे बच्चे दाने दाने को मोहताज हैं ,हम किसके पास जाएँ ?झिग्रादंदी का ७० साल का रामकेवट हमरे सवालों पर मूक हो जाता है ,उसके बेटे की १० दिनों पहले ही शादी हुई थी जब उसकी खदान में बारूद भरते वक़्त मौत हो गयी ,मालिक ने सिर्फ कफ़न दिया ,वो बताता है हम पुलिस से ऍफ़ ,ई ,आर की विनती करते रहे ,लेकिन उन्होंने हमें गाली देकर भगा दिया ,उसकी पत्नी कहती है अब किस्से कहूँ मेरा बेटा लाये ?यही हाल दशरथ ,शंकर ,अर्जुन सभी का है ,सभी की बलि अवैध खदानों ने ले ली ,लेकिन शर्मिंदगी को धत्ता बताते हुए पुलिस अपनी जेबें गरम करने में लगी रही |
बारूद की चपेट में आकर होने वाली दुर्घटनाओं का दुखद पहलु ये है कि मरता दलित आदिवासी ही है,अभी हाल ही में सोनभद्र में हो रही इन अकाल मौतों पर सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा ,न्यायालय ने इन मौतों पर प्रदेश सरकार के हलफनामा दाखिल न करने पर कड़ी आपति करते हुए जिलाधिकारी को ही पार्टी बनाने का हुक्म सुना दिया ,न्यायालय का कहना था कि गरीब आदिवासी न्यायालय और थाने जाने में घबराता है जरुरत इस बात की है कि न्यायालय और पुलिस उस तक पहुंचे ,लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस के पास ये सहृदयता दिखने वाला चरित्र नहीं है |भले ही यहाँ पर दलितों की रहनुमाई का दावा करने वाली सरकार हो |यकीं न करें मगर सच है खुद को प्रदेश के विधानसभाध्यक्ष का नजदीक बताने वाले एक सब इंसपेक्टर को सारे नियम कानूनों को धत्ता बताते हुए खाना क्षेत्र के थाने में सिर्फ इसलिए तैनाती दे दी गयी ,क्यूंकि वो बारूदों की खेती और उस खेती में कुचले जाने वाले लोगों की कीमत जानता था |


माइनिंग इंजिनियर ऐ .बी सिंह कहते है लगातार हो रही दुर्घटनाओं के बावजूद नियंत्रक कार्यालय का कोई भी अधिकारी यहाँ नहीं आता ,चूँकि गैरकानूनी विस्फोटकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है इसलिए खराब गुणवत्ता वाले विस्फोटकों की आमद भी बढ़ी है ,जो अक्सर दुर्घटनाओं का सबब बन जाते हैं ,इस पूरी स्थिति के लिए खान सुरक्षा निदेशालय जबलपुर भी कम जिम्मेदार नहीं है ,सोनभद्र और सिंगरौली की सभी खदानों में सुरक्षा नियमों को लागू कराने की जिम्मेदारी निदेशालय की है लेकिन वहां के अधिकारी ४-६ महीने में सिर्फ एक बार वसूली की गरज से ही आते हैं |उत्तर प्रदेश खनिज विभाग नयी नवेली दुल्हन की तरह सिर्फ मुँह दिखाई लेना ही जानता है ,न अधिकारियों का न मंत्री को, किसी के मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता |
मिनी भोपाल कहे जाने वाले सोनभद्र सिंगरौली पट्टी में कथित विकास की होड़ में घातक उद्योगों को नियमों का उल्लंघन करके अनुमति दी जा रही है ,पहले कनोडिया केमिकल ,फिर बैढन और बार -बार बिल्ली -मारकुंडी खनन क्षेत्र ,विस्फोटों से होने वाली अकाल मौतें और उसके एवज में काली कमाई सोनभद्र की नियति है |अकेले सोनभद्र पुलिस सालाना खनन क्षेत्रों और बारूद विक्रेताओं से ५से १० करोड़ रुपयों की वसूली करती है ,न सिर्फ वसूली करती है धर पकड़ की धमकी देकर साझेदारी भी हथियाई जाती है |मुलायम सिंह के शासनकाल में जब नरकती में पी ए सी की गाडी पर हमले के बाद यहाँ के खनन क्षेत्र से नक्सलियों को विस्फोटकों की आपूर्ति का खुलासा हुआ था तब गृह मंत्रालय की पहल पर ,विस्फोटकों के प्रयोग के नियमन की कोशिशें की गयी थी ,लेकिन सत्ता प्रवर्तित होते ही सब कुछ बदल गया ,समूचे खनन क्षेत्र पर मंत्रियों विधयाकों के रिश्तेदारों ,माफियाओं और दबंगों का कब्जा हो गया ,अवैध खनन बढा ,साथ में गैर कानूनी विस्फोटकों का इस्तेमाल भी |

