बुधवार, 25 नवंबर 2009

सिस्टम ,सोसाइटी और सहमे शहर -26/11


हम मुंबई में घटित २६/११ के आतंकी हमले की बरसी मना रहे हैं ,मोमबत्तियां जला रहे हैं ,मर्सिया पढ़ रहे हैं ,और यह सब कुछ यह मानते हुए कि इस देश में कभी भी कहीं भी २६/११ जैसी घटनाएँ हो सकती हैं |जब सिस्टम का आम जनता से कोई वास्ता नहीं रह जाता तब सिर्फ और सिर्फ मर्सिया ही किया जा सकता है ,जब प्रजा का विश्वास राज्य की व्यवस्था पर नहीं रह जाता, तब वही होता है जो आज हिंदुस्तान में हो रहा है |क्या इस बात पर जिन्दा कौमें यकीन करेंगी कि जिस शहर में, जिस राज्य में सैकड़ों बेगुनाहों को आतंकियों ने भून डाला था उसी शहर ,उसी राज्य में एक विक्षिप्त जिसकी अब विधान सभा में भी भागीदारी है कभी भाषा तो कभी धर्म के नाम पर आम आदमी को आम आदमी के विरुद्ध खड़ा करने में सफल हो रहा था ,और सत्ता के दावेदारों के साथ- साथ हम -आप अपना चेहरा नयी नवेली दुल्हनों की तरह छुपाये मुस्कुरा रहे थे |क्या इस बात पर यकीन किया जा सकता है कि २६/११ की बरसी से महज चंद दिनों पहले देश में हिन्दुओं के ठेकेदार सीना ठोककर बाबरी मस्जिद गिराए जाने को गर्व का विषय बता रहे थे ,जी हाँ ,ये वो घटना थी जिसने हिंदुस्तान में मुस्लिम फिरकापरस्ती की नयी फसलें पैदा की हैं | आज देश को न तो सत्ता न ही कानून व्यस्था और न ही मीडिया चला रही है वस्तुतः देश को देश की सामाजिक व्यवस्था चला रही है |कहा जा सकता है सरकार से पूरी तरह निराश,नाराज और असंतुष्ट आम जनता का सामाजिक सम्बंध ही देश को और इस बेहद अविश्वश्नीय सिस्टम को जीवित रखे हैं |व्यवस्था या सिस्टम शब्द का एक अर्थ यह है कि अच्छे विचारों और परिकल्पनाओं पर संगठित सरकार ,सिस्टम शब्द का हिन्दुस्तानी अर्थ ये भी है कि यह वो कार्यप्रणाली है जिसे हम चाहकर भी नहीं बदल पाते ,अपने देश में व्यवस्था और सिस्टम की व्यापकता में सिर्फ सरकार ही नहीं सभी राजनैतिक ,आर्थिक ,सामाजिक ,धार्मिक ,सांस्कृतिक ताकतें आ जाती हैं |फिलहाल हिन्दुस्तान में सर्वशक्तिमान सिस्टम ही है ,इस सिस्टम ने तानाशाही को लोकतंत्र के सांचे में ढालने की तरकीब सीख ली है यह वह प्रणाली है ,जिस पर देश की आम जनता को भरोसा नहीं है ,लेकिन फिर भी वो ख़ामोश है |

