गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

सनसनी .समझौतों और सिक्कों पर पलती पत्रकारिता





राजदीप सरदेसाई हालिया प्रकाशित अपने लेख में कहते हैं 'विश्वश्नियता के मुद्दे पर भारतीय पत्रकार ,चैनल सम्पादक और कुछ हद तक अखबार के सम्पादक भी अपनी जमीन खोते जा रहे हैं' |पुण्य प्रसून वाजपेयी को पत्रकारिता के खिलाफ राजनैतिक अतिवादिता से गहरी शिकायत है ,उन्हें लगता है अब पत्रकारिता से राजनीति को नहीं राजनीति से पत्रकारिता को नियंत्रित करने का शर्मनाक दौर शुरू हो गया है | अगर हम मौजूदा समय में हिन्दुस्तानी पत्रकारिता को समझना चाहते हैं तो हमें इन दोनों स्थितियों का विश्लेषण करना होगा ,क्यूंकि ये सिर्फ्र दो स्थितियां या घटनाएँ नहीं हैं बल्कि ये देश में इस वक़्त पत्रकारिता के दो पाटों में बटे होने का दस्तावेज हैं ,एक पाट वो है जिसकी चर्चा राजदीप कर रहे हैं और पुण्य प्रसून के शब्दों में कहें तो वो शीशे से दुनिया देखने वाले पत्रकारों की जमात है| ये वो हैं जिन्हें या तो राजनैतिक दल ,या फिर राजनैतिक परिस्थितियां प्रभावित कर रही हैं ,इन लोगों ने या तो पत्रकारिता को राजनीति की रखैल बनते देखना स्वीकार कर लिया है या फिर पत्रकारिता के नाम पर खुद के बलात्कार की इजाजत दे दी है |एक दूसरा पाट भी है ,जो चुप नहीं रहता उसे पहले पाट की उपस्थति से भी चिढ है साथ ही वो बार बार हारने,टूटने और अखबारी बनियों के हाथों लतियाये जाने के बावजूद के बावजूद कलम को सलामी ठोकना नहीं छोड़ता,उसे राजनीति के आतंक का खत्म करना भी आता है ,और अति का जवाब देना भी |हिन्दुस्तानी पत्रकारिता के लिए ये गर्व का विषय है कि अस्तित्व और रोजी रोटी से जुडी तमाम चुनौतियों के बावजूद आज इस दूसरे पाट के पत्रकारों की संख्या बेहद अधिक है ,सिर्फ अधिक ही नहीं है इनकी संख्या लगातार बढती भी जा रही है, हालाँकि उनके बारे में चर्चाएँ यदा कदा ही किसी फोरम पर होती है |ये भी सच है कि इस दूसरे पाट के पत्रकारों के लिए ख़बरों की विश्वसनीयता को कायम रखना रोटी के साथ साथ खुद की पहचान को बनाये रखने से भी जुड़ा होता है |राजदीप की कठोरता और पुण्य प्रसून वाजपेयी की शिकायत सिर्फ इसलिए है क्यूंकि अब तक ख़बरों को सिर्फ सनसनी ,सिक्कों और अक्सर समझौतों की कसौटी पर ही प्रस्तुत किया जाता रहा है ,अगर सरोकार भी ख़बरों के प्रस्तुतीकरण का जरिए होते तो शायद इतना हो हल्ला नहीं मचता |