इस पूरे मामले का दूसरा पहलु उद्यमियों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों द्वारा बरते जाने वाली लापरवाही से जुडा है ,नियमों का खुला उल्लंघन करते हुए जैसे तैसे बारूद का प्रयोग किया जाता है ,समूचे खनन क्षेत्र में कहीं भी नियमानुकूल मैगजीन की स्थापना नहीं की गयी है ,आलम ये है कि वैध खनन करने वाले भी अवैध बारूद इस्तेमाल करते हैं |
उत्तर प्रदेश में पिछले वर्ष ३४हजार डेटोनेटर ७०० किलोग्राम विस्फोटक सामग्री और ३४ टन अमोनियम नाइट्रेट बरामद किया गया था बरामद की गयी ज्यादातर सामग्री सोनभद्र के खनन क्षेत्रों से सम्बंधित थी जो कि आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के रास्ते यहाँ लायी गयी थी | मुंबई हमले के बाद पूरे देश में अमोनियम नाइट्रेट पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया लेकिन सोनभद्र के खनन क्षेत्र में इसकी गैर कानूनी आवक का दौर नहीं रुका, महत्वपूर्ण है कि अब चोरी छपे बेचे जा रहे अमोनियम नाइट्रेट के बोरों पर कनाडा की एक कंपनी की सील लगी रहती है |पुलिस अधीक्षक सोनभद्र से जब अमोनियम नाइट्रेट की बिक्री और विस्फोटकों की गैर कानूनी आवक के बारे में पूछा गया तो उन्होंने किसी प्रकार की टिप्पणी करने से इनकार कर दिया|कुछ वर्ष पूर्व तक खनन क्षेत्र में विस्फोटकों के लाइसेंस धारकों के स्टॉक रजिस्टर की समय समय पर पुलिस खुद जांच करती थी,l लेकिन सत्ता परिवर्तन के साथ साथ ये कवायद भी ख़त्म हो गयी |आज हालत ये हैं कि लगभग ३०० की संख्या में चल रही अवैध खदाने पूरी तरह से इन गैरकानूनी ढंग से आने वाली विस्फोटकों की आमद पर टिकी है
नाम न छपने की शर्त पर एक उद्यमी बताते हैं कि अगर हम अवैध बारूद की खरीद न करें तो हमें व्यवसाय बंद करना पड़ जायेगा ,क्यूंकि बारूदों के सप्लायर भी अवैध खनन वालों को ही ज्यादातर माल देते हैं क्युकी उसके एवज में उन्हें मोटी रकम मिल जाती है ,जबकि हमसे उन्हें कम पैसा मिलता है ,लगभग यही हाल को़ल कंपनियों का है ,कमाई के लालच में ऐसे लोगों को कारखाना स्थापित करने की इजाजत दे दी जाती है ,जिन्हें नियम कानूनों से कोई मतलब नहीं होता |समाजसेवी रागिनी बहन कहती हैं किसी को आम आदिवासियों और मजदूरों की मौत से सरोकार नहीं है ये संवेदनहीनता की इन्तेहाँ है |
दोपहर के १२ बजते ही वाराणसी शक्तिनगर मुख्य मार्ग पर रफ्तनी रुक जाती है ,सड़कों पर बैरिकेटिंग लगाये खनन माफियाओं के गुर्गे लाल झंडा टांग कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं उधर खनन क्षेत्र में काम करने वाले लगभग ५० हजार मजदूर अपने बच्चों को लेकर या तो दूर खुले आस्मां के नीचे निकल जाते हैं या फिर खनन क्षेत्र के बाहर कड़ी गाड़ियों की ओट ले लेते हैं ,उधर प्रशिक्षित अप्रशिक्षित ब्लास्टर की सीटियों के साथ शुरू होता है विस्फोटों का दौर ,लगभग २ घंटे तक पूरा खनन क्षेत्र धमाकों से गूंजता रहता है ,पत्थरों के छोटे बड़े टुकड़े कभी आस पास की इमारतों पर ,तो कभी सड़क चलते राहगीरों को और अक्सर पत्थर तोड़वा मजदूरों को अपनी चपेट में ले लेते हैं ,फिर भी ये क्रम नहीं रुकता |
खनन मजदूर संगठन के नेता डा.सरोज कहते हैं सब कुछ नियम विरूद्व है क्या क्या रोकेंगे आप ?देश में ये एक मात्र जगह है जहाँ राजमार्ग जाम करके ब्लास्टिंग करायी जाती है |चूँकि सब कुछ इतना लापरवाही पूर्ण होता है कि दुर्घटना की सम्भावना हमेशा बनी रहती है ,यूँ तो खनिज नियमावली में आबादी के आस पास के इलाकों में ब्लास्टिंग पूरी तरह से प्रतिबंधित है लेकिन सोनभद्र के परिप्रेक्ष्य में कोई नियम कानून काम नहीं करता ,राजमार्ग के किनारे विस्फोटन को लेकर भी किसी के पास कोई जवाब नहीं है ,लेकिन जब सरकार खुद ही सड़क किनारे पट्टे की इजाजत दे तब आप क्या करेंगे ?इतना ही नहीं पूरे खनन क्षेत्र में नियंत्रित विस्फोट करने के बजाय भारी विस्फोट किया जाता है , इन सब का खामियाजा अगर गरीब मजदूर भुगतता है तो किसी का क्या बिगड़ता है ?

शनिवार, 20 जून 2009

लालगढ़ में लालसलाम


धूमिल की एक कविता अक्सर मेरे जेहन में उतर आती है ,जो कुछ इस तरह है -
वो धड से सर ऐसे अलग करता है
जैसे मिस्त्री बोल्टू से नट अलग करता है
तुम कहते हो हत्याएं बढ़ रही हैं
मैं कहता हूँ कि मेकनिस्म टूट रहा है