२६/११ के सन्दर्भ में कुछ ताजा उदाहरण महत्वपूर्ण है |हरकत उल जेहाद अल इस्लामी का मास्टर माइंड शहजाद उत्तर प्रदेश में कहीं गुम है ,पिछले दिनों पाकिस्तानी मूल के आतंकी टी हुसैन राजा और डेविड हैडली को इटली से ,और आतंकियों के मोबाइल में पैसे भेजने वाले मोहम्मद याकूब जंजुआ और उसके बेटे आमेर याकूब को विदेशों में पकड़ा गया |इंग्लॅण्ड के शहर वेस्ट मिनिस्टर में चार आतंकी पकडे गए |गृहमंत्री कहते हैं कि जस्टिस लिब्राहन की बाबरी मस्जिद विध्वंस वाली रिपोर्ट की सिर्फ एक प्रति है ,जो गृह मंत्रालय के पास है ,तब रिपोर्ट कैसे लीक हो गयी ?कहा है इन्टेलीजेन्स?कहाँ है आतंक के खिलाफ भुजाओं का जोर ?कहाँ हैं देश को देश बनाये रखने की राजनैतिक इच्छाशक्ति ?जानते हैं ?इन सभी विफलताओं इन सभी कमियों की सिर्फ और सिर्फ एक वजह है आम आदमी का सिस्टम में विश्वास न होना |यकीन करें न करें मगर कभी भी कहीं भी किसी भी वक़्त एक और २६/११ पैदा हो सकता है ,फिर कोई आम्टे मरा जायेगा ,फिर किसी करकरे की शहादत होगी ,फिर न जाने कितनो की आँखें कभी न ख़त्म होने वाला इन्तजार बना रहेगा |ये सब सिर्फ इसलिए की सिस्टम और आम आदमी के बीच की दूरी दिन प्रतिदिन और भी बढती जा रही है |जो आम आदमी अपने हिस्से की रोटी न मिलने के बावजूद उफ़ नहीं करता वो भला पडोसी के गम की साझेदारी , क्यूँ करेगा ?हाँ ,ये इंसानियत नहीं है ,ये विश्वासघात है ,ये देशद्रोह है फिर भी वो करेगा,जिस वक़्त ,जिस दिन मुंबई में समुद्र के किनारे करांची के रास्ते पहुंचे आतंकियों के बारे में मल्लाहों ने स्थानीय प्रशासन को सूचना न देने का फैसला किया था उस वक़्त ,उस दिन भी सिस्टम से दूरियां थी ,आज भी हैं |
आज भी देश के नगरों ,महानगरों की ३० फीसदी आबादी अपने चक्कर में व्यस्त है ,वह कदापि जोखिम नहीं लेना चाहती ,उसके पास डयूटी,व्यापार,बीबी बच्चों और बाजार के बाद घाटों पर दीप , स्मारकों पर मोमबत्ती जलाने और शोकसभा करने की फुर्सत है ,उसके लिए देशभक्ति भी फैशन है |मुझे ये कहने में कोई गुरेज नहीं है कि आज धार्मिक ,सांस्कृतिक,पाखण्ड ,जाति भाषा और संप्रदाय के कलह में आम जनता की भागीदारी भी सिस्टम की विफलता का कारण है |सिस्टम की विफलता का प्रतीक वो ५५-६०करोड़ लोग है जो रोजी रोटी ,कपडा,घर,दवाई,के ही जुगाड़ में जीते मरते हैं ,इन्हें जिस दिन भरपेट भोजन और नींद भर आराम मिल जाता है उस दिन वे स्वय को सौभाग्यशाली मान लेते हैं , इस बड़े मेहनतकश वर्ग के प्रति सिस्टम संवेदनहीन है ,अन्याय भी गरीब के साथ ही होता है ये कोई सुचना इसलिए नहीं देते क्यूंकि पुलिस उल्टे इन्हें ही फंसा देती है ,हमने नक्सल प्रभावित राज्यों में पाया कि जहाँ गरीब के घर नक्सली जोर जबरदस्ती करते हैं वहीँ पुलिस भी उन्हें परेशान करती है |वह करें तो क्या ?पुलिस की सूचना नक्सली को दे या नक्सली की सुचना पुलिस को दे उन्हें मरना ही पड़ता है ,वे होंठ सी लेते हैं ,सिस्टम पर उन्हें विश्वास नहीं |प्रसंगवश नक्सलियों को रोकने के लिए हाई फाई सुरक्षा बंदोबस्त करने वाला सिस्टम..आदिवासियों की सुरक्षा तो दूर ,उन्हें लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से ही बाहर कर देता है .बैलेट का हक़ छिनकर बूलेट से मुकाबले की उम्मीद सिस्टम करता है तो सच्चाई पर पर्दा डालता है |
देश राष्ट्र,भारत माता के प्रति सिर्फ आंसू नहीं ,पसीने और रक्त की निष्ठा होनी चाहिए ,गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के जो लड़के लड़कियां फ़ौज -सुरक्षाबल में नौकरी करते हैं ,और जो आम आदमी संवेदनशील हैं वही विश्वसनीय रह गए हैं ,जिस दिन व्यवस्था और जनता के सपने एक होंगे ,उसी दिन २६/११ की चिंताएं ख़त्म हो जाएँगी |मर्सिया पढने से बेहतर है अपने मन में देश प्रेम की भावना की ज्योति पैदा करें |अन्यथा ये हकीकत है कि अन्याय,गैरबराबरी , राजनैतिक स्वार्थपरता और भ्रष्टाचार ने देशवासियों की सोच के साथ साथ समर्पण की राष्ट्रीय भावना पर धूल की मोटी परत जमा दी है |ये परत जितनी मोटी होती जाएगी उतने ही २६/११ पैदा होते रहेंगे |