मुझे २ वर्ष पहले की एक घटना याद आती है लखनऊ में सड़क पर २४ घंटे से लावारिस पड़ी एक बीमार महिला और उसको चिकित्सा विश्वविद्यालय में कुछ अख़बार के संवाददाताओं और फोटोग्राफरों द्वारा भरती कराये जाने का समाचार मेरे अख़बार ने प्रथम पृष्ठ पर लीड स्टोरी के रूप में प्रकाशित किया था ,अगले दिन सुबह जब मैं अपने भूतपूर्व सम्पादक प्रभात रंजन दीन के कमरे मैं बैठा था तो खबर आई कि चिकित्सा विश्वविद्यालय से उस महिला को निकालकर एक बार फिर सड़क पर फेंक दिया गया है ,ये सिर्फ एक खबर हो सकती थी ,लेकिन जानते हैं मेरे सम्पादक ने क्या कहा ?उन्होंने फ़ोन पर संवाददाता को आदेश दिया जाओ वहां बवाल कर दो धरने पर बैठ जाओ ,कपडे फाड़ डालो ,ये कोई प्रहसन नहीं था| बवाल हुआ या नहीं मुझे नहीं मालूम ,लेकिन अस्पताल में पुनः भारती होने के एक हफ्ते बाद वो महिला स्वस्थ होकर अपने घर जा चुकी थी |एक घटना फिर घटी जिस वक़्त महाराष्ट्र में राज ठाकरे उत्तर भारतीयों को पानी पी पी कर गाली दे रहे थे ,उस वक़्त प्रभात जी ने अखबार में पहले पन्ने पर सुचना प्रकाशित की कि हम कभी भी राज ठाकरे का नाम प्रकाशित नहीं करेंगे ,ये वही समय था जब भाषा के मुद्दे पर उत्तर भारत और शेष भारत को अलग अलग बांटा जा रहा था ,शायद आपको याद हो ठीक उसी वक़्त टीवी -१८ ने बेहद आश्चर्यजनक ढंग से मराठी भाषा में लोकमत समाचार चैनल लॉन्च कर दिया था .संभव है ये कदम सरोकार से जुड़ा हो लेकिन हम इसे अवसरवादिता से जोड़ कर देखते हैं |संसद में नोट की गद्दियाँ उछाले जाने के वक़्त भी मीडिया ने सरोकारों को अनदेखाकर खबरें प्रस्तुत की ,उस वक़्त पूरा देश खबरी चैनलों से सच जानने की उम्मीद कर रहा था ,अगर सरोकार होते तो बेवजह के तर्कों में सबको उलझाये बिना किसी भी कीमत पर सच दिखाया जाता |जहाँ सरोकार नहीं होते वहीँ विश्वसनीयता का संकट पैदा होता है ,ये भी मानना होगा कि अगर राजनीति जैसे महत्वपूर्ण विषय में खबरिया चैनलों या फिर अख़बारों के सरोकार गायब रहेंगे ,तो शोमा और कोमालिका के किस्से सामने आते रहेंगे|जो नही जानते हैं उन्हें हम बता दे, पश्चिम बंगाल की इन दोनों महिला पत्रकारों का तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा न सिर्फ़ घोर अपमान किया गया ,बल्कि शोमा पर ममता बनर्जी की हत्या की साजिश का आरोप लगाकर पुलिस के सुपुर्द भी कर दिया गया | पुण्य प्रसून वाजपेयी ने जिन घटनाओं का जिक्र किया है उनमे तृणमूल के कार्यकर्ताओं का दोष कम उन चैनलों का दोष अधिक है जिन्होंने खुद की छवि राजनैतिक पार्टियों की रखैल के रूप में बना रखी है |खतरनाक ये है कि सिर्फ क्षेत्रीय चैनल या अखबार नहीं तमाम राष्ट्रीय अख़बारों और चैनलों में रखैल बनने का ये शगल जोरों पर है |सिर्फ टी आर पी और थोथे सर्वेक्षणों के आधार पर अपना मूल्यांकन करने वाले चैनल और अखबार अगर खुद का चेहरा आईने में देखना चाहते हैं तो मीडिया के मंचों पर नहीं आम आदमी के बीच जाकर संवाद करें दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा |और ये कहने मैं मुझे तनिक भी हिचकिचाहट नहीं है राजनीति और पत्रकारिता के इस गठजोड़ के बारे में इमानदारी से लिखने की हिमाकत भी नहीं की जा रही |जहाँ भय है वहां विश्वसनीयता का माहौल बनेगा कैसे ?


