शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

पा ,पत्रकारिता और पतन



आपमें से बहुतों ने 'पा' देखी होगी और उसमे भीड़ द्वारा , पत्रकारों की पिटाई का नजारा देखा होगा,हमने भी देखा |सच तो ये है वो एक दो सीन देखकर मुझे भी किसी आम दर्शक की तरह सकून मिला ,शायद अगर ऐसा रियल लाइफ में हुआ होता तो ये भूलकर कि मै भी एक पत्रकार हूँ मैंने उस टीवी एंकर का सर फोड़ दिया होता जो आम आदमी की दुश्वारियों को अपनी झूठी ख़बरों से और भी मुश्किल बना रहा था और एक व्यक्ति के ईमानदार प्रयासों को अपनी बेईमान ख़बरों से रौंदने का काम कर रहा था |'पा' के निदेशक बाल्की जी के साहस की हम दाद देना चाहेंगे कि ऐसी परिस्थतियों में जब मीडिया खुद को देश,देश के लोगों और देश की संस्थाओं का भाग्यविधाता मानता है उन्होंने ऐसा कथानक प्रस्तुत करने का साहस किया |ये स्टोरी न सिर्फ प्रिज़ोरिया से जूझ रहे आरो की है बल्कि उस मीडिया की भी है जो मानसिक तौर पर प्रिजोरिया से भी घातक व्याधि से जूझ रहा है |ये फिल्म सीधे सीधे मीडिया के उन घोड़ों की पीठ पर पड़ी चाबुक है जिन्होंने अपने छोटे बड़े स्वार्थों के लिए ख़बरों की लैबोरटरी खोल रखी है वो लैबोरटरी जिसमे में न सिर्फ ख़बरें पैदा की जा रही है बल्कि उन ख़बरों के जेनेटिक कोड भी बड़ी सफाई से बदले जा रहे हैं ,,लालगढ़ से लखनऊ तक ये नजारा आम है |विभिन्न अभिक्रियाओं से गुजरने के बाद समाचारों का जो चरित्र आम लोगों के बीच आ रहा है वो ५० की उम्र में घर से भागी हुई किसी अधेड़ औरत की तरह है जिसे न तो अपने बच्चों की फिकर होती है न ही उस पति की जो उसे सर आँखों पर बिठाकर रखता था |हम ये कहने में तनिक भी ऐतराज नहीं है कि कभी सत्ता तो कभी अखबारी बनियों के हाथों इस्तेमाल होने की नियति ने मीडिया को आज खुद शोषण और उत्पीडन का औजार बना दिया है वो अपने आर्थिक हितों के लिए ख़बरों का तो इस्तेमाल करता ही है ,समूह के खिलाफ जाने से भी गुरेज नहीं करता| क्या ये सच नहीं है कि ,आज भी इलेक्ट्रनिक चैनलों की ख़बरों का ताना बाना देश के उन दस फीसदी लोगों के इर्द गिर्द ही केन्द्रित हैं जिनसे उन्हें टी.आर.पी में अव्वल रहने और धंधे में लाभ का सुख मिलता है ?क्या ये भी सच नहीं है कि अखबार विज्ञापनों से जुडी कमाई के लालच में नकारे नेताओं और पार्टियों को आम जनता पर जबरिया थोप रहे हैं ? सच तो ये है कि हमने खुद को शीशे में देखने का काम छोड़ दिया है हम अपने बदन से रिस रहे फोड़ों को जानबूझ कर अनदेखा कर रहे हैं ,ऐसे में न सिर्फ सिनेमा के परदे पर बल्कि संसद के गलियारों से लेकर सड़कों तक हमें लतियाया जाना तय है |
पत्रकार और ब्लॉगर 'रविश कुमार ' अपने ब्लॉग में कहते हैं "'पा' घटिया स्तर से नीचे चल रही मीडिया पर लात-जूते बरसाती है । बाहर की असली मीडिया में इस पर सन्नाटा। फ़िल्म की कहानी से घोर सहमति बता रही है क्या?"बिलकुल ये शत प्रतिशत सच है कि हम इस कहानी से सहमत हैं !और शायद हमारी चुप्पी ही आखिरी उम्मीद है |आज अगर हिंदुस्तान की मीडिया में कुछ अच्छा है तो वो सिर्फ ये है कि हम अपनी हकीकत जानते हैं और उससे सहमत भी हैं |ख़बरों के साथ खेले जाने का सिलसिला नया नहीं है इसकी शुरुआत आपातकाल के दिनों में ही हो चुकी थी हाँ अंतर ये जरुर आया कि पहले ख़बरों को जिन्दा रखने के लिए पैसे कमाए जाते थे आज पैसे कमाने के लिए ख़बरों का इस्तेमाल किया जा रहा है पहले राजनीतिक पार्टियाँ अखबार निकालती थी अब अखबार राजनैतिक दलों के लिए निकलने लगे |ट्रांस्फोर्मेशन की इस प्रक्रिया में जो कुछ खोया आम आदमी ने खोया ,उसने खोया जो खुद को हमेशा से ख़बरों का हिस्सा मानता रहा है ,उसने भी खोया जिसके लिए खबर ही आखिरी उम्मीद थे |