सोमवार, 9 नवंबर 2009

आग ,आटा और लोहा


रोटियों की सही सेंक के लिए, आग और आटे के बीच लोहे को आना पड़ता है|लोकतंत्र में अति का परिणाम अगर देखना हो तो पश्चिम बंगाल आइये ,सामाजिक ,सांस्कृतिक ,बौद्धिक और साहित्यिक तौर पर शेष भारत के सन्मुख जबरिया उदाहरण बनने की कोशिश करता हुआ यह राज्य आज राजनैतिक अतिवादिता के खिलाफ क्रांति का नया ठिकाना बन गया है ,ये हिंदुस्तान में राजनीति के आभिजात्य संस्करण के खिलाफ आबादी का संगठित हस्तक्षेप है |अब तक मीडिया के अन्दर या फिर मीडिया के बाहर नंदीग्राम -सिंगुर-लालगढ़ में हो रहे जनविद्रोह को सिर्फ वामपंथी सरकार के खिलाफ नक्सलवादी विरोध बताकर इतिश्री कर ली गयी ,हकीकत का ये सिर्फ एक हिस्सा है ,पूरी हकीकत जानने के लिए आपको उस पश्चिम बंगाल में जाना होगा ,जिसने आजादी के पहले और आजादी के बाद भी शोषण ,उत्पीडन और जिंदगी की सामान्य जरूरतों के लिए सिर्फ और सिर्फ संघर्ष किया है ,आपको पश्चिम मिदनापुर के रामटोला गाँव के नरसिंह के घर जाना होगा ,जो यह कहते हुए रो पड़ता है कि उसने भूख से तंग आकर अपनी बेटी के हिस्से की भी रोटी खा ली ,आपको बेलपहाडी ,जमबानी ,ग्वालतोड़,गड्वेता और सलबानी के ठूंठ पड़े खेतों को भी देखना होगा ,आपको प्रकृति के साथ -साथ वामपंथी सामंतों द्वारा बरपाए गए कहर को भी देखना होगा ,साथ ही आपको उन अकाल मौतों को भी देखना होगा ,जिसकी फ़िक्र न तो सत्ता को थी और न ही उसकी सरपरस्ती में चौथे खंभे का बोझ उठाने की दावेदारी करने वालों के पास |

