शनिवार, 7 मार्च 2009

चुल्हा चक्कड़ और चौथी दुनिया की कवितायें


अगर आप हिंदी कविता के मायने समझते हैं ,उससे पसीज रहे मर्म को महसूस कर रहे हैं तो क्या आप रश्मिप्रभा,अरुणा राय ,ज्योत्स्ना पाण्डेय,जेन्नी शबनम ,संगीता ,आभा क्षेत्रपाल,श्रद्धा जैन ,अनीता अग्रवाल , प्रीति ,वर्तिका को जानते हैं ? , अगर आप इन्हें नहीं जानते या इनके जैसी उन अन्य महिलाओं को नहीं जानते जो घर के चुल्हा चक्कड़,काम काज के अलावा हर पल कविता को न सिर्फ जी रही हैं बल्कि की -बोर्ड से बातें करते हुए उसे नए आयाम दे रही हैं तो आप हिंदी साहित्य के एक बड़े और ऐतिहासिक परिवर्तन से अछूते हैं |पिछले तीन दशकों में हिंदी साहित्य में कविताओं का प्रस्त्तुतिकरण बदला ,पात्र बदले ,परिदृश्य बदला ,लेकिन कविता कहने वाले ,लिखने वाले और पढने वाले स्थिर रहे ,पठनीयता के घोर संकट के बावजूद कवितायेँ लिखी गयी ,मगर अफ़सोस कवियों,पाठकों,और उनको प्रकाशित करने वाले एक जमात का हिस्सा बन गए एक ऐसी जमात जिसमे अन्दर झाँकने का साहस किसी भी बाहर वाले को नहीं था चाहे वो स्त्री हो या पुरुष |कविता के इस हाराकिरी के बीच इन्टरनेट आया ,अभिव्यक्ति आसान हुई इन्टरनेट ने आम हिन्दुस्तानी के जीवन जीने का ढंग बेहद द्रुत गति से बदल दिया लेकिन साहित्य के क्षेत्र में सबसे बड़ा परिवर्तन जो हुआ वो ये था कि दुनिया उन महिलाओं को पढने लगी जिन्हें वो जमात और खुद हम सब सिर्फ रसोई घर और नौकरी चाकरी करने वाली अक्सर बंद कमरे में रहने वाली औरत समझते थे |इन्होने लिखा और खूब लिखा जम कर लिखा ,आप यकीं मानिये यहाँ इन्टरनेट पर भारत का सबसे उन्नत साहित्य लिखा जा रहा है ,जिसे न पढना और न जानना कविता के अस्तित्व के लिए भी चुनौतियाँ पैदा कर देगा |ये एक मंच परएक साथ खड़ी है ,इनमे तेजी के साथ सहेलीपना भी पनप रहा है इन्हें न तो नामचीन पत्रिकाओं में छपने का शौक है और न बड़ी सम्मेलनों की दरकार |
रश्मिप्रभा को ज्यादातर लोग माँ कहते हैं ,फौजी बेटे की माँ रश्मिप्रभा ज्यादातर वक्त ढेर सारे बच्चों की माँ होती हैं या फिर एक कवियत्री |वे खुद कहती हैं 'अगर शब्दों की धनी मैं ना होती तो मेरा मन, मेरे विचार मेरे अन्दर दम तोड़ देते...मेरा मन जहाँ तक जाता है, मेरे शब्द उसके अभिव्यक्ति बन जाते हैं, यकीनन, ये शब्द ही मेरा सुकून हैं...'जी हाँ सही कहती हैं रश्मि यकीं न हो तो रश्मि की कविता 'शब्द 'की ये चार पंक्तियाँ पढें -
सांय सांय चलती हुई हवा से
उड़ता हुआ एक शब्द
मेरे पास आ गिरा

असमंजस में रही
उठाऊं या नहीं

आँखें मींच ली
पर शब्द के इशारे होते रहे
निकल पड़ी बाहर
सोचा
शाम के धुंधलके में सन्नाटा देखकर
शायद लौट जाए
लौटकर देखा
मेरी प्रतीक्षा में कुम्हलाया हुआ शब्द
मेरी कलम के पास सर टिका कर बैठा है
रश्मि निर्भीकता से कहती हैं मेरी कविता की सार्थकता पाठकों की आलोचना ,समालोचना में ही निहित हैं सुमित्रा नंदन पन्त की मानस पुत्री रश्मि की कविताएँ उन्ही की तरह है ,आप उनसे न सिर्फ चुप्पी की बल्कि क्रांति की भी उम्मीद कर सकते हैं |