मेरी मुलाक़ात रोज ही ऐसे लोगों से होती है जो अपनी जिंदगी की छोटी बड़ी दुश्वारियोंसे निजात पाने के लिए मुझसे ख़बरें लिखने का अनुरोध करते हैं ,परासपानी का रामरथ बिजली कड़कने से अपने चार भैसों के मरने की खबर छपने की उम्मीद करता है तो कोन के श्याम सिंह को गाँव में मलेरिया से हो रही मौतों पर ख़बरों की जरुरत होती है ,बीरपुर का ललन फ़ोन पर अपने निर्दोष बेटे को हफ्ते भर से थाने में बैठाये जाने की खबर छपने की गुजारिश करने के लिए सबेरे से ही घर पर आया हुआ है ,कहने को तो ये आपको सामान्य और छापे जाने लायक ख़बरें लगती होंगी ,लेकिन हकीकत बेहद अलग है |मुझे याद है उन दिनों कि जब मै दैनिक जागरण में था एक दिन मुझे बुलाकर कहा गया कि आप उनके बारे में ख़बरें लिखें जो आपका अखबार पढता है उनके बारे में न लिखें जिस आपका अखबार खरीदने की भी कुबत नहीं !ऐसा ही कुछ सच उस वक़्त भी मेरी आँखों के सामने आया जब जहरीले पानी से दस दिनों में हुई दो दर्जन मौतों को आई.बी,.एन -7 के मेरे मित्र ने लो प्रोफाइल बता कर कवरेज करने से इनकार कर दिया | अब आप खुद ही अंदाजा लगायें शहरों में रह रहे उन दस फीसदी लोगों के अलावा जिनके बारे में जो कुछ भी लिखा जा रहा है वो कितना इमानदार होगा |हमें कहना होगा आज देश में मीडिया सामन्तों की भूमिका अदा कर रहा है .एक ऐसा सामंत जिसके खिलाफ आवाज उठाने का साहस किसी के पास नहीं ,वो मनमानी करेगा और खूब करेगा |
पिछले २-३ वर्षों से छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा अखबारों और पत्रिकाओं को दिए जाने वाले अरबों रुपयों के विज्ञापन की वजह सभी जानते हैं अगर आप ये सोच रहे हैं कि ये सरकार की छवि को साफ़ -सुथरा रखे जाने की कीमत है तो आप गलत हैं ,!ये सब कुछ नक्सली उन्मूलन के नाम पर किये जा रहे उत्पीडन ,शोषण ,विस्थापन और सैकड़ों फर्जी मुठभेड़ों को छुपाये जाने की की कीमत है |ये भी एक हकीकत है कि मीडिया ने सत्ता के सामने घुटने टेककर सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं पश्चिम बंगाल ,बिहार ,उड़ीसा और उत्तर प्रदेश में दलितों ,आदिवासियों और समाज के निपढ तबके के खिलाफ काम किया है वरिष्ठ पत्रकार रूपचंद गौतम कहते हैं 'भारतीय पत्रकारिता ने दलित अस्मिता का जितना मजाक उड़ाया है है ,उतना शायद किसी और ने नहीं |मै रूपचंद जी की बातों से पूरी तरह सहमत हूँ |और इस सहमति के तर्क भी मेरे पास मौजूद हैं| मै उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल सोनभद्र जनपद से हूँ जिसे देश की उर्जा राजधानी भी कहते हैं ,पिछले ५ वर्षों के दौरान गरीबों ,विस्थापितों कि हजारों बीघे जमीन पर जेपी एसोसियेट ने सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल कर कब्ज़ा जमा लिया ,आदित्य बिरला के एलुमिनियम कारखाने में झुलसकर पिछले एक वर्ष के दौरान एक दर्जन मौतें हुई हैं ,कनोडिया केमिकल के विषैले जहर से हजारों पशुओं की मौत हो गयी ,वहीँ दो दर्जन आदिवासियों को भी अपनी जान गवानी पड़ी ,ये ख़बरें अख़बारों और टीवी चैनलों की कवरेज का हिस्सा सिर्फ इसलिए नहीं बन पायीं ,क्यूंकि जिनसे सम्बंधित ये ख़बरें थी उन्होंने करोडो खर्च करके ख़बरों का ही गर्भपात कर दिया |ऐसा सिर्फ यहाँ नहीं पूरे देश में हो रहा है,मगर हम चुप हैं ,ये जानते हुए भी कि देश की जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा न सिर्फ हमें गरिया रहा है बल्कि हाँथ में जूता लेकर भी खड़ा है |अब शायद समय आ गया है मीडिया के बीच में मीडिया से जुड़े मुद्दों पर जम कर चर्चाएँ की जाएँ ,वेब मीडिया ने इसकी शुरुआत की थी ,अब सिनेमा के पर्दों पर भी हमें शीशा दिखाया जाने लगा,आत्ममूल्यांकन के इस क्षण को अगर हमने गँवा दिया तो शायद फिर कभी वापसी न हो सके |