अगर केंद्र सरकार या तृणमूल कांग्रेस ये समझती हैं कि मौजूदा जनविद्रोह सिर्फ और सिर्फ वामपंथियों के खिलाफ है तो ये भी गलत है समूचा पश्चिम बंगाल उस शेष भारत की अभिव्यक्ति है जिसे देश के राजनैतिक दलों ने सिर्फ और सिर्फ वोटिंग मशीन समझ कर इस्तेमाल किया और छोड़ दिया ,ये शेष भारत वो भारत है जहाँ तक न तो संसाधन पहुंचे और न ही सरकार ,ये जनविद्रोह माओवाद या किसी अन्य विचारधारा की उपज नहीं है ,ये किसी भी जिन्दा कॉम के प्रतिरोध की अब तक की सबसे कारगर तकनीक है,ये जनविद्रोह सिर्फ पश्चिम बंगाल में जनप्रिय सरकार के गठन के साथ ख़त्म हो जायेगा ऐसा नहीं है ,कल को अगर पश्चिम बंगाल से शुरू हुई इस क्रांति में देश भर के युवाओं ,किसानों ,खेतिहर मजदूरों और आदिवासी गिरिजनों की भागीदारी हो तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए ,निस्संदेह लोकतंत्र को परिष्कृत करने के लिए इस क्रांति की जरुरत बहुत लम्बे अरसे से थी |
जब कभी दुनिया में वामपंथ के इतिहास की चर्चा होगी ये चर्चा भी जरुर होगी कि हिंदुस्तान के एक राज्य में २५ वर्षों तक राज्य करने के बाद कैसे एक वामपंथी सरकार अपने जैसे ही विचारधारा के लोगों की जानी दुश्मन हो गयी ,उस वक़्त ये भी चर्चा होगी कि कैसे एक देश की सरकार पहले तो अपने ही देश के गरीब और अभावग्रस्त लोगों की दुश्वारियों को जानबूझ कर अनसुना करती रही ,और फिर अचानक हुई इस जानी दुश्मनी का सारा तमाशा नेपथ्य से देखकर तालियाँ ठोकने लगी |उस एक महिला की भी चर्चा होगी जिसे हम ममता बनर्जी के नाम से जानते हैं जो संसद में तो शेरनी की तरह चिंघाड़ती थी ,लेकिन नंदीग्राम से पहले उसे भी पश्चिम बंगाल के उस हिस्से के दर्द से कोई सरोकार नहीं था जो हिस्सा आज पूरे पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा तय कर रहा है | नेहरु की भी चर्चा होगी ,इंदिरा गाँधी की भी चर्चा होगी और उस कांग्रेस पार्टी की भी चर्चा होगी जिसने वामपंथियों के साथ देश पर राज किया, कोंग्रेस पार्टी के राहुल की भी चर्चा होगी जो अपने संसदीय क्षेत्र के दलित परिवार के घर में रात बिताता है लेकिन अभी तक पश्चिम बंगाल के उस हिस्से में नहीं गया |मेरा मानना है पश्चिम बंगाल में सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या वामपंथी पार्टियों की, नेता एक ही वर्ग के थे. यानी अभिजात्य वर्ग के| उन्हें किसानों और आदिवासियों की मूल समस्याओं की जानकारी ही नहीं थी तो वो उसका समाधान क्या करते |आदिवासियों के साथ किये गए राजनैतिक छलावे पर बी बी सी के मित्र सुधीर भौमिक कहते हैं ‘विकास तो कोई मुद्दा ही नहीं है क्योंकि यहां के लोगों की समस्याओं को तो नेता कभी समझे ही नहीं. सीपीएम के भूमि सुधार का भी इन लोगों को लाभ नहीं मिला. आदिवासियों को उम्मीद थी कि अलग झारखंड राज्य बनने पर उन्हें कुछ फ़ायदा मिलेगा, लेकिन इस इलाक़े को झारखंड राज्य में शामिल नहीं किया गया और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने इस इलाक़े को शामिल किए बिना ही अलग राज्य को स्वीकार कर लिया.’|ये बात सही भी है इनकी समस्यों को कभी समझा ही नहीं गया ,ऐसे में इस क्रांति के अलावा क्या और कोई विकल्प शेष था ?
आज पश्चिम बंगाल में चार तरह के लोग रह रहे हैं विद्वतजन ,अभिजन ,भद्रजन और आमजन |भद्रजन वो हैं जिनकी बदौलत अब तक राज्य में वामपंथियों का शासन रहा ,उनके लिए वामपंथी विचारधारा लोकतान्त्रिक परम्पराओं से परे उनके जीवित रहने की शर्त बन गयी है ,अभिजन वो हैं जिनके हाँथ में विधानसभा से लेकर ग्राम पंचायतों तक का नेतृत्व रहा है ,ये वो लोग हैं जो फटे पुराने कुर्तों में मुँह में विल्स सिगरेट दबाये चश्मे के शीशे के पीछे से दुनिया देखते हैं ,विद्वतजन में लेखिका महाश्वेता देवी,अम्लान दत्त, जय गोस्वामी, अपर्णा सेन, सावली मित्र, कौशिक सेन, अर्पिता घोष, शुभ प्रसन्न, प्रतुल मुखोपाध्याय भास चक्रवर्ती ,और कृपाशंकर चौबे जैसे वो लोग हैं जो ,आमजन की हकदारी को लेकर खुद के जागने का दावा कर रहे हैं लेकिन वामपंथी सरकार के दांव पेंचों की दुहाई देकर खुद को समय -समय पर तटस्थ कर ले रहे हैं |गौरतलब है कि जब वहां की सरकार ने पुलिस संत्रास विरोधी जनसाधारण कमेटी को आर्थिक मदद दिए जाने के नाम पर महाश्वेता देवी एवं अन्य विद्वतजनों के खिलाफ गैरकानूनी क्रियाकलाप निरोधक (संशोधन) कानून (यूएपीए) के तहत मुकदमा दर्ज किये जाने की बात कही तो आनन फानन में हर जगह ये कहा जाने लगा कि हमारा साथ आदिवासियों के लिए था माओवादियों का हम विरोध करते रहेंगे |मगर सच ये है कि ये विद्वतजन न तो माओवादियों का खुल कर विरोध कर रहे हैं और न ही मौजूदा आन्दोलन का पुरजोर समर्थन |चौथे और आखिरी आमजन हैं ,वो आमजन जिन्हें जन भी नहीं समझा गया ,आजादी के बाद से अब तक न तो उन्हें सत्ता में भागी दारी मिली और न ही दो जून की रोटी की गारंटी |

मौजूदा क्रांति को सिर्फ सशस्त्र क्रांति के रूप में देखना बहुत बड़ी गलती होगी ,हाँ ये जरुर है कि इस जनांदोलन में माओवादियों की भागीदारी से हिंसा भी इसका एक हिस्सा बन गयी है ,लेकिन ये भी सच है कि अगर आज आप कथित तौर पर नक्सली आन्दोलन से प्रभावित इलाकों में जायेंगे तो वहां का आदिवासी अगर लोकतंत्र में विश्वास की बात नहीं करेगा तो वो हथियार उठाने की बात भी नहीं करेगा ,उसके मन में व्यवस्था के प्रति पैदा हुआ प्रतिकार अहिंसक होने के साथ साथ उग्र भी है जो कि किसी भी सफल क्रांति की पहली शर्त है |वो जीना चाहता है ,उसे तो सिर्फ पेट भर खाना और सर पर छत की जरुरत है ,मगर अफ़सोस उसके हिस्से में पहले जलालत भरी जिंदगी थी और अब गोली है |सिंहासन के पुजारी सर पर हाँथ रखकर गले लगाने की तरकीब भूल गए हैं ,सो अब जनता के आने की बारी है