राजदीप सरदेसाई अपने उसी लेख में कहते हैं 'जब एक ही स्टोरी को अलग अलग मंचों से और सौ अलग अलग तरीकों से कहा जा रहा है ,एक निष्पक्ष खबर पेशकर्ता के तौर पर पत्रकार की छवि दुर्लभ होती जा रही है' |राजदीप किन ख़बरों की बात कर रहे हैं ?जहाँ तक हम देखते हैं सिर्फ राजनीति ही एक ऐसा विषय है जहाँ प्रस्तुतीकरण में विभेद होता है ,और माफ़ कीजिये ये विभेद पत्रकार नहीं पैदा करता ,ये विभेद चैनलों और अख़बारों के राजनैतिक संबंधों का प्रतिफल होता है ,कोमालिका क्या करे अगर उसे अपने घर परिवार की रोटी 'आकाश चैनल 'से मिलती है ?शोमा को अगर ख़बरों की कवरेज का चरम सुख अगर किसी ऐसे चैनल के माध्यम से मिलता है जिसका चरित्र वामपंथी है तो उसमे उसका क्या कसूर ?ये पुण्य प्रसून का सरोकार है नए लोगों के लिए ,कि उन्हें ऐसी घटनाओं से दुःख होता है |नहीं तो दूसरे पाट में ख़बरों को जी रहे कलमकारों की चर्चाएँ ही कौन करता है ,खबरें उन्ही की वजह से जिन्दा हैं ,आम आदमी से जुड़े सरोकार भी उन्ही से सध रहे हैं ,और विश्वसनीयता भी उन्ही की बदौलत कायम है | अगर हममे जरा सी भी संवेदनशीलता शेष है तो पुण्य प्रसून वाजपेयी के दर्द को समझें साथ ही राजदीप के डर को पहचाने ,क्यूंकि वो इमानदारी से आत्मुल्यांकन तो कर रहे हैं |आत्म विवेचना का साहस पत्रकारिता का सूत्रवाक्य है |

दस वर्ष पूर्व मैंने दो लाइने लिखी थी आज आपसे बाँट रहा हूँ |


कौन पूछेगा हवाओं से का सबब ,शहर तो यूंही हर रोज मरा करते हैं
कभी दीवारों में कान लगाकर तो सुनो ,कलम के हाँथ भी स्याही से डरा करते हैं |