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

अमृता -इमरोज और साझा नज्म





पंद्रह दिनों पहले अमृता एक बार फिर इमरोज़ के सपनों में आई, बादामी रंग का समीज सलवार पहने |'सुनते हो ,कमरे में इतनी पेंटिंग क्यूँ इकठ्ठा कर रखी है ?अच्छा नहीं लग रहा ,कुछ कम कर दो "|अमृता कहें और इमरोज़ न माने ,ये तो कभी हुआ नहीं ,अब इमरोज़ ने कमरे से पेंटिंग कम कर दी हैं ,कमरे में फिर से रंगों रोगन करा दिया है |हाँ ,अपने बिस्तर के पैताने या कहें आँखों के दायरों तक ,और मेज़ पर रखे रंगों और ब्रशों के बीच अमृता की तस्वीरें टांग रखी है |इन तस्वीरों को देखकर यूँ लगता है जैसे हर वक़्त अमृता आज भी इमरोज़ की निगहबानी कर रही है ,इमरोज़ घर से बाहर कम जाते हैं ,क्यूँकर जाते ?उन्हें लगता है अमृता घर में अकेली होगी|बेतरतीबी के बावजूद खूबसूरती से जवान हो रहे फूल पौधों के पीछे किसी नज़्म सी दिख रही दीवारों के बीच प्यार के इन मसीहाओं की मौजूदगी को महसूस करना बेहद सकून देने वाला है |हमारे घुसते ही 80 की उम्र में भी अपार उर्जा से भरे इमरोज़ हमारे कन्धों को पकड़ हमें कुर्सी पर बैठा देते हैं |आप जानते हैं अमृता की मौत नहीं हुई ,मेरे लिए तो अमृता हर वक़्त मेरे साथ है ,जब चाहा उससे बातें कर लीं ,आजकल वो मेरी नज्में पढ़कर बेहद मुस्कुराती है| अमृता की मौजूदगी को लेकर उनका ये विश्वास बेहद सहज लगता है ,वे कहते हैं देखो, अब इस कमरे को अमृता के कहने पर थोडा सा बदल दिया,कितना अच्छा लगने लगा है न ? इमरोज़ के बगल में बैठी एक खुबसूरत पंजाबी लड़की जो शायद अमृता के किसी दोस्त की बेटी है ,इस सहजता को सच साबित करते हुए कहती है ,मुझे लगता है गुरूद्वारे जाने से अधिक अच्छा इमरोज़ बाबा से मिलना है ,सारी थकान सारी कुंठाएं न जाने कहाँ गायब हो जाती हैं |
इमरोज ,आप किस अमृता को प्यार करते थे ?वो अमृता जो एक नामचीन लेखिका और कवियत्री थी या फिर वो अमृता जो सिर्फ अमृता थी|,इमरोज़ ये सवाल सुनकर कहीं खो जाते हैं ,ख़ामोशी टूटती है 'जानते हैं आप ! मैंने ४ साल कि उम्र में माँ को खो दिया था ,बाद में जब कोई औरत मिलती मैं उसमे माँ ढूंढने लगता ,लेकिन जबसे अमृता से मिला धीमे धीमे मैंने माँ को ढूँढना बंद कर दिया ,यकीं शायद न हो लेकिन हेर रिश्ता उसमे समाहित हो गया और ये सब कुछ उसके व्यक्तित्व की वजह से था,जब वो खाना बनती थी ,तो एक एक करके मुझे गरम रोटी परोसती थी |जब तक मैं न आऊं वो खाना न खाए ,कहती थी,मैं खाना एन्जॉय करना चाहती हूँ इमा वो तुम्हारे साथ बैठे बिना संभव नहीं होता |वो मुझसे मिलने से पहले खाना नहीं बनती थी ,लेकिन मेरे मिलने के बाद रसोई भी उसकी एक सहेली हो गयी |मेरी नज्मों का सफ़र भी उसके साथ शुरू हुआ ,जब वो बीमार बिस्तर पर थी मैंने उसके सिरहाने बैठकर पहली नज़्म लिखी थी 'जब तुम पेड़ से बीज बन रही थी ,मेरे अन्दर कविता की पंक्तियाँ फूटने लगी '|
चाय के आधे भरे कप को घूर रहे इमरोज बात करते-करते यूँ फ्लैश बेक में चले जाते हैं जैसे सब कुछ इसी एक पल की बात हो ,चुस्कियों के साथ चुप्पियाँ टूटती है ,"जानते हैं ?अमृता और मैंने कभी आज तक एक दूसरे को आई लव यू नहीं बोला ,२६ जनवरी को मेरा जन्मदिन था,में उसके घर आया था ,मैंने उसे बताया और कहा गांवों में तो जन्मदिन नहीं मानते हैं,अमृता अचानक उठी और कुछ देर के लिए गायब हो गयी उसके लौटने के थोड़ी देर बाद एक आदमी आया और हमारी मेज़ पर केक रख गया ,न हमने उसे धन्यवाद कहा न उसने हमें जन्मदिन की मुबारकबाद दी ||एक वक़्त था जब पंजाब की पत्र पत्रिकाओं में अमृता के खिलाफ काफी कुछ कहा जाता था ,मैं देखता था इससे अमृता दुखी हो जाया करती थी ,सो मैं नीचे ही सारे अखबार और पत्र पत्रिकाएं पढ़ लेता था और उनमे से जिनमे अमृता के खिलाफ कुछ नहीं होता वही ऊपर भेजता था कई बार यूँ भी होता था कि अगर किसी अखबार में उसकी तस्वीर अच्छी नहीं छपी होती थी तो मैं उस पर उसकी सुन्दर सी तस्वीर चस्पा करके उसके पास भेज देता |
अमृता और इमरोज़ की बात हो और साहिर पर चर्चा न हो यूँ कैसे हो सकता है इमरोज़ के शब्दों में' बीस साल की दोस्ती थी दोनों की'|इमरोज़ बताते हैं कि जब मैं अमृता को स्कूटर पर बैठा कर रेडियो स्टेशन ले जाया करता था वो मेरे कुरते पर पीछे साहिर का नाम लिखा करती थी ,कभी जलन नहीं हुई ?मैंने तपाक से पूछा ,'अरे!जलन कैसे ?वो मेरा भी जिगरी दोस्त था ,कैसे भूल सकती थी अमृता उसे ,एक बार यूँ भी हुआ वो मुंबई गयी हुई थी किसी कार्यक्रम में ,वहां साहिर भी आये हुए थे ,साहिर्रने पूछा कब जाना है ?अमृता ने कहा आज शाम की ही फ्लाईट है,साहिर ने अमृता से टिकट माँगा और अपने जेब में रख लिया,और ये कहते हुए कि ये टिकट कल की भी हो सकती है ,साहिर अमृता को अपने घर ले गया ,अमृता ने मुझे फोन पर इतिल्ला दी थी ,वो पूरी रात साथ रहे ,लेकिन न मैंने अमृता के लौट के आने के बाद कोई सवाल किया न ही अमृता ने अपनी तरफ से कोई बात बताई | हाँ ,वहां से लौटकर लिखी गयी उसकी नज़्म में उस रात की सारी दास्ताँ थी जिसमे कहा गया था "आधी नज़्म एक कोने बैठी रही ,आधी नज़्म दूसरे कोने बैठी रही "|हलकी सी चाशनी घुली मुस्कान के साथ इमरोज कहते हैं मेरी मुलाक़ात जब अमृता से हुई वो ४० साल की थी ,मुझसे उम्र में सात साल बड़ी ,मानसिक तौर पर बहुत परेशान अमृता जब एक रोज़ डॉक्टर के पास गयी और अपने पति से अलग होने की बात कही तो डॉक्टर ने पूछा' क्या तुमने अपनी चाहत खोज ली है' ?तो अमृता ने कहा 'नहीं' ,ये वो वक़्त था जब अमृता की साहिर के साथ दोस्ती को एक लम्बा अरसा बीत चुका था ,डॉक्टर ने कहा 'तब अभी अपने पति से अलग मत हो 'फिर कुछ ही दिनों बाद मै मिला और उसने मेरे लिए सब छोड़ दिया,अमृता और साहिर जिंदगी भर एक दूसरे पर नज़्म लिखते रहे बस ||मैंने उन दोनों के बारे में कभी लिखा था
वो नज़्म से बेहतर नज़्म तक पहुँच गया
वो कविता से बेहतर कविता तक पहुँच गयी
पर जिंदगी तक नहीं पहुंचे
अगर जिंदगी तक पहुँचते
तो साहिर की जिंदगी नज़्म बन जाती
अमृता की जिंदगी कविता बन जाती