अरुणा राय ,ये नाम उत्तर प्रदेश पुलिस कीशानदार महिला पुलिस अधिकारी का है ,और साथ में एक ऐसी कवियत्री का जिस तक पहुँचते पहुँचते हिंदी कविता को भी ठहर जाना पड़ता है उनके शब्दों में न सिर्फ धूप है बल्कि ढेर सारी छाँव भी है |अगर सीधे साधे शब्दों में कहें तो अरुणा की कविता सबकी कविता है वो कविता हमारी हो सकती है आपकी हो सकती है , हमारे इर्द गिर्द मौजूद किसी बिसरा दिए जाने वाले चेहरे की हो सकती है या फिर ,गाजियाबाद में देर रात स्टेशन से घर जाने को आतुर किसी लड़की की कविता हो सकती है अरुणा जब खुद को केंद्र में रखकर कविता लिखती है तो लगता है ये खुद से लड़ने का अब तक का सबसे विश्वसनीय दस्तावेज है ,यानि की इसके बाद अब व्यक्तिगत संघर्षों की दास्तान बयां करने वाली कोई और कविता नही हो सकती |अरुणा की ये कविता पढें -
अभी तूने वह कविता कहां लिखी है
मैंने कहां पढी है वह कविता
अभी तो तूने मेरी आंखें लिखीं हैं,
होंठ लिखे हैं

कंधे लिखे हैं उठान लिए

और मेरी सुरीली आवाज लिखी है

पर मेरी रूह फना करते
उस शोर की बाबत
कहां लिखा कुछ तूने

जो मेरे सरकारी जिरह-बख्‍तर के बावजूद

मुझे अंधेरे बंद कमरे में एक झूठी तस्‍सलीबख्‍श
नींद में गर्क रखती है

अभी तो बस तारीफ की है
मेरे तुकों की लय पर
प्रकट किया है विस्‍मय

पर वह क्षय कहां लिखा है

जो मेरी निगाहों से उठती
स्‍वर लहरियों को
बारहा जज्‍ब किए जा रहा है
अनीता अग्रवाल की कविताओं को लेकर मेरे एक मित्र ने कभी कहा था की उनकी कविताएँ चुपचाप आपके भीतर पहुँचती है और अन्दर पहुंचकर विस्फुटित हो जाती है |मेरा मानना है वो सही कहते हैं ,मैंने भी महसूस किया अनीता एक कवि के रूप में कभी हारती नहीं चाहें कितने भी झंझावात हों ,शायद उनकी कविताओं में कभी- कभार मानवीय जीवन की कठोरता के प्रति बेतकल्लुफी भी इसी वजह से नजर आती है |अपनी बीमार माँ की जिजीविषा को खुद भी जी रही अनीता की एक कविता पढें

ये भी क्या बात हुई
कि
चलते रहे
बस
हम ही हम
कुछ कदम तुम बढ़ते कुछ कदम हम
तो लुत्फ़ ही कुछ और होता

ज्योत्स्ना पाण्डेय जब कविता नहीं लिखती तब घर के काम करती हैं ,हम जानते हैं कि मुंबई काण्ड के बाद शब्दों की धनी ये महिला अचानक फूट फूट कर रो पड़ी थी |उनकी कविता कभी भी किसी वक़्त भी जन्म ले सकती है उनमे शब्दों का कोलाहल इस कदर होता है कि कभी कभी वो मस्तिष्क और जिव्हा से चिपक जाते हैं जो कि बहुत चाहने पर भी उखाड़ कर नहीं फेंके जा सकते |आप यकीं नहीं मानेंगे ज्योत्स्ना पत्रिकाओं में अपनी कविताओं के प्रकाशन की बात पर ही उखड जाती हैं वो साफ़ तौर पर कहती हैं मेरी कविताएँ मेरे घर -परिवार और ,मेरे मित्रों के लिए है ,मैं इसे सार्वजनिक चीज नहीं मानती |ज्योत्स्ना की ये कविता मुझे बेहद पसंद है |


इस दिसम्बर से जीवन में अधकचरे रिश्तों की धुंध घने कोहरे सी छाई थी-----
उमंगों का शिथिल होना,
ठिठुरती ठण्ड के आभास जैसा विचारों को संकुचित करता,
भावनाओं से उठती सिहरन से कोमल मन कंपकपाता था-----
ऐसे में तुम काँधे पे झोली लटकाए,
मेरे जीवन में रंग भरने के लिए
प्यार का हर रंग साथ लिए
नए सपने, नई आशाएं, मोहक मुस्कान, कोमल स्पर्श का मृदुल एहसास लिए-----
मुझमे एक गुनगुना जोश भर देते हो
तुम संता क्लॉज़ की तरह मेरी ज़िन्दगी में आए हो
अपनी झोली के सारे उपहार
तुमने मुझे दे दिए हैं-----
इस दिसम्बर (जीवन) में,
तुम्हारे होंठों का स्पर्श मुझे ताप से भर गया है,
सदा-सदा के लिए--------