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

सनसनी .समझौतों और सिक्कों पर पलती पत्रकारिता





राजदीप सरदेसाई हालिया प्रकाशित अपने लेख में कहते हैं 'विश्वश्नियता के मुद्दे पर भारतीय पत्रकार ,चैनल सम्पादक और कुछ हद तक अखबार के सम्पादक भी अपनी जमीन खोते जा रहे हैं' |पुण्य प्रसून वाजपेयी को पत्रकारिता के खिलाफ राजनैतिक अतिवादिता से गहरी शिकायत है ,उन्हें लगता है अब पत्रकारिता से राजनीति को नहीं राजनीति से पत्रकारिता को नियंत्रित करने का शर्मनाक दौर शुरू हो गया है | अगर हम मौजूदा समय में हिन्दुस्तानी पत्रकारिता को समझना चाहते हैं तो हमें इन दोनों स्थितियों का विश्लेषण करना होगा ,क्यूंकि ये सिर्फ्र दो स्थितियां या घटनाएँ नहीं हैं बल्कि ये देश में इस वक़्त पत्रकारिता के दो पाटों में बटे होने का दस्तावेज हैं ,एक पाट वो है जिसकी चर्चा राजदीप कर रहे हैं और पुण्य प्रसून के शब्दों में कहें तो वो शीशे से दुनिया देखने वाले पत्रकारों की जमात है| ये वो हैं जिन्हें या तो राजनैतिक दल ,या फिर राजनैतिक परिस्थितियां प्रभावित कर रही हैं ,इन लोगों ने या तो पत्रकारिता को राजनीति की रखैल बनते देखना स्वीकार कर लिया है या फिर पत्रकारिता के नाम पर खुद के बलात्कार की इजाजत दे दी है |एक दूसरा पाट भी है ,जो चुप नहीं रहता उसे पहले पाट की उपस्थति से भी चिढ है साथ ही वो बार बार हारने,टूटने और अखबारी बनियों के हाथों लतियाये जाने के बावजूद के बावजूद कलम को सलामी ठोकना नहीं छोड़ता,उसे राजनीति के आतंक का खत्म करना भी आता है ,और अति का जवाब देना भी |हिन्दुस्तानी पत्रकारिता के लिए ये गर्व का विषय है कि अस्तित्व और रोजी रोटी से जुडी तमाम चुनौतियों के बावजूद आज इस दूसरे पाट के पत्रकारों की संख्या बेहद अधिक है ,सिर्फ अधिक ही नहीं है इनकी संख्या लगातार बढती भी जा रही है, हालाँकि उनके बारे में चर्चाएँ यदा कदा ही किसी फोरम पर होती है |ये भी सच है कि इस दूसरे पाट के पत्रकारों के लिए ख़बरों की विश्वसनीयता को कायम रखना रोटी के साथ साथ खुद की पहचान को बनाये रखने से भी जुड़ा होता है |राजदीप की कठोरता और पुण्य प्रसून वाजपेयी की शिकायत सिर्फ इसलिए है क्यूंकि अब तक ख़बरों को सिर्फ सनसनी ,सिक्कों और अक्सर समझौतों की कसौटी पर ही प्रस्तुत किया जाता रहा है ,अगर सरोकार भी ख़बरों के प्रस्तुतीकरण का जरिए होते तो शायद इतना हो हल्ला नहीं मचता |