क्या आपमें अमृता को लेकर कभी इगो कंफ्लिक्ट हुआ ?अरे !ये क्या बात हुई ?कैसा
इगो ?मै अपनी पेंटिग्स पर अपना नाम भी नहीं लिखता वो मुझसे अधिक ,बेहद अधिक नामचीन थी ,मैंने सिर्फ एक बात जानी 'जो तुम्हे रुलाता हो ,वो तुम्हारा नहीं है ' ,|मैंने कभी वादा नहीं किया,उसने कभी वादा नहीं लिया |शायद बहुतकम लोग जानते हैं वो सपने में लिखती थी उसे ढेर सारे सपने आते थे मुझे सपने कम आते हैं ,उसके सपने भी मेरे सपनों से खुबसूरत हुआ करते थे |मैंने लिखा है 'जब तू पेड़ से बीज बनने लगी ,मेरे अन्दर किस तरह से कविताओं की पंक्तियाँ फूटने लगी "|
इमरोज़ आपने पेंटिंग्स और कविताओं में क्या साम्यता पाते हैं ?'कोई साम्यता नहीं है |पेंटिंग्स कोई सोच कर नहीं बना सकता ,रंग आपके कण्ट्रोल में नहीं होते हैं ,मै रंगों से खेलता हूँ ,जबकि नज्में सोच लेकर चलती हैं |पेंटिंग्स को लेकर अपना फलसफा इमरोज़ कुछ ऐसे बयां करते हैं
कैनवास धरती नहीं होते
रंग बीज नहीं होते
कैनवास पर लाइफ पेंट करना
स्टील लाइफ हो जाती
स्टील लाइफ में लाइफ नहीं होती
वो कहते हैं अगर कोई ये कहे हमने कैनवास पर जिंदगी पेंट की है तो वो झूठ कहता है|
इमरोज़ से हम चलते -चलते वुमेन विथ माइंड शीर्षक की पेंटिंग के बारे में बात करते हैं |वो बताते हैं 'अमृता ने मुझसे एक दफा पूछा की तुमने कभी वुमेन विथ माइंड बनायीं है ? वुमेन विथ फेस तो सब बनाते हैं'|अमृता के कहने का मतलब में समझ रहा था ,बहुत ही कम लोग होते हैं जो जिस्म से आगे बढ़ पाते हों , कोई भी पेंटर जब भी ब्रश से औरत को उकेरता है ,तो उसके जेहन में सिर्फ औरत का शरीर होता है |इमरोज कहते हैं जब तक पुरुष स्त्री का आदर नहीं करता तब तक वो इंसान नहीं बन सकता है ,और भी सच है कि निरादर सह रही औरतें आदर पैदा नहीं कर सकती |मैंने अमृता के कहने पर फिर वुमेन विथ माइंड बनायीं |इमरोज कहते हैं हमारे और अमृता के के बीच में शब्दों का नाता बहुत कम था हम चुप्पियाँ बांटा करते थे ,हमारे लिए धर्म का कोई मलतब नहीं था ,वह जन्म से ही धार्मिक संकीर्णता के विरुद्ध खड़ी थी ,मै भी उसके जैसा हूँ |वो मुझको और मै उसको आज भी हर पल जी रहे हैं, यही धर्म है |सवालों का सिलसिला ख़त्म होता है अधूरे जवाबों को पूरा करने हम अमृता के कमरे में जाते हैं ,सब कुछ वैसे ही है ,अमृता की किताबें ,कागज़ ,कलम ,एक छोटा टीवी और ढेर सारी तस्वीरें ,सोचता हूँ कितना मुश्किल होता है यादों को संजोना और न सिर्फ संजोना उनके साथ जीना |


इमरोज की चार कवितायेँ

१-
एक ज़माने से
तेरी ज़िन्दगी का पेड़
कविता कविता
फूलता फलता और फैलता
तुम्हारे साथ मिल कर
देखा है

और अब
तेरी ज़िन्दगी के पेड़ ने
बीज बनना शुरू किया
मेरे अन्दर जैसे कविता की
पत्तियां फूटने लगीं है...