लालगढ़ में सचमुच मेकेनिस्म टूट रहा है ,ये मेकेनिस्म उस वामपंथ का है जिसने न सिर्फ देश के एक बेहद समृद्ध राज्य को नेस्तानाबूद कर डाला ,बल्कि लोकतंत्र के सीने पर चढ़कर उसको अपनी रखैल बनाने की कोशिश करने लगा |ये वो वामपंथ था ,जिसने पूंजीवाद को गले लगाया और सर्वहारा वर्ग का प्रतीक बनने की कोशिश में राजनीति के मर्यादाओं की सरेआम हत्या कर दी ,ये हत्या बार बार हुई ,चाहे वो पूर्वी भारत में नक्सलियों के हाथों बेगुनाह नागरिकों और पुलिस के जवानों की हत्या का मामला हो ,चाहे वो नंदीग्राम में सी पी एम कार्यकर्ताओं द्वारा अपनी जमीन के लिए लड़ रही महिलाओं के सामूहिक बलात्कार का मामला हो ,या फिर महंगाई के बेहद तल्ख़ सवाल पर अपने होंठ सीकर ,परमाणु करार की बात को लेकर देश की जनता को बेवकूफ बनाने का शगल और उसकी दुहाई देकर पॉलिटिकल ब्लैक मेल करने की कुत्सित कोशिश हो ,हर जगह इन वामपंथियों का दोहरा चेहरा नजर आया ,इनका वामपंथ ,मार्क्स का वामपंथ न होकर वातानुकूलित कमरों में सत्ता की चुस्कियों के साथ तैयार किए गए 'कुर्सी पर काबिज रहो अभियान ' का औजार था ,जिसमे पूंजीवादियों ,परिवारवादियों,और शोषकों की नयी फसल तैयार हो रही थी |अब जो लालगढ़ में हो रहा है वो विशुद्ध नक्सलवाद है ,वो सिंगुर ,नंदीग्राम ,मिदनापुर में मार्क्स के नाम पर अब तक की गयी ठगी ,उत्पीडन ,और गण हत्या का प्रतिकार है | गांव पर नक्सलियों का कब्जा गांव वालों की सहमति से हुआ है ,अब तक ४ वामपंथियों के मारे जाने की सूचना भी मिली है ,निश्चित तौर पर किसी भी निर्दोष की हत्या निंदनीय है ,लेकिन ये भी सच है की पश्चिम बंगाल के ग्रामीण समाज में किसान को किसानो से लड़ने का बीज भी वामपंथियों के द्वारा बोया हुआ है |


अगर आप लालगढ़ जायेंगे ,तो वो वहां आपको देश के किसी समृद्ध गांव की झलक देखने को मिलेगी |बड़े तालाब ,सड़कें ,ट्यूब वेल्स ,और लहलहाते खेत नजर आयेंगे ,आप यकीं मानिये इस गांव के विकास में बम सरकार की एक दमडी नहीं लगी है ,नक्सली संगठन People's Committee Against Police Atrocities ने महज पांच महीनो में इस गांव की रंगत बदल दी ,अपने चरित्र से अलग हटकर माओवादियों ने ,यहाँ स्वास्थ्य सेवाओं और सहकारी समितियों के निर्माण के लिए जमकर काम किया ,जबकि इसके पहले ये वो इलाका था जहाँ बाम सरकार अपनी विकास योजनाओं को लागू करने की बात तो दूर ,नरेगा जैसी केंद्र सरकार की योजना को भी लागू नहीं कर पायी थी | अघोषित मार्शल ला लगाकर समूचे पश्चिम बंगाल में मानवाधिकारों और मौलिक अधिकारों की हत्या कर रहे वामपंथ ने यहाँ भी भय और दहशत का माहौल बना रखा था |,स्थानीय पंचायतों ,विधायकों ,पुलिस एवं सुरक्षा बलों ने जनता की आवाज न सुनकर सी पी ऍम के कैडर की तरह काम किया ,जो भी आवाज उत्पीडन के खिलाफ उठती थी कुचल दी जाती थी , ,बिजली ,पानी जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए लालगढ़ और उसके आस पास के सैकडों गांव त्राहिमाम कर रहे थे ,सारे विकास कार्य ठप पड़े थे ,लालगढ़ और उसके आस पास के इलाकों में भूख से लगातार मौतें हो रही थी पर बुद्धदेव अनजान थे |हर आवाज खुद में ही गूम हो जा रही थी ,कहीं कोई भी सुनवाई नहीं ,सारे रास्ते बंद हो चुके थे |उसके उपरांत नंदीग्राम और सिंगुर में मार्क्सवादियों ने एक बार पुनः अपना असली चेहरा दिखाया ,हत्याओं और बलात्कार का खौफनाक दौर शुरू हुआ ,दर्द की इन्तेहा आम ग्रामीण बर्दाश्त नहीं कर पाए और लोकतान्त्रिक देश में लोकतंत्र को ठुकराकर बन्दूक की गोलियों बल पर जीने की आखिरी कोशिश की जाने लगी ,आज अगर वहां की जनता स्त्री ,पुरुष ,बच्चे हांथों में तीर कमान लेकर नक्सलियों का सुरक्षा ढाल बन रहे हैं तो वो सिर्फ और सिर्फ जीने की आखिरी कोशिश है |

रविवार को देश के सभी समाचारपत्रों में मुख्य पृष्ठ पर भयभीत पश्चिम बंगाल सरकार का एक विज्ञापन प्रकाशित हुआ है जिसमे वाममोर्चा ने अपने ३३ वर्ष के शासनकाल को स्वर्णिम बताते हुए ,खुद को जनता के लिए और जनता की सेवा में समर्पित बताया है |निश्चित तौर पर ये विज्ञापन बुद्धदेव सरकार के मीडिया मैनेजमेंट का हिस्सा है ,क्यूंकि वो जानते हैं कि विश्व के अन्य राष्ट्रों की तरह भारत में भी वामपंथ का अंत सुनिश्चित है ,उनके लिए लालगढ़ ,अब तक का सबसे बड़ा आश्चर्य है ,वो उस सांप के दंश की तरह है जिसे खुद वामपंथ न सिर्फ पश्चिम बंगाल बल्कि पूरे देश में दूध पिला रहा है |देश के एक मात्र ऐसे प्रदेश में जहाँ नक्सली संगठनों पर प्रतिबन्ध न लगा हो ,वहां हुई ये घटना वामपंथ के ताबूत में आखिरी कील साबित होगी |,अगर आज प्रकाश करात और उनकी मंडली ,इस पूरे घटनाक्रम के लिए तृणमूल कांग्रेस को दोषी ठहराती है ,तो उसके पीछे भी राजनैतिक अस्तित्वहीनता से जुडा भविष्यगत भय है |साम्यवाद के नाम पर राजनैतिक दादागिरी तथा जनभावनाओं की उपेक्षा करने का परिणाम अभी जनविद्रोह के रूप में सामने आया है आने वाले समय में वामपंथ के समूल विनाश के रूप में इसे हम देखेंगे |