रविवार, 11 अक्टूबर 2009

प्रोफाइल फैक्टरी ऑफ़ मीडिया

दैनिक जागरण के संस्थापक स्वर्गीय नरेन्द्र मोहन को आपमें से बहुतेरे लोग जानते होंगे एक अखबार के संस्थापक सम्पादक और राज्य सभा के पूर्व सदस्य के रूप में मैं भी उनको जानता हूँ मैं उन्हें एक प्रखर चिन्तक और दार्शनिक कवि के रूप में भी जानता हूँ मुझे ये भी पता है कि उनका अखबार अपने साप्ताहिक अंक में उनकी कवितायेँ नियम प्रकाशित करता था ,लेकिन एक बात मुझे अभी मालूम हुई वो ये कि नरेन्द्र मोहन समकालीन हिंदी साहित्यकारों के अगुवा थे ,ये बात मुझे अखबारी दुनिया के बहुरूपिये के रूप में चर्चित होते जा रहे दैनिक जागरण से ही मालूम हुई |खुद को देश में हिंदीभाषियों में सर्वश्रेष्ठ कहने वाले जागरण ने कल नरेन्द्र जी के जन्मदिवस पर जबरियन प्रेरणा दिवस मनाया ,पूरे देश में जागरण समूह ने स्वयंसेवी संगठनों और एजेंसियों से मान -मनोव्वल करके और लालच देकर उन्हें आयोजक बना दिया ,और आज के अखबार के मुख्य पृष्ठ और अन्दर के पेजों पर 'पूरे देश में मनाया गया प्रेरणा दिवस 'शीर्षक से खबर चस्पा कर दी ये किसी भी व्यक्ति को जनप्रिय बनाने के अखबारी फान्देबाजी का सबसे बड़ा उदाहरण है ,ऐसा नहीं है कि जागरण ये प्रयोग सिर्फ स्वर्गीय नरेन्द्र मोहन के लिए कर रहा है ,पूर्व के लोकसभा चुनाव और अब होने जा रहे विधान सभा चुनावों में प्रोफाइल मेकिंग का ये काम करोडो रूपए लेकर किया जा रहा है |नरेन्द्र जी की खूबियों और उनकी रचनाधर्मिता को साबित करवाने के लिए इस अवसर पर जो भी आयोजन किये गए ,उनमे नामचीन साहित्यकारों को बुलवाकर स्वर्गीय नरेन्द्र जी का महिमा गान करवाया गया ,चूँकि छोटे बड़े साहित्यकारों में से ज्यादातर अभी तक अखबारी छपास की खुनक से मुक्त नहीं हो पाए हैं तो सभी ने नरेन्द्र जी का जम कर यशोगान किया ,जागरण की बेबाकी और निष्पक्षता की शर्मनाक किस्सागोई की गयी वहीँ ख़बरों की हनक से हड़कने वाले तमाम नौकरशाहों ने भी इस आयोजन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर अखबार को सलामी ठोकी
इस पोस्टिंग को लिखने की वजह कहीं से भी नरेन्द्र जी की काबिलियत और उनकी विद्वता पर अंगुली उठाना नहीं है यहाँ हम सिर्फ और सिर्फ बड़े अखबारों की साम दाम दंड भेद के बल पर प्रोफाइल मेकिंग के राष्ट्रीय कार्यक्रम से आपको रूबरू कराना चाहते हैं ,हम चाहते हैं आप भी इस छद्म को पहचाने| नाम नहीं लूँगा लेकिन आज देश में कई नामचीन सिर्फ इसलिए नामचीन हैं क्यूंकि मीडिया ने उन्हें सारे मूल्यों को ताक पर रखकर अवसर दिया ,और कई योग्यता के बावजूद सिर्फ इसलिए हाशिये पर हैं क्यूंकि उन्होंने अखबारी साहूकारों की दलाली नहीं की |दैनिक जागरण का प्रेरणा दिवस बहुत कुछ उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के जन्मदिवस की याद दिलाता रहा ,जहाँ पैसा बटोरकर जन्मदिवस मनाया जाता है ,गनीमत बस इतनी रही कि अन्य अवसरों की तरह इस मौके पर विज्ञापन नहीं वसूले गए
आजकल मीडिया से जुड़े तमाम ब्लागों ,गोष्ठियों में अखबारों के बाजारुपना की चर्चाएँ जोरों पर हैं ,मगर अफ़सोस इस बाजारुपन के चरित्र में किनकी बोली लगायी जा रही है इस पर बहुत कम बात होती है यकीन करना कठिन है मगर सच है कि मीडिया छोटे कस्बों से लेकर जनपदों ,फिर बड़े शहरों ,राज्यों और फिर अंत में राष्ट्रीय स्तर पर बेहद गुपचुप ढंग से लोकप्रिय बनाने का कारखाना चला रहा है ,इस कारखाने में थानेदारों से लेकर नेताओं ,साहित्यकारों ,पत्रकारों और समाजसेवियों सभी का निर्माण हो रहा है ,ये हिदुस्तान की आजादी के बाद मीडिया के चरित्र में आई गिरावट का सबसे बड़ा उदाहरण है ,अफ़सोस ये है की इन्फेक्शन बहुत तेजी से अब संचार के नया माध्यमों यहाँ तक की ब्लागर्स पार्क में भी घुस रहा है मुझे उत्तर प्रदेश के एक बड़े आई .पी,एस रघुबीर लाल का उदाहरण देना यहाँ समीचीन लगता है ,जिसे राष्ट्रपति पुरस्कार से समानित कराने के लिए जागरण ने पूरी ताक़त झोंक दी निठारी की घटना के तत्काल बाद जिस वक़्त पूर्वी उत्तर प्रदेश से लापता सैकडों बच्चों के सन्दर्भ में दैनिक जागरण में ही खबर प्रकाशित हुई और अखबार को इस खबर का असर उक्त आई.पी,एस पर पड़ता दिखा ,तो अगले ही दिन हास्यास्पद तरीके से उस अधिकारी के हवाले से दैनिक जागरण में ही झूटी खबरें न प्रकाशित करने की नसीहत प्रकाशित कर दी गयी खैर अखबार सफल रहा और रघुबीर लाल अखबार की मेहरबानी से राष्ट्रपति पदक पाने में सफल रहे पिछले एक दशक से छोटे बड़े सभी चुनावों में इसी तरह से ये अखबार अपनी मेहरबानियों को बेचकर जनता के माइंड वाश का काम करते हैं मैं कई ऐसे समाजसेवियों लेखकों और साहित्यकारों को जानता हूँ जिनका नाम ये अखबार सिर्फ इसलिए प्रकाशित नहीं करते क्यूंकि उन्होंने कभी भी अखबारी दुनिया में जागरण की सत्ता को स्वीकार नहीं किया जिस तरह से राजनेता सिर्फ खुद को ही नहीं अपने पूरे कुनबे को आम जानता पर थोप रहे हैं ,अखबारों में भी ये कुनबायी संस्कृति तेजी से फल फूल रही है ,अख़बारों के प्रथम पृष्ठ से लकार सम्पादकीय तक में ये सब कुछ साफ़ नजर आ रहा है ,प्रादेशिक डेस्क से लेकर नेशनल डेस्क तक हर जगह अब इन कुनबों के लोग हैं ,ऐसे में आप इन अखबारों से किस क्रांति की उम्मीद कर सकते हैं ?ये आश्चर्यजनक लेकिन सच है कि कई बड़े अख़बार तो उन पत्रकारों की मौत की खबर भी नहीं छपते जो दूसरे अखबारों में काम करते हैं ,यही बात स्वर्गीय नरेन्द्र मोहन जी के सन्दर्भ में भी है ,दैनिक जागरण को छोड़कर और किसी छोटे बड़े अखबार ने इस महायोजन के सन्दर्भ में एक शब्द भी नहीं छापा ,उत्तर प्रदेश में प्रेरणा दिवस के आयोजकों में से एक कहते हैं हम इस बहाने अगर हम नंबर एक अखबार के नजदीक आ जाते हैं तो इसमें बुरा क्या है ?अखबार वालों से नजदीकी कौन नहीं चाहता