और जिस दिन तू पेड़ से
बीज बन गई -
उस रात एक नज़्म ने
मुझे पास बुला कर पास बिठा कर
अपना नाम बताया
'अमृता जो पेड़ से बीज बन गई'
मैं काग़ज़ ले आया
वह काग़ज़ पर अक्षर अक्षर हो गई...

अब नज़्म अक्सर आने लगी है -
तेरी सूरत में तेरी तरह हीं देखती मुझे
और कुछ देर मेरे साथ हम कलाम होकर
हर बार मुझ में हीं गुम हो जाती है...

२-
उसने जिस्म छोड़ा है साथ नहीं
वो अक्सर मिलती है
कभी तारों की छांव में
कभी बादलों की छांव में
कभी किरणों की रोशनी में
कभी ख्यालों के उजालों में

हम पहले की तरह मिलकर
कुछ देर चलते रहते हैं
फिर बैठकर एक-दूजे को
देख-देख, चुपचाप कुछ कहते रहते है
और कुछ सुनते रहते हैं

वह मुझे अपनी नयी अनलिखी
कविता सुनाती है
मैं भी उसको अपनी अनलिखी
नज़्म सुनाता हूँ

वक़्त पास खड़ा ये अनलिखी शायरी
सुनता-सुनता, अपना रोज़ का नियम
भूल जाता है

जब वक़्त को याद आता है
कभी शाम हो गयी होती है
कभी रात उतर आयी होती है
और कभी दिन चढ़ आया होता है
उसने सिर्फ जिस्म छोड़ा है
साथ नहीं

३-
अमृता मुझे कई नामों से
बुलाती है
दोस्ती के ज़माने में
रेडियो स्टेशन स्कूटर पर जाती
वह बाएं हाथ से मुझे लिपटी रहती
और दायें हाथ से कभी कभी
मेरी पीठ पर कुछ लिखती रहती
एक दिन पता लगा
वह साहिर साहिर लिखती है

मनचाही पीठ पर मनचाहा नाम
मुझे साहिर भी अपना नाम हीं लगा
अमृता की दोस्ती में
इतनी अपनत्व देखी और जी
कि फिर कोई बेगानगी रही ही ना...

उस कि कलम
जब भी लिखती मनचाहा ही लिखती
और उसकी ज़िन्दगी
मनचाहा ही जीती अपने आपके साथ भी
और अपने मनचाहे के साथ भी...


४-
मैं एक लोक गीत
बेनाम हवा में खड़ा
हवा का हिस्सा
जिसे अच्छा लगूँ
वह अपनी याद बना ले
जिसे और अच्छा लगे
वह अपना बना ले
जिसके जी में आये
वह गा भी ले -
मैं एक लोक गीत
सिर्फ लोक गीत
जिसे किसी नाम की
कभी भी
ज़रूरत नहीं पड़ती



[ये पूरा साक्षात्कार मैंने और लेखिका एवं कवियत्री जेन्नी शबनम जी ने संयुक्त रूप से लिया है ]

बुधवार, 25 नवंबर 2009

सिस्टम ,सोसाइटी और सहमे शहर -26/11


हम मुंबई में घटित २६/११ के आतंकी हमले की बरसी मना रहे हैं ,मोमबत्तियां जला रहे हैं ,मर्सिया पढ़ रहे हैं ,और यह सब कुछ यह मानते हुए कि इस देश में कभी भी कहीं भी २६/११ जैसी घटनाएँ हो सकती हैं |जब सिस्टम का आम जनता से कोई वास्ता नहीं रह जाता तब सिर्फ और सिर्फ मर्सिया ही किया जा सकता है ,जब प्रजा का विश्वास राज्य की व्यवस्था पर नहीं रह जाता, तब वही होता है जो आज हिंदुस्तान में हो रहा है |क्या इस बात पर जिन्दा कौमें यकीन करेंगी कि जिस शहर में, जिस राज्य में सैकड़ों बेगुनाहों को आतंकियों ने भून डाला था उसी शहर ,उसी राज्य में एक विक्षिप्त जिसकी अब विधान सभा में भी भागीदारी है कभी भाषा तो कभी धर्म के नाम पर आम आदमी को आम आदमी के विरुद्ध खड़ा करने में सफल हो रहा था ,और सत्ता के दावेदारों के साथ- साथ हम -आप अपना चेहरा नयी नवेली दुल्हनों की तरह छुपाये मुस्कुरा रहे थे |क्या इस बात पर यकीन किया जा सकता है कि २६/११ की बरसी से महज चंद दिनों पहले देश में हिन्दुओं के ठेकेदार सीना ठोककर बाबरी मस्जिद गिराए जाने को गर्व का विषय बता रहे थे ,जी हाँ ,ये वो घटना थी जिसने हिंदुस्तान में मुस्लिम फिरकापरस्ती की नयी फसलें पैदा की हैं | आज देश को न तो सत्ता न ही कानून व्यस्था और न ही मीडिया चला रही है वस्तुतः देश को देश की सामाजिक व्यवस्था चला रही है |कहा जा सकता है सरकार से पूरी तरह निराश,नाराज और असंतुष्ट आम जनता का सामाजिक सम्बंध ही देश को और इस बेहद अविश्वश्नीय सिस्टम को जीवित रखे हैं |व्यवस्था या सिस्टम शब्द का एक अर्थ यह है कि अच्छे विचारों और परिकल्पनाओं पर संगठित सरकार ,सिस्टम शब्द का हिन्दुस्तानी अर्थ ये भी है कि यह वो कार्यप्रणाली है जिसे हम चाहकर भी नहीं बदल पाते ,अपने देश में व्यवस्था और सिस्टम की व्यापकता में सिर्फ सरकार ही नहीं सभी राजनैतिक ,आर्थिक ,सामाजिक ,धार्मिक ,सांस्कृतिक ताकतें आ जाती हैं |फिलहाल हिन्दुस्तान में सर्वशक्तिमान सिस्टम ही है ,इस सिस्टम ने तानाशाही को लोकतंत्र के सांचे में ढालने की तरकीब सीख ली है यह वह प्रणाली है ,जिस पर देश की आम जनता को भरोसा नहीं है ,लेकिन फिर भी वो ख़ामोश है |