इस पूरी तस्वीर का एक दूसरा पहलु भी है ,वामपंथ के प्रति राष्ट्रव्यापी आक्रोश के बावजूद ,लालगढ़ की घटना पर हम ताली नहीं बजा सकते ,ये शोक का वक़्त है ,देश और समाज के लिए खतरे कि घंटी है |राजनैतिक विश्लेषक आलोक गुप्ता पूछते हैं कि कल को अगर भारत सरकार से देश की जनता नाराज हो जाये तो संभव है तो क्या पूरे देश पर कब्जा करने का अधिकार नक्सलियों को दे दिया जाना चाहिए ?निसंदेह नहीं |हमें अपनी समस्याओं का समाधान लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ही ढूँढना होगा ,आज अगर लालगढ़ में आतंक का माहौल है तो उसके लिए कांग्रेस और ममता बनर्जी भी कम उत्तरदायी नहीं हैं ,ममता दिल्ली में कितना भी चिल्ला लें ,पश्चिम बंगाल में कभी भी जोरदार विपक्ष के रूप में खुद को स्थापित नहीं कर पायी ,वहीँ कांग्रेस ने कभी कुर्सी बचाने से जुडी अपनी जरूरतों तो कभी अपनी चारित्रिक विशेषताओं की वजह से होंठ सी रखे थे |समय रहते वहां सुरक्षा बल नहीं भेजना उसी चरित्र का प्रतिक है |पश्चिम बंगाल के एक बड़े क्षेत्र में जनविद्रोह की ये घटना ,भारतीय राजनीतिज्ञों के लिए कार्यशाला साबित होने जा रही है ,अगर अब भी राजनैतिक पार्टियाँ सबक नहीं लेती ,और जनाधिकारों की अवहेलना कर अधिनायकवाद स्थापित करने की कोशिश करती हैं ,तो हम दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लोकतान्त्रिक देश के नागरिक होने का गौरव खो देंगे |

सोमवार, 1 जून 2009

ऑस्ट्रेलियाई मूसल में हिन्दुस्तानी सर


नस्लवाद का प्रतीक बनते जा रहे ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हमले की खबरें इन दिनों सुर्खिया बनी हुई हैं दो चार दिनों में इस मामले में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के और भी गरम होने के आसार हैं |क्रिकेट हो या पढाई ,नस्लवाद ऑस्ट्रेलिया के चरित्र का हिस्सा बन चूका है और हम सब ये सच्चाई जानते हैं |चाहे भारतीय चिकित्सकों को आतंकवादी करार देकर उन्हें प्रताड़ना देने का मामला हो ,खेल के मैदान पर हिन्दुस्तानी खिलाड़ियों को भद्दी गालियाँ देने की बात हो या फिर महज ६ माह में ५०० हिन्दुस्तानियों को आपराधिक मामलो में जेल भेजने का ,हर जगह ,हर कहीं ,गंभीर रूप से नस्लवाद मौजूद रहता है |यहाँ हमारी इस पोस्ट में बात महज ऑस्ट्रेलिया और उसकी नस्लवादी नीतियों की नहीं होगी अपितु हम उन हिन्दुस्तानियों पर भी बात करेंगे जो खुद अपना सर मूसल में डालने को तैयार बैठे हैं ,,जी हाँ ,ये सच है की ऑस्ट्रेलिया जाने वाले ज्यादातर छात्र उन करोड़पति माँ बाप की संतान हैं ,जो अपने बच्चों को डॉक्टर इंजिनियर और विदेश में पढाई का तमगा दिलाने के लिए कोई भी कीमत देने का मादा रखते हैं ,आम आदमी का बच्चा ऑस्ट्रेलिया पढने नहीं जाता| उन्हें आज देश की याद आती है जब बाहर वाले उन्हें अपमानित करते हैं ,नहीं तो वो खुद को एन ,आर आई बनाने के लिए सारी कसरते कर रहे होते हैं |हमने आज जब अपने एक रिश्तेदार से सिडनी में पढ़ रहे उनके हमेशाथर्ड डिविजन पास होने वाले बच्चे का हाल चाल पूछा ,तो उन्होंने बच्चे का हाल कम बताया ,भारत सरकार की विदेश नीति की ऐसी की तैसी कर दी |एक ऐसे देश में जहाँ आज भी ४० फीसदी बच्चे प्राथमिक शिक्षा से वंचित हैं ,ऐसे देश में जहाँ उच्च शिक्षा के अवसरों को लेकर युद्घ की सी स्थिति है ,एक ऐसे देश में जहाँ खाली पेट किताबों से दोस्ती करने की ढेर सारी कहानियां मौजूद हैं ,उस देश में चॉकलेट संस्कृति की उपज इन छात्रों के लिए रोने की कोई वजह फिलहाल मेरे पास तो मौजूद नहीं है |साथ ही मैं दो चार की संख्या में वहां मौजूद किसान परिवारों केलड़कों को लेकर भी मातम मनाने नहीं जा रहा ,जो अपने बाप -दादा की जमीन बिकवाकर विदेशी डिग्री लेने को लालायित हैं |हाँ हमें इस बात पर जरुर गहरा ऐतराज है की हिन्दुस्तानी छात्रों के नाम पर ,हिन्दुस्तान को अपमानित करने की कोशिश की जा रही है |ये पूरा मामला ऑस्ट्रेलिया के नस्लवाद के साथ साथ ,हमारे देश में गहरी जड़े जमा चुके शैक्षणिक नस्लवाद से भी जुडा है ,हमें इस विषय पर भी बात करनी ही होगी क्यूँकर वर्षों की तैयारी के बाद आई आई टी में असफल होने के बाद गरीब बाप का बेटा पल्लव पहले कॉलेज की सीढियों पर फूट -फूट कर रोता है ,फिर फांसी लगा लेता है |