मुझे २ वर्ष पहले की एक घटना याद आती है लखनऊ में सड़क पर २४ घंटे से लावारिस पड़ी एक बीमार महिला और उसको चिकित्सा विश्वविद्यालय में कुछ अख़बार के संवाददाताओं और फोटोग्राफरों द्वारा भरती कराये जाने का समाचार मेरे अख़बार ने प्रथम पृष्ठ पर लीड स्टोरी के रूप में प्रकाशित किया था ,अगले दिन सुबह जब मैं अपने भूतपूर्व सम्पादक प्रभात रंजन दीन के कमरे मैं बैठा था तो खबर आई कि चिकित्सा विश्वविद्यालय से उस महिला को निकालकर एक बार फिर सड़क पर फेंक दिया गया है ,ये सिर्फ एक खबर हो सकती थी ,लेकिन जानते हैं मेरे सम्पादक ने क्या कहा ?उन्होंने फ़ोन पर संवाददाता को आदेश दिया जाओ वहां बवाल कर दो धरने पर बैठ जाओ ,कपडे फाड़ डालो ,ये कोई प्रहसन नहीं था| बवाल हुआ या नहीं मुझे नहीं मालूम ,लेकिन अस्पताल में पुनः भारती होने के एक हफ्ते बाद वो महिला स्वस्थ होकर अपने घर जा चुकी थी |एक घटना फिर घटी जिस वक़्त महाराष्ट्र में राज ठाकरे उत्तर भारतीयों को पानी पी पी कर गाली दे रहे थे ,उस वक़्त प्रभात जी ने अखबार में पहले पन्ने पर सुचना प्रकाशित की कि हम कभी भी राज ठाकरे का नाम प्रकाशित नहीं करेंगे ,ये वही समय था जब भाषा के मुद्दे पर उत्तर भारत और शेष भारत को अलग अलग बांटा जा रहा था ,शायद आपको याद हो ठीक उसी वक़्त टीवी -१८ ने बेहद आश्चर्यजनक ढंग से मराठी भाषा में लोकमत समाचार चैनल लॉन्च कर दिया था .संभव है ये कदम सरोकार से जुड़ा हो लेकिन हम इसे अवसरवादिता से जोड़ कर देखते हैं |संसद में नोट की गद्दियाँ उछाले जाने के वक़्त भी मीडिया ने सरोकारों को अनदेखाकर खबरें प्रस्तुत की ,उस वक़्त पूरा देश खबरी चैनलों से सच जानने की उम्मीद कर रहा था ,अगर सरोकार होते तो बेवजह के तर्कों में सबको उलझाये बिना किसी भी कीमत पर सच दिखाया जाता |जहाँ सरोकार नहीं होते वहीँ विश्वसनीयता का संकट पैदा होता है ,ये भी मानना होगा कि अगर राजनीति जैसे महत्वपूर्ण विषय में खबरिया चैनलों या फिर अख़बारों के सरोकार गायब रहेंगे ,तो शोमा और कोमालिका के किस्से सामने आते रहेंगे|जो नही जानते हैं उन्हें हम बता दे, पश्चिम बंगाल की इन दोनों महिला पत्रकारों का तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा न सिर्फ़ घोर अपमान किया गया ,बल्कि शोमा पर ममता बनर्जी की हत्या की साजिश का आरोप लगाकर पुलिस के सुपुर्द भी कर दिया गया | पुण्य प्रसून वाजपेयी ने जिन घटनाओं का जिक्र किया है उनमे तृणमूल के कार्यकर्ताओं का दोष कम उन चैनलों का दोष अधिक है जिन्होंने खुद की छवि राजनैतिक पार्टियों की रखैल के रूप में बना रखी है |खतरनाक ये है कि सिर्फ क्षेत्रीय चैनल या अखबार नहीं तमाम राष्ट्रीय अख़बारों और चैनलों में रखैल बनने का ये शगल जोरों पर है |सिर्फ टी आर पी और थोथे सर्वेक्षणों के आधार पर अपना मूल्यांकन करने वाले चैनल और अखबार अगर खुद का चेहरा आईने में देखना चाहते हैं तो मीडिया के मंचों पर नहीं आम आदमी के बीच जाकर संवाद करें दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा |और ये कहने मैं मुझे तनिक भी हिचकिचाहट नहीं है राजनीति और पत्रकारिता के इस गठजोड़ के बारे में इमानदारी से लिखने की हिमाकत भी नहीं की जा रही |जहाँ भय है वहां विश्वसनीयता का माहौल बनेगा कैसे ?


राजदीप सरदेसाई अपने उसी लेख में कहते हैं 'जब एक ही स्टोरी को अलग अलग मंचों से और सौ अलग अलग तरीकों से कहा जा रहा है ,एक निष्पक्ष खबर पेशकर्ता के तौर पर पत्रकार की छवि दुर्लभ होती जा रही है' |राजदीप किन ख़बरों की बात कर रहे हैं ?जहाँ तक हम देखते हैं सिर्फ राजनीति ही एक ऐसा विषय है जहाँ प्रस्तुतीकरण में विभेद होता है ,और माफ़ कीजिये ये विभेद पत्रकार नहीं पैदा करता ,ये विभेद चैनलों और अख़बारों के राजनैतिक संबंधों का प्रतिफल होता है ,कोमालिका क्या करे अगर उसे अपने घर परिवार की रोटी 'आकाश चैनल 'से मिलती है ?शोमा को अगर ख़बरों की कवरेज का चरम सुख अगर किसी ऐसे चैनल के माध्यम से मिलता है जिसका चरित्र वामपंथी है तो उसमे उसका क्या कसूर ?ये पुण्य प्रसून का सरोकार है नए लोगों के लिए ,कि उन्हें ऐसी घटनाओं से दुःख होता है |नहीं तो दूसरे पाट में ख़बरों को जी रहे कलमकारों की चर्चाएँ ही कौन करता है ,खबरें उन्ही की वजह से जिन्दा हैं ,आम आदमी से जुड़े सरोकार भी उन्ही से सध रहे हैं ,और विश्वसनीयता भी उन्ही की बदौलत कायम है | अगर हममे जरा सी भी संवेदनशीलता शेष है तो पुण्य प्रसून वाजपेयी के दर्द को समझें साथ ही राजदीप के डर को पहचाने ,क्यूंकि वो इमानदारी से आत्मुल्यांकन तो कर रहे हैं |आत्म विवेचना का साहस पत्रकारिता का सूत्रवाक्य है |