२६/११ के सन्दर्भ में कुछ ताजा उदाहरण महत्वपूर्ण है |हरकत उल जेहाद अल इस्लामी का मास्टर माइंड शहजाद उत्तर प्रदेश में कहीं गुम है ,पिछले दिनों पाकिस्तानी मूल के आतंकी टी हुसैन राजा और डेविड हैडली को इटली से ,और आतंकियों के मोबाइल में पैसे भेजने वाले मोहम्मद याकूब जंजुआ और उसके बेटे आमेर याकूब को विदेशों में पकड़ा गया |इंग्लॅण्ड के शहर वेस्ट मिनिस्टर में चार आतंकी पकडे गए |गृहमंत्री कहते हैं कि जस्टिस लिब्राहन की बाबरी मस्जिद विध्वंस वाली रिपोर्ट की सिर्फ एक प्रति है ,जो गृह मंत्रालय के पास है ,तब रिपोर्ट कैसे लीक हो गयी ?कहा है इन्टेलीजेन्स?कहाँ है आतंक के खिलाफ भुजाओं का जोर ?कहाँ हैं देश को देश बनाये रखने की राजनैतिक इच्छाशक्ति ?जानते हैं ?इन सभी विफलताओं इन सभी कमियों की सिर्फ और सिर्फ एक वजह है आम आदमी का सिस्टम में विश्वास न होना |यकीन करें न करें मगर कभी भी कहीं भी किसी भी वक़्त एक और २६/११ पैदा हो सकता है ,फिर कोई आम्टे मरा जायेगा ,फिर किसी करकरे की शहादत होगी ,फिर न जाने कितनो की आँखें कभी न ख़त्म होने वाला इन्तजार बना रहेगा |ये सब सिर्फ इसलिए की सिस्टम और आम आदमी के बीच की दूरी दिन प्रतिदिन और भी बढती जा रही है |जो आम आदमी अपने हिस्से की रोटी न मिलने के बावजूद उफ़ नहीं करता वो भला पडोसी के गम की साझेदारी , क्यूँ करेगा ?हाँ ,ये इंसानियत नहीं है ,ये विश्वासघात है ,ये देशद्रोह है फिर भी वो करेगा,जिस वक़्त ,जिस दिन मुंबई में समुद्र के किनारे करांची के रास्ते पहुंचे आतंकियों के बारे में मल्लाहों ने स्थानीय प्रशासन को सूचना न देने का फैसला किया था उस वक़्त ,उस दिन भी सिस्टम से दूरियां थी ,आज भी हैं |
आज भी देश के नगरों ,महानगरों की ३० फीसदी आबादी अपने चक्कर में व्यस्त है ,वह कदापि जोखिम नहीं लेना चाहती ,उसके पास डयूटी,व्यापार,बीबी बच्चों और बाजार के बाद घाटों पर दीप , स्मारकों पर मोमबत्ती जलाने और शोकसभा करने की फुर्सत है ,उसके लिए देशभक्ति भी फैशन है |मुझे ये कहने में कोई गुरेज नहीं है कि आज धार्मिक ,सांस्कृतिक,पाखण्ड ,जाति भाषा और संप्रदाय के कलह में आम जनता की भागीदारी भी सिस्टम की विफलता का कारण है |सिस्टम की विफलता का प्रतीक वो ५५-६०करोड़ लोग है जो रोजी रोटी ,कपडा,घर,दवाई,के ही जुगाड़ में जीते मरते हैं ,इन्हें जिस दिन भरपेट भोजन और नींद भर आराम मिल जाता है उस दिन वे स्वय को सौभाग्यशाली मान लेते हैं , इस बड़े मेहनतकश वर्ग के प्रति सिस्टम संवेदनहीन है ,अन्याय भी गरीब के साथ ही होता है ये कोई सुचना इसलिए नहीं देते क्यूंकि पुलिस उल्टे इन्हें ही फंसा देती है ,हमने नक्सल प्रभावित राज्यों में पाया कि जहाँ गरीब के घर नक्सली जोर जबरदस्ती करते हैं वहीँ पुलिस भी उन्हें परेशान करती है |वह करें तो क्या ?पुलिस की सूचना नक्सली को दे या नक्सली की सुचना पुलिस को दे उन्हें मरना ही पड़ता है ,वे होंठ सी लेते हैं ,सिस्टम पर उन्हें विश्वास नहीं |प्रसंगवश नक्सलियों को रोकने के लिए हाई फाई सुरक्षा बंदोबस्त करने वाला सिस्टम..आदिवासियों की सुरक्षा तो दूर ,उन्हें लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से ही बाहर कर देता है .बैलेट का हक़ छिनकर बूलेट से मुकाबले की उम्मीद सिस्टम करता है तो सच्चाई पर पर्दा डालता है |
देश राष्ट्र,भारत माता के प्रति सिर्फ आंसू नहीं ,पसीने और रक्त की निष्ठा होनी चाहिए ,गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के जो लड़के लड़कियां फ़ौज -सुरक्षाबल में नौकरी करते हैं ,और जो आम आदमी संवेदनशील हैं वही विश्वसनीय रह गए हैं ,जिस दिन व्यवस्था और जनता के सपने एक होंगे ,उसी दिन २६/११ की चिंताएं ख़त्म हो जाएँगी |मर्सिया पढने से बेहतर है अपने मन में देश प्रेम की भावना की ज्योति पैदा करें |अन्यथा ये हकीकत है कि अन्याय,गैरबराबरी , राजनैतिक स्वार्थपरता और भ्रष्टाचार ने देशवासियों की सोच के साथ साथ समर्पण की राष्ट्रीय भावना पर धूल की मोटी परत जमा दी है |ये परत जितनी मोटी होती जाएगी उतने ही २६/११ पैदा होते रहेंगे |