सोमवार, 14 सितंबर 2009

भैंस ,लड़की और आई.ए .एस



मुझे चार भैंस चाहिए ,न एक कम न एक ज्यादा ! मुझे आई.ए .एस बनना है !आप भी कहेंगे ,भला भैंस से आई.ए.एस कोई कैसे बनता है ?जी नहीं ,बनता है !अगर नहीं बनता है तो भी बनने की कोशिश करता है |चलिए आपको सुना ही देता हूँ भैंस से आई.ए .एस बनने के कोशिशों की कहानी|ये कहानी शुभकुमारी की सच्ची कहानी है ,वो शुभकुमारी जो हमारे देश के हर गली,कस्बे ,गाँव ,गिरांव में है ,वो शुभकुमारी जो राहुल गाँधी के भाषणों में उन्हें जननेता साबित करने के लिए ,नारी अधिकारों से जुड़े कानूनों ,दावों,और कार्यक्रमों में नारी की मौजूदगी को कायम रखने के लिए कथित तौर पर मौजूद रहती है ,लेकिन टी .वी पर नहीं आती |वो शुभकुमारी जो हमारी बहन ,बेटी ,माँ भी हो सकती थी ,मगर नहीं हुई !आखिर उसे तो जन्म लेना था इस किस्से का हिस्सा बनने के लिए |आज से ठीक तीन दिन पहले अस्वस्थता के बावजूद मैं अपने एक ब्यूरोक्रेट मित्र के कार्यालय में मौजूद था ,उसके कार्यालय में घुसने से पहले मुझे बाहर की मेज़ पर बैठी मिल गयी शुभकुमारी|साफ़ सुथरे लेकिन बिना इस्त्री किये कपडों में साक्षात् काली माई के रूपावतार में |बालों में लगे ढेर सारे तेल और कंधे पर कालिख पुते झोले को देखकर मैंने सोचा , हमेशा की तरह कोई आम आदिवासी लड़की ,सरकारी कर्मचारियों के जोर- जुल्म की शिकायत करने आई होगी |मैं कार्यालय में अन्दर घुसा और अपने अतिज्ञान एवं पत्रकार होने के अहम् को सर्वोपरि रखते हुए ,मित्र और उसके अधीनस्थों के बीच,विभाग में हो रहे भ्रष्टाचार की रसीली चर्चा में शामिल हो गया |ठीक दस मिनट बाद शुभकुमारी कमरे में दाखिल हुई ,मित्र के टेबल पर अपनी दरखास्त सबसे ऊपर रख कर ,अभी उसने हाँथ जोड़ा ही था कि मेरे मित्र ने तपाक से बोला "तुम्हे भैंस नहीं मिल सकती !"