श्रद्धा जैन की कविताओं के प्रति लोगों के प्रेम का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की उनकी ऑरकुट की प्रोफाइल में अब एक हजार से ज्यादा प्रशंसक मौजूद है |सिंगापूर में रह रही श्रद्धा या तो बच्चों को स्कूल में पढाती हैं या कविताएँ लिखती हैं |इन्होने शायर फॅमिली नाम से एक पोर्टल शुरू किया ,और इन्टरनेट पर आने वाले लोगों की रचनाओं को बेहद खूबसूरती के साथ प्रस्तुत किया |श्रद्धा आजकल अपना ज्यादातर समय अपने साथ के लोगों के प्रमोशन में लगा रही हैं ,श्रद्धा की कविता की सबसे बड़ी खासियत ये है कि वो अपनी कविता से खुद गायब रहती हैं उन्होंने हमेशा समुदाय को अपनी कविता का विषय बनाया है |
अच्छी है यही खुद्दारी क्या

रख जेब में दुनियादारी क्या

जो दर्द छुपा के हंस दे हम

अश्कों से हुई गद्दारी क्या

हंस के जो मिलो सोचे दुनिया

मतलब है, छुपाया भारी क्या
वे देह के भूखे क्या जाने

ये प्यार वफ़ा दिलदारी क्या
बातें तो कहे सच्ची "श्रद्धा"

वे सोचे मीठी खारी क्या
और अंत में बात आभा क्षेत्रपाल की ,अपने माँ बाप के लिए बेटे की जिम्मेदारी निभा रही आभा की एक कम्युनिटी है 'सृजन का सहयोग'जिसमे दो सौ से जयादा लोग हर पल -प्रतिपल अपनी नयी कविताएँ पोस्ट कर रहे हैं जानते हैं आभा क्या कहती हैं अपनी इस कम्युनिटी के बारे मैं ?वो कहती हैं 'सृजन मेरी बेटी की तरह है ,हम चाहते है वो दुनिया की सबसे खुबसूरत बेटी हो |सच कहती है आभा ,बतौर कवि ,आभा की कविता हर पल जिंदगी की क्रूर सचाइयों पर चोट करती नजर आती है वो आहत होती है ,गिरती है फिर उठ खड़ी होती है |वो लिखती हैं
-
लाखो सूं रेत की है
ये बिखरी आशाएं
कंटीली झाडिया हैं ये आँखों में चुभते सपने
तपती धूप है ये सुलगती आशाएं
चीखता पुकारता सन्नाटा है ये मेरा अकेलापन
सूखी धरती है ,ये मेरा प्यासा मन
आखिर कोई तो बताये ये मैं हूँ या मरुस्थल
इस पोस्टिंग में हमने उन्ही कवियों का जिक्र किया जिन्हें मैं जानता था ,जिन्हें हम नहीं जानते उन महिलाओं के प्रयास इससे भी बढ़कर हो सकते हैं |जो भी हो ये सच है ,आज हिंदी कविता फिर से अपनी तरुणाई मैं लौट आई है ,आइये इन महिलाओं का स्वागत करें अपनी इस दुनिया में ,जहाँ हम खुली साँसे ले रहे हैं ,जहाँ हर शब्द बेचारगी की कोख से पैदा नहीं हुआ है

शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

खामोश !अदालत जारी है


अगर आपको सच कहने की आदत है तो फिलहाल अपने होंठ सी लीजिये , राजसत्ता के दांव-पेंचों में उलझ कर कराह रही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर इस बार कानून का हथौडा पड़ा है | देश की सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि ब्लॉग की सामग्री को लेकर किसी की खिलाफ भी कानूनी कार्यवाही की जा सकती है |न्यायालय का ये आदेश केरल के युवा अजित डी द्वारा शिवसेना के खिलाफ बनायीं गयी एक कम्युनिटी और उसमे की गयी टिप्पणियों के अनुक्रम में दिया गया है ,अजित ने सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र न्यायालय द्वारा लगातार भेजे जा रहे सम्मन के खिलाफ याचिका दायर की थी |उसके खिलाफ ठाणे में सेक्शन ५०६ एवं ५०६ -अ के तहत मुकदमा पंजीकृत किया गया है ,आरोप ये है कि उसने अपनी पोस्टिंग में ,शिवसेना पर धर्म की आड़ में देश को विभाजित करने का आरोप लगाया था |न्यायालय के इस आदेश के उपरांत उन लोगों का मार्ग प्रशस्त हो गया है जो ब्लोगिंग की ताक़तसे खौफजदा थे और उसे शिकंजे में कसने की हर सम्भव कोशिश कर रहे थे | यह पोस्ट लिखने की वजह सिर्फ ब्लोगिंग पर अंकुश लगाने की कवायद नहीं है बल्कि वह कानून भी है जिसकी आलोचना तो दूर विवेचना करने का भी साहस नहीं किया जाता|,हम कार्यपालिका और व्यवस्थापिका का न सिर्फ पोस्टमार्टम करते हैं बल्कि न्यायपालिका के द्वारा इन दोनों अंगो पर लगायी गयी फटकारों का भी गुणगान करते हैं ,लेकिन हद तो तब हो जाती है जब अनवरत असहमति और संविधान संशोधन की पुरजोर वकालत करने के बावजूद हम कानून के कड़वे और अव्यवहारिक परिणामों का विश्लेषण भी नहीं कर पाते |
ब्लोगिंग पर अंकुश लगाने की कोई भी कोशिश न सिर्फ इन्टरनेट की माध्यम से किये जा रहे विचारों की साझेदारी पर अतिक्रमण है ,बल्कि ये आम आदमी की बौद्धिकता पर अपनी सार्वभौमिकता साबित करने की कोशिश है | एक ऐसे देश में जहाँ मुक़दमे किसी परजीवी की तरह आम आदमी से चिपक जाते हैं एक ऐसे देश में जहाँ अदालतों की चौखट पर ही तमाम जिंदगियां दम तोड़ देती हैं एक ऐसे देश में जहाँ न्याय पाना उतना ही कठिन है जितना मृत्यु शय्या पर दो साँसे पाना ,एक ऐसे देश में जहाँ आतंकवाद,भ्रष्टाचार और राजनैतिक मूल्यों का अवमूल्यन चरम सीमा पर है |उस देश में व्यक्तिगत अभिव्यक्ति को बंधक बनाने की कवायद किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र में वैचारिक स्वतंत्रता पर किया गया अब तक का सबसे घोर अतिक्रमण साबित होगा ,जिसे कानून के उन गणितीय समीकरणों जैसे तर्कों से सही नहीं ठहराया जा सकता जिनमे सब कुछ पूर्वनिर्धारित होता है | |ये पोस्टिंग लिखते वक़्त मुझे मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन की ६ फ़रवरी को एक जनहित याचिका कि सुनवाई के दौरान की गयी वो टिप्पणी याद आ रही है जिसमे उन्होंने स्वीकार किया था कि देश की जनता का एक बड़ा वर्ग आज भी न्याय पाने के लिए अपनी आवाज नहीं उठा पाता ,और न ही खुद को अभिव्यक्त कर पाता है |उन्होंने इस दौरान देश में १०,००० अतिरिक्त न्यायालयों की स्थापना की आवश्यकता जताई थी ,आश्चर्य है कि एक तरफ हमारा न्यायालय अभिव्यक्ति की पराधीनता को लेकर बेहद चिंतित नजर आता है दूसरी तरफ मौजूदा कानून उसे कैदखाने में ड़ाल रहे हैं |हमें न्यायालय के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में तमाम भविष्यगत चिंताएँ हैं साथ ही उस मीडिया के लिए अफ़सोस है जो कि इलेक्ट्रानिक्स चैनल्स पर लगाम कसने की राजनैतिक कोशिशों के लिए तो काफी हो हल्ला मचाता है ,लेकिन ब्लागिंग को लेकर उसकी जुबान नहीं खुलती |इसकी वजह साफ़ है मीडिया भी जानती है की आने वाले कल में ब्लोगिंग का अस्त्र उसकी आर्थिक और उपनिवेशवादी सोच पर भारी पड़ने जा रहा है |