सोमवार, 9 नवंबर 2009

आग ,आटा और लोहा


रोटियों की सही सेंक के लिए, आग और आटे के बीच लोहे को आना पड़ता है|लोकतंत्र में अति का परिणाम अगर देखना हो तो पश्चिम बंगाल आइये ,सामाजिक ,सांस्कृतिक ,बौद्धिक और साहित्यिक तौर पर शेष भारत के सन्मुख जबरिया उदाहरण बनने की कोशिश करता हुआ यह राज्य आज राजनैतिक अतिवादिता के खिलाफ क्रांति का नया ठिकाना बन गया है ,ये हिंदुस्तान में राजनीति के आभिजात्य संस्करण के खिलाफ आबादी का संगठित हस्तक्षेप है |अब तक मीडिया के अन्दर या फिर मीडिया के बाहर नंदीग्राम -सिंगुर-लालगढ़ में हो रहे जनविद्रोह को सिर्फ वामपंथी सरकार के खिलाफ नक्सलवादी विरोध बताकर इतिश्री कर ली गयी ,हकीकत का ये सिर्फ एक हिस्सा है ,पूरी हकीकत जानने के लिए आपको उस पश्चिम बंगाल में जाना होगा ,जिसने आजादी के पहले और आजादी के बाद भी शोषण ,उत्पीडन और जिंदगी की सामान्य जरूरतों के लिए सिर्फ और सिर्फ संघर्ष किया है ,आपको पश्चिम मिदनापुर के रामटोला गाँव के नरसिंह के घर जाना होगा ,जो यह कहते हुए रो पड़ता है कि उसने भूख से तंग आकर अपनी बेटी के हिस्से की भी रोटी खा ली ,आपको बेलपहाडी ,जमबानी ,ग्वालतोड़,गड्वेता और सलबानी के ठूंठ पड़े खेतों को भी देखना होगा ,आपको प्रकृति के साथ -साथ वामपंथी सामंतों द्वारा बरपाए गए कहर को भी देखना होगा ,साथ ही आपको उन अकाल मौतों को भी देखना होगा ,जिसकी फ़िक्र न तो सत्ता को थी और न ही उसकी सरपरस्ती में चौथे खंभे का बोझ उठाने की दावेदारी करने वालों के पास |