दस वर्ष पूर्व मैंने दो लाइने लिखी थी आज आपसे बाँट रहा हूँ |


कौन पूछेगा हवाओं से का सबब ,शहर तो यूंही हर रोज मरा करते हैं
कभी दीवारों में कान लगाकर तो सुनो ,कलम के हाँथ भी स्याही से डरा करते हैं |





रविवार, 11 अक्टूबर 2009

प्रोफाइल फैक्टरी ऑफ़ मीडिया

दैनिक जागरण के संस्थापक स्वर्गीय नरेन्द्र मोहन को आपमें से बहुतेरे लोग जानते होंगे एक अखबार के संस्थापक सम्पादक और राज्य सभा के पूर्व सदस्य के रूप में मैं भी उनको जानता हूँ मैं उन्हें एक प्रखर चिन्तक और दार्शनिक कवि के रूप में भी जानता हूँ मुझे ये भी पता है कि उनका अखबार अपने साप्ताहिक अंक में उनकी कवितायेँ नियम प्रकाशित करता था ,लेकिन एक बात मुझे अभी मालूम हुई वो ये कि नरेन्द्र मोहन समकालीन हिंदी साहित्यकारों के अगुवा थे ,ये बात मुझे अखबारी दुनिया के बहुरूपिये के रूप में चर्चित होते जा रहे दैनिक जागरण से ही मालूम हुई |खुद को देश में हिंदीभाषियों में सर्वश्रेष्ठ कहने वाले जागरण ने कल नरेन्द्र जी के जन्मदिवस पर जबरियन प्रेरणा दिवस मनाया ,पूरे देश में जागरण समूह ने स्वयंसेवी संगठनों और एजेंसियों से मान -मनोव्वल करके और लालच देकर उन्हें आयोजक बना दिया ,और आज के अखबार के मुख्य पृष्ठ और अन्दर के पेजों पर 'पूरे देश में मनाया गया प्रेरणा दिवस 'शीर्षक से खबर चस्पा कर दी ये किसी भी व्यक्ति को जनप्रिय बनाने के अखबारी फान्देबाजी का सबसे बड़ा उदाहरण है ,ऐसा नहीं है कि जागरण ये प्रयोग सिर्फ स्वर्गीय नरेन्द्र मोहन के लिए कर रहा है ,पूर्व के लोकसभा चुनाव और अब होने जा रहे विधान सभा चुनावों में प्रोफाइल मेकिंग का ये काम करोडो रूपए लेकर किया जा रहा है |नरेन्द्र जी की खूबियों और उनकी रचनाधर्मिता को साबित करवाने के लिए इस अवसर पर जो भी आयोजन किये गए ,उनमे नामचीन साहित्यकारों को बुलवाकर स्वर्गीय नरेन्द्र जी का महिमा गान करवाया गया ,चूँकि छोटे बड़े साहित्यकारों में से ज्यादातर अभी तक अखबारी छपास की खुनक से मुक्त नहीं हो पाए हैं तो सभी ने नरेन्द्र जी का जम कर यशोगान किया ,जागरण की बेबाकी और निष्पक्षता की शर्मनाक किस्सागोई की गयी वहीँ ख़बरों की हनक से हड़कने वाले तमाम नौकरशाहों ने भी इस आयोजन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर अखबार को सलामी ठोकी
इस पोस्टिंग को लिखने की वजह कहीं से भी नरेन्द्र जी की काबिलियत और उनकी विद्वता पर अंगुली उठाना नहीं है यहाँ हम सिर्फ और सिर्फ बड़े अखबारों की साम दाम दंड भेद के बल पर प्रोफाइल मेकिंग के राष्ट्रीय कार्यक्रम से आपको रूबरू कराना चाहते हैं ,हम चाहते हैं आप भी इस छद्म को पहचाने| नाम नहीं लूँगा लेकिन आज देश में कई नामचीन सिर्फ इसलिए नामचीन हैं क्यूंकि मीडिया ने उन्हें सारे मूल्यों को ताक पर रखकर अवसर दिया ,और कई योग्यता के बावजूद सिर्फ इसलिए हाशिये पर हैं क्यूंकि उन्होंने अखबारी साहूकारों की दलाली नहीं की |दैनिक जागरण का प्रेरणा दिवस बहुत कुछ उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के जन्मदिवस की याद दिलाता रहा ,जहाँ पैसा बटोरकर जन्मदिवस मनाया जाता है ,गनीमत बस इतनी रही कि अन्य अवसरों की तरह इस मौके पर विज्ञापन नहीं वसूले गए