जहाँ तक ब्लागिंग कि सामग्री का प्रश्न है हम ये दावे के साथ कह सकते हैं कि सीमित संख्याओं के बावजूद हिन्दुस्तानी ब्लॉगर सर्वश्रेस्ठ कर रहे हैं ,उन तमाम मुद्दों पर खुली चर्चाएँ हो रही हैं जो कि समानांतर मीडिया के लिए वर्जित रहे हैं |लेकिन ये सच है कि हमने न्यायालय के किसी आदेश कि प्रतीक्षा किये बिना खुद के लिए सीमायें बना ली हैं विचारों के आत्मनियंत्रण का इससे अच्छा उदहारण बहुत कम देखने को मिलेगा |,यहाँ दिल्ली के एक बड़े मुस्लिम अखबार नवीस कि चर्चा करना जरुरी है जो कि मेरा मित्र भी है ,बटाला हाउस के इन्कोउन्टर के बाद वहीँ के रहने वाले मेरे मित्र ने इस पूरे इनकाउन्टर की एक तफ्तीश रिपोर्ट अपने ब्लॉग पर डालने की सोची ,लेकिन उसने नहीं डाला ,जानते हैं क्यूँ ?क्यूंकि उसे डर था कि पोस्टिंग आने के बाद पुलिस उसके खिलाफ कार्यवाही कर देगी |वो भी सिर्फ इसलिए क्यूंकि वो मुसलमान है |अभी कुछ दिनों पहले मशहूर ब्लॉगर और गासिप अड्डा
डॉट कॉम के सुशील सिंह के खिलाफ इसलिए मुकदमा दर्ज कर दिया गया क्यूंकि उनहोंने अपनी पोस्टिंग में हिन्दुस्तान अखबार के लखनऊ संस्करण के उस अंक की चर्चा कर दी थी जिसमे खुद अखबार के मालिक बिरला जी के निधन के उपरांत उनकी गलत तस्वीर प्रकाशित कर दी गयी थी |अब वो दिन दूर नहीं जब आपकी कवितायेँ ,आपकी टिप्पणियां ,आपके व्यक्तिगत विचार आपको जेल की सलाखों में कस देंगे |

ब्लागिंग को हम व्यक्तिगत कुंठाओं के परिमार्जन का जरिया कह सकते हैं ,निश्चित तौर पर इसके माध्यम से न हम खुद को अभिव्यक्त करते हैं बल्कि खुद को पूरी तरह से उडेल देते हैं ,शायद इसलिए ये अभिव्यक्ति का सर्वाधिक सशक्त माध्यम बनते जा रहा है ,हाँ ये जरुर है कि हर इंसान कि तरह अभिव्यक्ति और उसको प्रर्दशित करने के तरीके भी अलग अलग होते हैं ,ऐसे में अगर न्यायालय ब्लागरों से अमृत वर्षा की उम्मीद करता है तो नहीं करना चाहिए |हाँ ये जरुर है कि अभिव्यक्ति ,निजी तौर पर किसी को आह़त करने वाली नहीं होनी चाहिए|,हम इससे इनकार भी नहीं करते कि ब्लोग्स के माध्यम से न सिर्फ भड़ास निकली जा रही है इसे दूसरो के मान-मर्दन के अस्त्र के रूप में भी इस्तेमाल किया जा रहा है ,लेकिन ये बहुत छोटे पैमाने पर हो रहा है ,और इसको नियंत्रित करने के लिए कानून का इस्तेमाल करने के बजाय,परम्पराओं का निर्माण करना ज्यादा जरुरी है |दुनिया के सबसे बड़े हिंदी ब्लॉग भड़ास को चला रहे मेरे मित्र यशवंत सिंह को इन्ही परम्पराओं को स्थापित करने के लिए तमाम झंझावातों से जूझना पड़ रहा है ,उनकी समस्या तब शुरू हुई जब उनहोंने अपने ब्लॉग पर खुलेआम गाली गलौज और अर्थं टिप्पणियों को रोकने के लिए कुछ लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया अब वही लोग अलग -अलग फोरम से यशवंत के खिलाफ अभियान चला रहे हैं|


इस पोस्ट को लिखने की वजह न्यायालय की अवमानना करना कदापि नहीं है ,हम सिर्फ ये कहना चाहते हैं की हमें कहने दीजिये ,हमारे होठों को मत सिलिये हमारी अँगुलियों में जुम्बिश होने दीजिये ,हमारे पास सिर्फ शब्द हैं उन शब्दों को हथियार बनाकर लड़ाई करना हमेशा कठिन होता है ,अगर हम चुप रहे तो हमारे लोकतान्त्रिक अधिकारों की आत्मा का तिरस्कार होगा |हमें चुप करना उनके हाथों हमारी वैचारिक हत्या कराने की वजह बनेगा ,जो हर पल संघर्ष कर रही जनता की चुप्पी की बदौलत ही उसके सीने पर चढ़कर राज कर रहे हैं |हमें चुप करना हमारी आदमियत को ख़त्म करने जैसा होगा |हमने कभी लिखा था-
कौन पूछेगा हवाओं से सन्नाटों का सबब ,शहर तो यूँही हर रोज मरा करते हैं
कभी दीवारों में कान लगाकर तो सुनो ,कलम के हाँथ भी स्याही से डरा करते हैं
अगर ब्लॉग पर अंकुश लगाने की कोशिश की गयी तो इस बार शहर हमेशा के लिए मर जायेंगे ,और निसंदेह ये एक लोकतान्त्रिक देश में किया गया हालोकोस्ट होगा |

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

एक औरत की मौत!