ऑस्ट्रेलिया में हिन्दुस्तानी छात्रों पर हमले के बीच अब जबकि देश के लगभग सभी हिस्सों में १२ वीं कक्षा के परिणाम लगभग घोषित हो चुके हैं ,उन बिचौलियों और एजेंसियों के हाँथ पाँव फूले हुए हैं जो विदेश में अध्ययन के नाम पर यहाँ के अमीरों से भारी वसूली करते थे |दिल्ली की एक बड़ी एजेन्सी ने अपना घाटा होते देख ,बड़े समाचारपत्रों को भारी भरकम विज्ञापन देकर उनसे .नस्लीय हिंसा की ख़बरों को ज्यादा तरजीह न देने की बात भी मनवा ली है ,वहीँ डोनेशन में ताबड़तोड़ छूट की घोषणाएं की जा रही हैं |आप यकीं मानिए पिछले साल ऑस्ट्रेलिया सरकार ने भारतीय छात्रों को लुभाने के लिए विज्ञापनों पर 35 लाख डॉलर खर्च किए थे।साथ ही हर साल भारत के छात्रों से ऑस्ट्रेलियाई सरकार को लगभग 8000 करोड़ रुपये हासिल होते हैंआज मंदी के इस भयावह दौर में वहां की अर्थव्यस्था का एक बड़ा हिस्सा विदेशी छात्रों की फीस से ही आना है |ऐसे में ये तय है कि अगर विदेशी छात्रों ने ऑस्ट्रेलिया से मुँह मोडा तो उनकी अर्थव्यवस्था चिन्न -भिन्न हो जायेगी ,मगर ये तय है हमेशा की तरह इस वर्ष मेभी हजारों छात्र लाखों खर्च करके विदेश पढने जायेंगे ,ये वे छात्र होंगे जिन्हें देश के प्रतिष्ठित संस्थाओं में प्रवेश पाने की योग्यता नहीं होगी ,लेकिन कल को वहां से पढ़कर आने वाला लड़का विदेशी डिग्री की चमक के साथ हमारे यहाँ के होनहार छात्रों के हांथों से न सिर्फ अवसर छीन लेगा ,बल्कि उसे उठाकर पिछली पंक्ति में बैठा देगा |मेरी पत्रकार मित्र सोमाद्री शर्मा कहती हैं कि आस्ट्रेलियन सरकार गैरबराबरी का हथकंडा यहाँ भी अपनाती है ,जो छात्र ऊँची फीस देते हैं उन्हें तो सीधे प्रवेश देदिया जाता है लेकिन इंडो-आस्ट्रेलियन शैक्षणिक सहयोग के तहत निर्धारित मुफ्त सीटों के लिए प्रवेश परीक्षा इतनी कठिन कर दी जाती है कि उनमे से ज्यादातर छात्र फ़ेल हो जाते हैं ,अनियमितता का आलम ये है कि पिछले कई वर्षों से इन मुफ्त सीटों को भरा ही नहीं जा रहा है चूँकि देश के कई बड़े नेताओं के नाते रिश्तेदार भी वहां पढ़ रहे हैं इसलिए इस गंभीर मसले पर सभी ने अपने होंठ सी रखे हैं |
लगातार अपमान सहने और लात घूंसा खाने के बावजूद ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीयों की बेशर्मी देखिये ,भारतीय समुदाय ने रविवार एक बैठक करके आस्ट्रेलियन सरकार का पक्ष लेते हुए कहा कि ऑस्ट्रेलिया को नस्लभेदी देश करार देने में जल्दबाजी नहीं की जानी चाहिए ,यहाँ सरकार को इस समस्या से निबटने का मौका देना चाहिए ,पूर्व भारतीय काउंसलेट जनरल टी,जे राव ने कहा कि ये मामला नस्लभेद का नहीं है बल्कि भारतीय छात्रों की रक्षा का है ,४० सालसे ऑस्ट्रेलिया में रोटी तोड़ रहे राव महोदय का कहना है कि मेरे साथ जब कभी गैरबराबरी का भेदभाव नहीं किया गया | सिडनी में रहने वाले एक चिकित्सक ने तो कहा कि ऑस्ट्रेलिया नस्लभेदी नहीं है भारतीयों पर जो हमले हुए वे सभी नस्लभेदी नहीं हैं ,शायद ये लोग वहां पढ़ रहे भारतीय छात्रों की हत्याओं का इन्तजार कर रहे हैं ,या फिर लाख अपमान के बावजूद गोरी चमडी के बीच रहने के सुख को वो छोड़ना नहीं चाहते |भारत में ऑस्ट्रेलिया के हाई कमिश्नर जोनमाइक क्रथि ने इस पुरे मामले पर ये कहकर कि विश्व में हर जगह किसी न किसी रूप में नस्लवाद मौजूद है ,अपनी सरकार की सोच जगजाहिर कर दी है ,मौजूदा समय में आस्ट्रेलियन प्रधानमंत्री केविन रूड अगर बगले झांकते नजर आ रहे हैं तो सिर्फ इसलिए कि उन्हें अपने देश के चरित्र पर से नकाब उतरने का भय है |
अभी पिछले दिनों सुरक्षा का हवाला देते हुए ऑस्ट्रेलियाई टीम ने चेन्नई में होने वाले डेविस कप में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। इसके पूर्व कई बार सुरक्षा उपायों का हवाला देकर ऑस्ट्रेलिया बार बार अपने क्रिकेट दौरों में परिवर्तन करता रहा है ,रविवार को नस्लीय विवाद के बाद भारतीय छत्रों द्वारा शांति मार्च निकाला गया था इस रैली के बाद ऑस्ट्रेलियाई पुलिस ने 18 छ्त्रों को हिरासत में ले लिया था। पुलिस ने भारतीय छात्रों पर लाठियां बरसाई और हालात यह थे कि एक छात्र को छह-छह पुलिस वाले घेरे हुए थे। इन छात्रों को पुलिस ने हिंसा फैलाने के नाम पर हिरासत में लिया। रैली के दौरान पुलिस ने छ्त्रों पर लाठी चार्ज किया और उन्हें बुरी तरह घसीट कर ले गई।ये इन्तेहाँ है ,मगर अफ़सोस अपमान के बावजूद हम ऑस्ट्रेलिया को लेकर कोई नीति तय नहीं कर पाए |अगर यही हाल किसी एक दो आस्ट्रेलियन नागरिकों के साथ यहाँ भारत में हुआ होता तो वहां की सरकार कब का अंतर्राष्ट्रीय लोबिंग के साथसाथ अपने नागरिकों को भारत छोड़ने का फरमान जारी कर चुकी होती | जरुरत इस बात की है कि पहले भारत सरकार अपना राजनयिक अभियान तेज करते हुए ऑस्ट्रेलिया सरकार से हमलावरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गारंटी के साथ साथ ऐसी घटनाओं की पुनरावृति न होने का आश्वाशन ले ,वहीँ तब तक अपने सभी नागरिकों को वापस भारत बुलाना सुनिश्चित करे ,अगर ऐसा नहीं होता तो भारत को तात्कालिक तौर पर ऑस्ट्रेलिया से सभी प्रकार के राजनयिक सम्बन्ध भी ख़त्म कर लेने चाहिए साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ में इस मामले को उठाना चाहिए , आई सी सी में भी यह पूरा मामला उठाकर क्रिकेट में भी ऑस्ट्रेलिया पर प्रतिबन्ध लगाये जाने की मांग की जानी चाहिए |क्यूंकि आस्ट्रेलियन क्रिकेट भी पूरी तरह से रंगभेद का प्रतिक बन चूका है लेकिन इन सबसे पहले जरुरी ये है कि पैसों के बल पर अपने बच्चों का भविष्य तैयार करने में लगे अभिभावक अपनी जमीन पहचाने ,सरकार को भी चाहिए कि आरक्षण और आश्वाशन कि राजनीति छोड़कर उच्च शिक्षा के अवसरों में तात्कालिक तौर पर बढ़होतरी के उपाय करे ,नहीं तो मंदी के इस दौर में वो दिन दूर नहीं जब पूरी दुनिया से हमें खदेडा जाएगा |