अगर केंद्र सरकार या तृणमूल कांग्रेस ये समझती हैं कि मौजूदा जनविद्रोह सिर्फ और सिर्फ वामपंथियों के खिलाफ है तो ये भी गलत है समूचा पश्चिम बंगाल उस शेष भारत की अभिव्यक्ति है जिसे देश के राजनैतिक दलों ने सिर्फ और सिर्फ वोटिंग मशीन समझ कर इस्तेमाल किया और छोड़ दिया ,ये शेष भारत वो भारत है जहाँ तक न तो संसाधन पहुंचे और न ही सरकार ,ये जनविद्रोह माओवाद या किसी अन्य विचारधारा की उपज नहीं है ,ये किसी भी जिन्दा कॉम के प्रतिरोध की अब तक की सबसे कारगर तकनीक है,ये जनविद्रोह सिर्फ पश्चिम बंगाल में जनप्रिय सरकार के गठन के साथ ख़त्म हो जायेगा ऐसा नहीं है ,कल को अगर पश्चिम बंगाल से शुरू हुई इस क्रांति में देश भर के युवाओं ,किसानों ,खेतिहर मजदूरों और आदिवासी गिरिजनों की भागीदारी हो तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए ,निस्संदेह लोकतंत्र को परिष्कृत करने के लिए इस क्रांति की जरुरत बहुत लम्बे अरसे से थी |
जब कभी दुनिया में वामपंथ के इतिहास की चर्चा होगी ये चर्चा भी जरुर होगी कि हिंदुस्तान के एक राज्य में २५ वर्षों तक राज्य करने के बाद कैसे एक वामपंथी सरकार अपने जैसे ही विचारधारा के लोगों की जानी दुश्मन हो गयी ,उस वक़्त ये भी चर्चा होगी कि कैसे एक देश की सरकार पहले तो अपने ही देश के गरीब और अभावग्रस्त लोगों की दुश्वारियों को जानबूझ कर अनसुना करती रही ,और फिर अचानक हुई इस जानी दुश्मनी का सारा तमाशा नेपथ्य से देखकर तालियाँ ठोकने लगी |उस एक महिला की भी चर्चा होगी जिसे हम ममता बनर्जी के नाम से जानते हैं जो संसद में तो शेरनी की तरह चिंघाड़ती थी ,लेकिन नंदीग्राम से पहले उसे भी पश्चिम बंगाल के उस हिस्से के दर्द से कोई सरोकार नहीं था जो हिस्सा आज पूरे पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा तय कर रहा है | नेहरु की भी चर्चा होगी ,इंदिरा गाँधी की भी चर्चा होगी और उस कांग्रेस पार्टी की भी चर्चा होगी जिसने वामपंथियों के साथ देश पर राज किया, कोंग्रेस पार्टी के राहुल की भी चर्चा होगी जो अपने संसदीय क्षेत्र के दलित परिवार के घर में रात बिताता है लेकिन अभी तक पश्चिम बंगाल के उस हिस्से में नहीं गया |मेरा मानना है पश्चिम बंगाल में सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या वामपंथी पार्टियों की, नेता एक ही वर्ग के थे. यानी अभिजात्य वर्ग के| उन्हें किसानों और आदिवासियों की मूल समस्याओं की जानकारी ही नहीं थी तो वो उसका समाधान क्या करते |आदिवासियों के साथ किये गए राजनैतिक छलावे पर बी बी सी के मित्र सुधीर भौमिक कहते हैं ‘विकास तो कोई मुद्दा ही नहीं है क्योंकि यहां के लोगों की समस्याओं को तो नेता कभी समझे ही नहीं. सीपीएम के भूमि सुधार का भी इन लोगों को लाभ नहीं मिला. आदिवासियों को उम्मीद थी कि अलग झारखंड राज्य बनने पर उन्हें कुछ फ़ायदा मिलेगा, लेकिन इस इलाक़े को झारखंड राज्य में शामिल नहीं किया गया और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने इस इलाक़े को शामिल किए बिना ही अलग राज्य को स्वीकार कर लिया.’|ये बात सही भी है इनकी समस्यों को कभी समझा ही नहीं गया ,ऐसे में इस क्रांति के अलावा क्या और कोई विकल्प शेष था ?
आज पश्चिम बंगाल में चार तरह के लोग रह रहे हैं विद्वतजन ,अभिजन ,भद्रजन और आमजन |भद्रजन वो हैं जिनकी बदौलत अब तक राज्य में वामपंथियों का शासन रहा ,उनके लिए वामपंथी विचारधारा लोकतान्त्रिक परम्पराओं से परे उनके जीवित रहने की शर्त बन गयी है ,अभिजन वो हैं जिनके हाँथ में विधानसभा से लेकर ग्राम पंचायतों तक का नेतृत्व रहा है ,ये वो लोग हैं जो फटे पुराने कुर्तों में मुँह में विल्स सिगरेट दबाये चश्मे के शीशे के पीछे से दुनिया देखते हैं ,विद्वतजन में लेखिका महाश्वेता देवी,अम्लान दत्त, जय गोस्वामी, अपर्णा सेन, सावली मित्र, कौशिक सेन, अर्पिता घोष, शुभ प्रसन्न, प्रतुल मुखोपाध्याय भास चक्रवर्ती ,और कृपाशंकर चौबे जैसे वो लोग हैं जो ,आमजन की हकदारी को लेकर खुद के जागने का दावा कर रहे हैं लेकिन वामपंथी सरकार के दांव पेंचों की दुहाई देकर खुद को समय -समय पर तटस्थ कर ले रहे हैं |गौरतलब है कि जब वहां की सरकार ने पुलिस संत्रास विरोधी जनसाधारण कमेटी को आर्थिक मदद दिए जाने के नाम पर महाश्वेता देवी एवं अन्य विद्वतजनों के खिलाफ गैरकानूनी क्रियाकलाप निरोधक (संशोधन) कानून (यूएपीए) के तहत मुकदमा दर्ज किये जाने की बात कही तो आनन फानन में हर जगह ये कहा जाने लगा कि हमारा साथ आदिवासियों के लिए था माओवादियों का हम विरोध करते रहेंगे |मगर सच ये है कि ये विद्वतजन न तो माओवादियों का खुल कर विरोध कर रहे हैं और न ही मौजूदा आन्दोलन का पुरजोर समर्थन |चौथे और आखिरी आमजन हैं ,वो आमजन जिन्हें जन भी नहीं समझा गया ,आजादी के बाद से अब तक न तो उन्हें सत्ता में भागी दारी मिली और न ही दो जून की रोटी की गारंटी |

मौजूदा क्रांति को सिर्फ सशस्त्र क्रांति के रूप में देखना बहुत बड़ी गलती होगी ,हाँ ये जरुर है कि इस जनांदोलन में माओवादियों की भागीदारी से हिंसा भी इसका एक हिस्सा बन गयी है ,लेकिन ये भी सच है कि अगर आज आप कथित तौर पर नक्सली आन्दोलन से प्रभावित इलाकों में जायेंगे तो वहां का आदिवासी अगर लोकतंत्र में विश्वास की बात नहीं करेगा तो वो हथियार उठाने की बात भी नहीं करेगा ,उसके मन में व्यवस्था के प्रति पैदा हुआ प्रतिकार अहिंसक होने के साथ साथ उग्र भी है जो कि किसी भी सफल क्रांति की पहली शर्त है |वो जीना चाहता है ,उसे तो सिर्फ पेट भर खाना और सर पर छत की जरुरत है ,मगर अफ़सोस उसके हिस्से में पहले जलालत भरी जिंदगी थी और अब गोली है |सिंहासन के पुजारी सर पर हाँथ रखकर गले लगाने की तरकीब भूल गए हैं ,सो अब जनता के आने की बारी है