'अगर यह मृत्यु है तो मुझे इसके बारे में अब नही सोचना है ',ये शब्द प्रख्यात अंग्रेजी साहित्यकार लिटन की जुबान से निकले आखिरी शब्द थे ,लिटन के ये शब्द मुझे कभी नही भूलते आपने कभी अपनी मौत के बारे में सोचा है ?कैसी होनी चाहिए मौत ?क्या मृत्यु नितांत व्यक्तिगत चीज है ?क्या इसमे रंग भर के इसे उत्सव की चीज नही बनाया जा सकता ?क्या मौत भी मनोरंजन का विषय बन सकती है? अगर आपको मेरा ये सवाल परेशान कर रहा है तो आप जेड़ से मिलें .बिग ब्रदर नामक रियलिटी शो,और उसमे की गई अपनी रंगभेदी टिप्पणियों को लेकर चर्चित गुडी का मैं कभी फैन नही रहा ,हाँ शिल्पा पर उसकी टिप्पणियों से मैं आम हिन्दुस्तानियों की तरह आहत जरुर हुआ .लेकिन उसकी एक बात ने मुझे मजबूर कर दिया की मैं उसे विश्व इतिहास के महानतम लोगों की सूची में शामिल करूँ .सर्वाइकल कैंसर से दिन रात जूझ रही जेड़ की जिजीविषा को मेरा प्रणाम है .अब पूरी दुनिया उसकी मौत का अनूठा रियलिटी शो देखेगी ,जेड़ ने अपनी मृत्यु के लाइव टेलीकास्ट के लिए LIVING TV को मीडिया राईट दे रखा हैं,LIVING TV की चीफ क्लौडिया कहती है 'उसने ऐसा अपने बच्चों के लिए किया है वो इससे मिलने वाले पैसे का अपने बच्चों के लिए सुरक्षित रखना चाहती है ,साथ ही दुनिया को ये दिखाना चाहती है की कैंसर से कैसे लड़ा जाए 'जेड की जिन्दादिली तो देखिये ,कैंसर क्लीनिक से बाहर निकलने के बाद उसने अपने प्रेमी जैक ट्वीड के साथ शादी करने का ऐलान किया और अपने छोटे बच्चों के साथ खरीददारी करने निकल गई जेड़ के producers को इस बात की चिंता है की वो अपने हैल्थ पर ध्यान देने केबजाय अपनी शूटिंग पर ज्यादा ध्यान दे रही है.

जेड एक महिला है .वो उतनी ही औरत है जितनी कोई आम हिन्दुस्तानी औरत वो उतना ही बिलबिला कर रोती है जितना कोई और औरत,वो उतना ही हंसती है जितनी कोई जिंदगी से लबरेज नवयोवना हंसती है ,वो उतने ही प्यार से अपने बच्चों का माथा सहलाती है जितना हमारी माएं ,लेकिन वो मौत से उतना नही डरती जितना एक आम पुरूष डरता है ,भौतिक सुख सुविधाओं की बदौलत १०० फीसदी जीने का दावा करने वाले हम सब मौत की दस्तक सुनते ही अक्सर लाचार हो जाते हैं या फ़िर वैचारिक कोमा में चले जाते हैं .नतीजा ये होता है न तो हम बचे हुए दिनों को जी पाते हैं न होठों पर मुस्कान लिए मर पाते हैं ,मानवीय जीवन का सबसे बड़ा कौतहुल मृत्यु ,और उस मृत्यु को मनोरंजन का हिस्सा बनाती जेड ऐसे में हमें बहुत कुछ सिखा जाती है ,जेड़ की मित्र मेक्स कहती हैं की वो ख़ुद को व्यस्त रख कर मृत्यु की सत्यता से पैदा हुए आघात और दर्द को अनवरत झुटला रही है ,और वो इसमे सफल हुई है .


जेड की मौत सिर्फ़ रियलिटी शो का हिस्सा नही होगी ,वो हाइपररियलिटी मौत होगी जो हमें सिखलाएगी की रियलिटी और फंतासी में क्या अन्तर होता है न उसमे बिग बॉस की तरह बनाया गया घर होगा और नही कैमरे को देखकर एवं पब्लिसिटी पाने के लिए बोले जाने वाले संवाद ,वहां एक सच्ची मौत होगी ,क्या करेंगे आप और हम ?उसकी मौत को चाय के प्याले के साथ आँख आँख गडाये देखेंगे या आँख मूँद लेंगे ?अगर आप इस सवाल का जवाब गुडी से लेंगे तो वो कहेगी ,नही आइये आप देखिये ,मेरे बच्चों के लिए देखिये ,उन लोगों के लिए देखिये जिनकी मौत बेहद कष्टकर होती है और साथ में अपने लिए देखिये .मुझे ये पोस्ट लिखते वक्त जिम कैर्री की अवार्ड प्राप्त फ़िल्म 'THE TRUMAN SHOW' का अन्तिम दृश्य याद आ रहा है ,जिसमे कैरी अपने लाखों दर्शकों के सामने कहता है कि'मान लीजिये मैं आपको दुबारा न देख पाऊं तो इसलिए अभी से आप सबको सुप्रभात,शुभरात्रि ' शायद जेड भी यही कह रही है .