रविवार, 17 मई 2009

सेक्स क्रांति में तब्दील हो रही रक्त क्रांति



-नक्सली संगठनों में यौन उत्पीडन का भयावह दौर
-पुलिस और नक्सलियों के बीच पीस रही महिला गुरिल्लायें


नक्सली संगठनों ने सामाजिक राजनीतिक बदलाव की मुहिम छोड़ कर महिलाओं का बर्बर उत्पीड़न शुरू कर दिया है उत्तर प्रदेश,बिहार झारखण्ड और छतीसगढ़ के सीमावर्ती आदिवासी इलाकों में जहाँ इंसान का वास्ता या तो भूख से पड़ता है या फिर बन्दूक से ,नक्सलियों ने यौन उत्पीडन की सारी हदें पार कर दी हैं |माओवादी , भोली भाली आदिवासी लड़कियों को बरगलाकर पहले उनका यौन उत्पीडन कर रहे हैं फिर उन्हें जबरन हथियार उठाने को मजबूर किया जा रहा है वहीँ संगठन में शामिल युवतियों का ,पुरुष नक्सलियों द्वारा किये जा रहे अनवरत मानसिक और दैहिक शोषण बेहद खौफनाक परिस्थितियां पैदा कर रहा है वो चाहकर भी न तो इसके खिलाफ आवाज उठा पा रही है और न ही अपने घर वापस लौट पा रही हैं |इस पूरे मामले का सर्वाधिक शर्मनाक पहलु ये है कि जो भी महिला कैडर इस उत्पीडन से आजिज आकर जैसे तैसे संगठन छोड़कर मुख्यधारा में वापस लौटने की कोशिश करती हैं ,उनके लिए पुलिस बेइन्तहा मुश्किलें पैदा कर दे रही है ।शांति, बबिता, आरती, चंपा, संगीता...ये वो नाम हैं जिनसे चार -चार राज्यों की पुलिस भी घबराती थी। लेकिन आज पीडब्ल्यूजी एवं एमसीसी की ये सदस्याएं, पुरूष नक्सलियों के दिल दहलाने वाले उत्पीड़न का शिकार हैं। समूचे रेड कॉरिडोर में अनपढ़ आदिवासी महिलाओं को बिन ब्याही मां बनाया जा रहा है वहीँ मुख्य धारा में शामिल होने को लेकर उठी उनकी आवाज लाठियों से बर्बरतापूर्वक कुचल दी जा रही है। आलम यह कि माओवादियों और पुलिस के बीच की चक्की में पिस रही महिला कैडर न संगठन छोड़ पा रही हैं और न ही अपने गांव वापस लौट पा रही हैं। जो महिलाएं सजा काट कर जेलों से अपने घर लौटी हैं उनका कभी नक्सली तो कभी पुलिस दोहन करती है।माओवादियों के जुल्मोसितम की शिकार सरिता कहती है, अब मरने के अलावा हमारे पास कोई और रास्ता नहीं।’प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश -बिहा-झारखण्ड सब जोनल कोमेटी में मौजूदा समय में लगभग ७५० महिला नक्सली शामिल हैं और सबकी कहानी लगभग एक जैसी है , नक्सलियों की चहेती कैडर चंपा ने जब यौन उत्पीड़न से आजिज आकर साथ चलने से मना कर दिया तो नक्सलियों ने उस पर हमला बोल दिया। खूब शौर्य दिखाया। माओ जिंदाबाद के नारे लगाए और चंपा को इतना पीटा कि वह लाश की तरह गिर पड़ी और बहादुर नक्सली उसे मरा समझ कर वहां से चले गए। । बबिता ने गिरफ्तारी के बाद एक जोनल कमांडर से पैदा हुई अपने नवजात बच्चे को जेल के शौचालय में ही मिटटी के घडे में बंद करके मार डाला |पिछले एक वर्ष के दौरान रेड कॉरिडोर का मुख्यद्वार कहे जाने वाले इन राज्यों में संगठन में रहते हुए सैकडों की संख्या में महिला नक्सली बिनब्याही माँ बन गयी वहीँ तमाम जेलों में बंद महिला नक्सालियों के भी जेल में ही गर्भवती हो जाने की भी जानकारी मिली है , हालाँकि यह खौफनाक सच्चाई कभी जेल की दीवारों में तो कभी बीहडों में ही दम तोड़ देती है |