आजकल मीडिया से जुड़े तमाम ब्लागों ,गोष्ठियों में अखबारों के बाजारुपना की चर्चाएँ जोरों पर हैं ,मगर अफ़सोस इस बाजारुपन के चरित्र में किनकी बोली लगायी जा रही है इस पर बहुत कम बात होती है यकीन करना कठिन है मगर सच है कि मीडिया छोटे कस्बों से लेकर जनपदों ,फिर बड़े शहरों ,राज्यों और फिर अंत में राष्ट्रीय स्तर पर बेहद गुपचुप ढंग से लोकप्रिय बनाने का कारखाना चला रहा है ,इस कारखाने में थानेदारों से लेकर नेताओं ,साहित्यकारों ,पत्रकारों और समाजसेवियों सभी का निर्माण हो रहा है ,ये हिदुस्तान की आजादी के बाद मीडिया के चरित्र में आई गिरावट का सबसे बड़ा उदाहरण है ,अफ़सोस ये है की इन्फेक्शन बहुत तेजी से अब संचार के नया माध्यमों यहाँ तक की ब्लागर्स पार्क में भी घुस रहा है मुझे उत्तर प्रदेश के एक बड़े आई .पी,एस रघुबीर लाल का उदाहरण देना यहाँ समीचीन लगता है ,जिसे राष्ट्रपति पुरस्कार से समानित कराने के लिए जागरण ने पूरी ताक़त झोंक दी निठारी की घटना के तत्काल बाद जिस वक़्त पूर्वी उत्तर प्रदेश से लापता सैकडों बच्चों के सन्दर्भ में दैनिक जागरण में ही खबर प्रकाशित हुई और अखबार को इस खबर का असर उक्त आई.पी,एस पर पड़ता दिखा ,तो अगले ही दिन हास्यास्पद तरीके से उस अधिकारी के हवाले से दैनिक जागरण में ही झूटी खबरें न प्रकाशित करने की नसीहत प्रकाशित कर दी गयी खैर अखबार सफल रहा और रघुबीर लाल अखबार की मेहरबानी से राष्ट्रपति पदक पाने में सफल रहे पिछले एक दशक से छोटे बड़े सभी चुनावों में इसी तरह से ये अखबार अपनी मेहरबानियों को बेचकर जनता के माइंड वाश का काम करते हैं मैं कई ऐसे समाजसेवियों लेखकों और साहित्यकारों को जानता हूँ जिनका नाम ये अखबार सिर्फ इसलिए प्रकाशित नहीं करते क्यूंकि उन्होंने कभी भी अखबारी दुनिया में जागरण की सत्ता को स्वीकार नहीं किया जिस तरह से राजनेता सिर्फ खुद को ही नहीं अपने पूरे कुनबे को आम जानता पर थोप रहे हैं ,अखबारों में भी ये कुनबायी संस्कृति तेजी से फल फूल रही है ,अख़बारों के प्रथम पृष्ठ से लकार सम्पादकीय तक में ये सब कुछ साफ़ नजर आ रहा है ,प्रादेशिक डेस्क से लेकर नेशनल डेस्क तक हर जगह अब इन कुनबों के लोग हैं ,ऐसे में आप इन अखबारों से किस क्रांति की उम्मीद कर सकते हैं ?ये आश्चर्यजनक लेकिन सच है कि कई बड़े अख़बार तो उन पत्रकारों की मौत की खबर भी नहीं छपते जो दूसरे अखबारों में काम करते हैं ,यही बात स्वर्गीय नरेन्द्र मोहन जी के सन्दर्भ में भी है ,दैनिक जागरण को छोड़कर और किसी छोटे बड़े अखबार ने इस महायोजन के सन्दर्भ में एक शब्द भी नहीं छापा ,उत्तर प्रदेश में प्रेरणा दिवस के आयोजकों में से एक कहते हैं हम इस बहाने अगर हम नंबर एक अखबार के नजदीक आ जाते हैं तो इसमें बुरा क्या है ?अखबार वालों से नजदीकी कौन नहीं चाहता