अपने एक हालिया साक्षात्कार में गुडी ने कहा कि 'मैंने अपनी सारी युवावस्था अपनी जिंदगी के बारे में सोचते हुए बिता दी अब अन्तर सिर्फ़ इतना है कि में अपनी मौत के बारे में सोच रही हूँ मैंने अपनी सारी जिंदगी कैमरे के सामने बीता दी और मरना भी कैमरे के सामने तय कर लिया है ,में जानती हूँ कि कुछ लोगों को मेरे निर्णय से नाराजगी होगी लेकिन मुझे इसकी परवाह नही है '!आज इस वक्त जब आप मेरी ये पोस्टिंग पढ़ रहे होंगे living tv पर 'jade's progress' नामक उस रियलिटी शो का सीधा प्रसारण हो रहा होगा जिसमे ये दिखाया जाएगा कि जेड का प्रेमी वापस उसके पास लौट आया है ,और कैमरे के सामने जेड कीमोथेरेपी कराते हुए ख़ुद को और मजबूत बनाने की कोशिश कर रही है .आपको शायद ये जानकर आश्चर्य होगा कि उसके प्रेमी जैक ट्वीड ने उसके सामने उस वक्त विवाह का प्रस्ताव रखा था जब उसे पता चला गुडी का कैंसर लाइलाज है.


बिग बॉस से जाते वक्त गुडी कि आंखों से बहते हुए आंसू हममे से बहुतों को याद होंगे ,उस वक्त भी उसकी आंखों में कैंसर का भय कम अपने हिन्दुस्तानी मित्रों से बिछड़ जाने का दर्द अधिक नजर आया था ,वो शिल्पा के प्रति अपनी टिप्पणियोंका पश्चाताप करने आई थी ,और यहाँ से ढेर सारा प्यार लेकर वापस लौट गई .डाक्टरों ने साफ़ तौर पर कहा है की गुडी कुछ ही महीनो की मेहमान है हो सकता है उसके बच्चों और उसके प्रशंसकों की दुआएं फलीभूत हो,ये भी हो सकता है हम उसे खो दे अगर उसकी मौत होती है तो भी एक बेहद शक्तिशाली ,और आत्मविश्वास से भरी असाधारण महिला के रूप में वो हमें हमेशा याद रहेगी , उसकी मौत जिंदगी का फलसफा बयां करने वाला अब तक का सबसे विश्वस्त दस्तावेज होगा ,सलाम गुडी ......