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद की महौली निवासी चंपा [19 वर्ष] कुछ वर्ष पूर्व सहेलियों के उकसावे में नक्सलियों के साथ जंगलों में कूद गई। कुछ ही दिनों में वह एसएलआर चलाने में माहिर हो गई।एम .सी.सी में शामिल होने के तीन वर्ष बाद जब एक दिन पुलिस ने उसकी मां को 15 दिनों तक बंधक बना रखा तो उसे मजबूरन हाजिर होना पड़ा। फिर एक साल की जेल। छूट कर आई तो घर वालों ने पड़ोस के गांव में उसका ब्याह कर दिया। यह शादी नक्सलियों को रास नहीं आई। उसका दो माह का बेटा गोद में था जब एक रात 150 नक्सलियों ने उसके घर हमला बोल दिया।नक्सली उसे जबरन घर से बाहर निकाल लाये और उसे साथ चलने को कहा। चंपा के इंकार करने पर गांव वालों के सामने ही उस पर अनगिनत लाठियां बरस पड़ीं। चंपा बताती है मैं चीखती रही पर कोई बचाने नहीं आया ,लगभग दो घंटे तक उसे बर्बरतापूर्वक पीटने के बाद नक्सली उसे मरा समझ वापस चले गए। चम्पा आज भी जिंदा है, लेकिन मुर्दे की तरह। डॉक्टर बताते हैं कि चंपा का गर्भाशय क्षतिग्रस्त हो गया है। अगर जल्दी ऑपरेशन नहीं किया गया तो उसकी जान कभी भी जा सकती है। चंपा मजदूरी कर मुश्किल से अपना और अपने बच्चे का पेट पाल रही है, इलाज क्या कराए?घर वालों ने पहले ही बाहर कर दिया अब कोई न आगे ना पीछे ,कहीं से से कोई उम्मीद नहीं |

18 वर्ष की सविता अपने आठ माह के बच्चे को गोद में लिए जिन्दगी की दुश्वारियां झेल रही है। माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर में पांच साल पहले शामिल सविता का प्यार एक नक्सली से हुआ। एरिया कमांडर ने दोनों की शादी करने का फरमान जारी कर दिया। ब्याह के कुछ ही दिन बीते थे कि अलग-अलग मुठभेड़ में दोनों पुलिस की गिरफ्त में आ गये। सविता को मिर्जापुर और अजय को बिहार के भभुआ जेल में बंद कर दिया। पिछले साल जेल से छूट कर आई सविता दुधमुंहे बच्चे को लेकर ससुराल पहुंची तो ससुराल वालों ने उसे नक्सली बताकर अपनाने से इंकार कर दिया बहुत सारी कोशिशें करके उसने अपने पति से संपर्क किया तो उसने भी दो टूक जवाब दे दिया ,सविता कहाँ जाये उसे कुछ भी समझ में नहीं आता , अब पहाड़ जैसी अकेली जिन्दगी और पुलिस की रोज की धमकी|सविता बताती है 'पुलिस जब नहीं तब हमसे नक्सलियों का सुराग मांगती है ,मैं भला कहाँ से बताऊँ कहाँ है वो सब ?अगर कुछ मालूम होता तो भी शायद नहीं बताती नक्सली मुझे और मेरे बच्चे दोनों को मार डालेंगे |
बिहार सीमा के निकट तेलाड़ी की रहने वाली बबिता [18 वर्ष] ने कभी पुलिस की नाक में दम कर रखा था। माओवादी बेहद खुबसूरत बबिता से मुखबिरी के अलावा रंगदारी भी वसूल करते थे बताते हैं कि एक बार जब बबिता ने पार्टी छोड़ने की सोची नक्सली उसे जबरन उठा ले गए और फिर उसके साथ दुष्कर्म भी किया ,उसके बाद जैसे तैसे बबिता पकडी गयी और लगभग डेढ़ साल तक जेल में बंद रही। अपनी गिरफ्तारी के दौरान इस अविवाहित महिला नक्सली ने जब पिछले वर्ष जेल में ही एक बच्चे को जन्म दिया तो समूचे प्रशासनिक तंत्र में हड़कम्प मच गया। बाद में पट चला कि उसके पेट में पल रहा बच्चा एक कुख्यात नक्सली सरगना कमलेश का था ,जिसे अपनाने से उसने इनकार कर दिया था | बबिता के साथ जेल में अपने कुछ दिन बिताने वाली समाजसेवी रोमा बताती हैं कि वो एक रात हम नहीं भूलते जब दर्द से बबिता ने अपने आंसुओं से अपनी प्रसव -पीडा को मात दे दी थी ,सबेरे जब हमने और हमारे साथ कि महिला कैदियों ने घडे में बंद मृत बचे को देखा तो हम अवाक रह गए ,जैसे तैसे बात खुली ,बबिता ने कैसे बिना किसी कि मदद के वो बच्चा जना होगा ,जब हम ये सोचते हैं तो आज भी हमारी रूह काँप जाती है ,शायद माओवादियों द्वारा दी गयी यंत्रणा ने उसे अन्दर से मजबूत कर दिया था |
छत्तीसगढ़ के थाना प्रतापपुर की रहने वाली लीलावती पी ,डबल्यू ,जी की एक शानदार शार्प शूटर तो थी ही ,उसे आदिवासियों के करमा नृत्य में भी महारत हासिल थी ,मगर अफ़सोस उसकी आँखें एक गैर नक्सली से चार हुई ,उसका चोरी छिपे प्रेमी से मिलना पुरुष नक्सलियों को नहीं भाया और एक रात उन्होंने उसके प्रेमी विश्वम्भर की हत्या कर दी |प्रेमी की हत्या के बाद संगठन छोड़कर दर दर भटक रही लीलावती बताती है कि 'पार्टी में महिलाओं स्थिति सबसे खराब होती है ,पुरुष नक्सली हमें सिर्फ सेक्स की वस्तु समझते हैं , बिना कोई शिकवा शिकायत किये सब कुछ सहना और चुप रहना ही महिला नक्सलियों की नियति बन जाती है ,शादी करना तो पहले प्रतिबंधित कर दिया था ,लेकिन अब वो कहते हैं कि संगठन के लोगों से शादी की जा सकती है जब कोई भी सदस्य किसी गैर नक्सली से ब्याह करना चाहता है या फिर उसके प्यार में पड़ता है तो उसे अक्षम्य अपराध माना जाता हैं | जिसकी सजा सिर्फ मौत होती है '|लीलावती बताती है इस स्थिति का फायदा उठाकर पुरुष नक्सली महिलाओं का अनवरत यौन शोषण करते हैं |