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

प्यार, मोहब्बत और कोका कोला के बीच


मानवीय संबंधों की कल्पना प्यार के बगैर नही की जा सकती ,आज के दौर में विकास की कीमत सिर्फ़ प्रकृति ही नही ,मानवीय रिश्ते भी चुका रहे हैं स्त्री पुरूष संबंधों के सन्दर्भ में माना जा रहा है की जीवन की सफलता (?)में प्यार -व्यार की दरकार ज्यादा नही ये क्या कम आश्चर्यजनक है की वैलेंटाइन डे में प्यार को ढूंढने और भजाने वाले तबके और साथ में समाज के बुद्धिजीवी वर्ग ने सेक्स को निजी अधिकार घोषित कर दिया है ,वे इसे मनचाहे ढंग से भोगने के हिमायती हैं ,यहाँ तक कि देह कि सौदेबाजी भी वैश्वीकरण का पर्याय बन गई है यही हालात रहे तो सेक्स में भी प्यार कि उष्णता नही बचेगी ,प्रेम तब केवल वैलेंटाइन डे जैसे निर्जीव उत्सवों में ,फाइलों और किताबों में मिलेगा,विलुप्त वन्य जीव प्राणियों के भांति ,चाँद और फिजा के भांति ऐसे में देश में प्रेमी युगलों का ,संवेदनाओं का और मानवता की हत्याओं का दौर अन्दर ही अन्दर चलता रहेगा ,और टूटन बदस्तूर जारी रहेगी ,चाहे हम प्रेम में कितना भी आधुनिक होने का दावा क्यूँ न करें आज हम उनकी बात करेंगे जिसने सभ्यता का विकास ,संस्कृति और परम्पराओं को रौंद कर नही किया ,उसने प्रकृति के अनुकूल अपनी लघुता और असहायता को विनम्रता से स्वीकार करते हुए प्रेम करना जारी रखा जी हाँ हम बात कर रहे देश के आदिवासी समाज कीयदि आज की शहरी सभ्यता के पास सच्चे प्यार की पूंजी दस फीसदी शेष है तो वनवासी सभ्यता के पास आज भी प्यार की पूंजी ५० फीसदी से ज्यादा है प्रेम के अलावा उनके पास कुछ भी न तो स्थायी है और न ही सुरक्षित सुख सुविधा नही है तो क्या हुआ प्यार तो है अंग्रेजी के कुछ शब्द जैसे लाइव इन रिलेशनशिप हम अपने खुलेपन के लिए प्रयोग करते हैं लेकिन खुलापन जब तक संवेदनाओं पर आधारित हो तब तक गनीमत हैआदिवासी सभ्यता में खुलापन पूरी संवेदना के साथ मौजूद है ,प्रेम की अपनी कोई भाषा नही होती यदि होती है तो वे मीठी बोली ही होती है वनवासी समाज में बोली का असर भी गोली की तरह होता है वे प्रेम में सब तकलीफ उठा सकते हैं कठोर बातें बर्दाश्त कर पाते नही भारत के गोंड वनवासी युवक से उसकी प्रेमिका कहती है - कच्चे सूत की लई लगी है धका लगे टूट जाई रे बालकपन से प्रीत जुटी है बात कहे टूटी जाई रे कच्चे धागे का बंधन जिस तरह खींचते लगते ही टूट जाता है उसी तरह बचपन की प्रीत एक ही कठोर बात से टूटकर बिखर जायेगी वनवासी समाज में जीवन का मतलब है 'उत्सव;उनके पास पहाड़ है ,पेड़ है ,पशु प्राणी हैं ऊँची नीची ,पथरीली ,कंकरीली असिंजित जमीं है प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और अनुकूल प्रकृति की ,कामना इसलिए की जाती है क्यूंकि हम आपस में प्यार कर सकें संपूर्ण झारखण्ड,छतीसगढ़,सोनभद्र ,मध्यप्रदेश के वनांचल में वनवासी या तो आपनी के लिए तड़पते हैं या प्यार के लिए प्रेम को वहां सामाजिक स्वीकृति प्राप्त है ,क्यूंकि वह मात्र दैहिक स्वतंत्रता नही,न तो किसी तिथि को आयोजित भौड़ा प्रदर्शन है एक करमा गीत में एक युवक कहता है तोर चेहरा मैं ओ ,हाय हो रानी तोर चेहरा आर मोरो दिल बस गे रानी तोर चेहरा प्रिये,मेरा दिल तुम्हारी सूरत में बस गया है ,तुमने मुझे बुलाया ,मैं निश्चित स्थान पर पहुँच तुम्हारी राह जोतता रहातुम अपने साथी के साथ पलंग में झूलती रही ,मैं घर के पीछे खडा रहा ,आओ चलो घास के छोटे छोटे गट्ठे काट लेंगे और जंगल में झोपडी बनाकर अपनी प्यास बुझाएंगे आदिवासी समाज में 'घोटुल' की परम्परा टूट गई जहाँ युवक युवतियां प्रेम विवाह कर लेते थे ,वनवासी समाज ने तिलक ,दहेज़ तलाक को कभी मान्यता नही दी,वनवासी परिवारों में आज भी स्त्री ही केंद्रीय शक्ति है ,ज्यादातर काम भी वही करती है ,पत्थर के साथ पत्थर ,मिटटी के साथ मिटटी बन जाती है ,फ़िर भी उसके मन में प्रेम का सोता झिरता रहता है वनवासी समाज में प्यार का मतलब है समर्पण ,तनिक सा स्वार्थ रिश्ते को तोड़ देगा अगर पहाड़ से गिरोगे तो बचोगे नही ,टूटे रिश्ते और पत्ते कभी नही जुड़ते ,विपरीत परिस्थितियों में भी प्रेम की ताक़त से जीने की कला जीवन संघर्ष की प्रेरणा,दुःख सुख को बाटने की मानवीय तकनीक हमें वनवासी ही सिखाते हैं वे हमें ये भी सिखाते हैं की वैलेंटाइन डे जैसे उत्सव हमारे स्वभाव,संस्कार और जीवन के अनुकूल नही हो सकते प्यार ,मोहब्बत कोकाकोला नही है की प्यास बुझाओ ,बोत्तल फेंको और चल दो ,ये पानी की तरह है ,जीवनदायक है निर्मल है,शीतल है ,हाँ और शाश्वत है