कभीकभार की जाने वाली औपचारिक पूछताछ को छोड़ दिया जाए तो महिला नक्सलियों के मुख्यधारा में वापस लौटने पर उन्हें शासकीय या कानूनी सहायता न के बराबर ही मिलती है.अगर संगठन से उकता कर उन्होंने आत्मसमर्पण कर भी दिया तो भी पुलिस उसे एनकाउंटर में की गयी गिरफ्तारी दिखाकर तमगा हासिल करने में जुट जाती है |ऐसे में इन महिलाओं का रिहा होना बेहद कठिन हो जाता है |ज्यादातर मामलों में वकील की मदद लेने के लिए आरोपी महिला अपने परिवारवालों पर आश्रित होती है. चूंकि उनमें से अधिकतर इसका खर्चा नहीं उठा सकते इसलिए उनका केस सालों तक घिसटता रहता है.पहले नक्सलियों और फिर समाज की जिल्लत से परेशान महिला कैदी अक्सर अवसाद और दूसरी मानसिक बीमारियों से ग्रस्त हो जाती हैं. सबसे बुरा तो ये होता है कि एक बार नक्सली होने का दाग लग जाए तो अलग हो जाने के बाद भी जिंदगी भर के लिए उस महिला का सामाजिक जीवन तबाह होकर रह जाता है.|
नक्सलियों में पैदा हुई इस अपसंस्कृति के नतीजे भी सामने आ रहे हैं | माओ के नाम पर व बंदूकों के दम पर समता पूंजीवाद के खात्मे और साम्यवाद की स्थापना का सपना संजोये नक्सली एड्स समेत तमाम यौन जनित रोगों के शिकार हो रहे हैं ,और महिला नक्सलियों में बाँट रहे हैं |छत्तीसगढ़ स्थित अंबिकापुर के एक बड़े फिजीसियन ने नाम न छपने की शर्त पर बताया कि मार्च के महीने में ,मेरे क्लीनिक पर इलाज करने आये ३ नक्सलियों में एच आई वी रिपोर्ट पोजिटिव आई है |उक्त चिकित्सक ने बताया कि नक्सली ,बन्दूक की नोक पर मुझे जंगल ले गए थे और मुझे बीमार नक्सलियों का इलाज करने को कहा गया | सूत्र बताते हैं कि विगत ५ वर्षों में नक्सली गुरिल्लाओं में यौन जनित रोग तेजी से बढे हैं इसकी एक बड़ी वजह नक्सालियों द्वारा किया जाने वाला व्यभिचार भी हैं | हाल में ही छतीसगढ़ पुलिस के गिरफ्त में आई सोनू गौड ने बताया कि मैंने संगठन में रहते ही अपने एक पुरुष साथी दिलीप से शादी कर ली थी एक इनकाउन्टर में दिलीप मारा गया और उसके बाद मुझे पार्टी के पुरुष सदस्यों द्वारा जबरन शारीरिक सम्बन्ध बनाने को मजबूर किया जाता रहा |सोनू बताती है कि 'वो बंदूकों की नोक पर हमसे यौन सम्बन्ध बनाते थे ,कई बार तो हमें पता ही नहीं होता था कि आज की रात हमें किस पुरुष नक्सली के सामने परोसा जाना है |जानकारी ये भी मिली है कि अनवरत हो रहे इस यौन उत्पीडन से आजिज आकर तमाम महिला गुरिल्ला खुद को पुलिस के सुपुर्द कर दे रही हैं ,वहीँ अपनी पहचान छुपाकर भाग खड़ी हो रही हैं ,इन सबके बीच माओवाद का ये चेहरा और भी सुर्ख होता जा रहा है |