कहाँ बांधोगी तुम भैंस ?कहाँ है तुम्हारे पास जमीन ?चार भैसं ही क्यूँ चाहिए तुम्हे ?मैं अवाक था ये किस्सा -ए -भैंस क्या है ??शुभकुमारी ने याचक की तरह कहा "सरकार हमारे पास १२ बिस्वा जमीन है हम वहीँ भैंस को बाँध लेंगे ,वो जमीन हमारी है हमारे बाप दादा जोतते -कोड़ते थे सरकार "|मित्र ने लगभग खीजते हुए कहा" मैं क्या करूँ ?मैंने लिख कर भेज दिया था बैंक मैनेजर को ,वो नहीं सुनता तो हमारी क्या गलती ?वो कहता है जमीन तुम्हारी नहीं ,जेपी सीमेंट की है |अब अगर तुमने भैंस खरीदी और फिर जेपी ने जमीन खाली करा ली तो भैंस के पैसों की वसूली के लिए तुम्हे कहाँ कहाँ खोजेंगे" |शायद शुभकुमारी को इस सरकारी खीज की अपेक्षा नहीं थी बस फिर क्या था फूट फूट कर रोने लगी |"हम दो महीना से चक्कर काट रहे हैं ,काहे को परेशान कर रहे हैं बैंक मेनेजर ,आप कह देते सरकार तो मिल जाता ,जमीन है हमारे पास" |शायद आंसुओं पर भी असहमति का गुण नहीं आया था मेरे मित्र को ,उसने खुद को थोडा सा संयत करते हुए कहा 'अच्छा चुप हो जाओ ,चलो हम अपने पास से पैसे देते हैं तुम एक भैंस खरीद लो '| शुभकुमारी को ये जवाब मंजूर नहीं था " नहीं सरकार हमें चार ही भैंस चाहिए ,एक भैंस से कुछ नहीं होगा "|मित्र ने कुछ पल को सोचा और कहा "जाओ ,तीन दिन बाद आना ,हम बात करते हैं मैनेजर से ,जाओ अपनी दरखास्त की फोटो स्टेट कराकर ले आओ" |शायद शुभकुमारी को ये जवाब भी अच्छा नहीं लगा उसने कहा "'साहब ,अब मत दौडाईयेगा थक गए हैं ,शुभकुमारी ने ये कहते हुए अपने आंसू पोछे और दरखास्त लेकर बाहर निकल गयी "|

शुभकुमारी के निकलने के बाद अन्दर का वातावरण बेहद शांतथा जिसे मेरे मित्र की रौबदार आवाज ने ठहाकों के साथ तोड़ दिया ,"जानते हैं आप आवेश जी' ? मैं अचंभित था उस ठहाके पर ,क्या ?मैंने किसी बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ को तलाशने के अंदाज में पूछा |लेकिन जो जवाब था वो उससे भी बढ़कर |मित्र ने धीमे से कहा 'शुभकुमारी लोन के पैसे से भैंस नहीं खरीदेगी ,वो पैसे लेकर दिल्ली जायेगी और वहां आई..ए .एस की कोचिंग करेगी '!अरे !हाँ सही कह रहा हूँ ,विश्वास न आये तो तुम पूछ लेना ,वो पढ़ी लिखी ही नहीं विश्वविद्यालय की टॉपर है "|"ऐसा कैसे ?यार दे दो उसे ,जो दो नंबर की सरकारी कमाई है उसमे से दे दो "मैंने कहा |इसके पहले की हम सवाल जवाब में और उलझते शुभकुमारी कागज़ लेकर फिर अन्दर आ गयी ,इस बार मेरी निगाहें उसके दरखास्त पर थी ,जिस पर बेहद सुन्दर अक्षरों में लिखे दो शब्द ,टेबल पर पहुँचने से पहले मेरी आँखों में टंग गए 'आपकी दी गयी भैंस मेरे परिवार के लिए जीवनदान साबित होंगी ' |

इस बार मैंने अपना चेहरा शुभकुमारी की ओर किया एवं पूछ बैठा 'क्या तुम सचमुच भैंस खरीदोगी ?....."नहीं भैया ,भैंस नहीं खरीदूंगी ,पैसे लुंगी ,दिल्ली जाउंगी और पढ़कर आई..ए .एस बनकर आउंगी ,मेरी माँ ने नालियों की गन्दगी साफ़ करके मुझे पोस्ट ग्रेजुएट बनाया है,सभी प्रथम श्रेणी , पहले भी दिल्ली गयी थी कुछ पैसे लेकर जो मैंने ठोंगे बनाकर बेचकर इकट्ठे किये थे मगर अब वो ख़त्म हो गए हैं,लेकिन जाना है और बनकर दिखाना है" |शायद मेरा मित्र उसकी साफगोई और पैसे देने के मेरे तर्क से इस बार सहमत था ,उसने चश्मा उतारते हुए कहा "ठीक है ,तुम्हे हर महीने तीन हजार रूपए हम अपने पास से देंगे ,तुम कल आकर मुझसे १२ महीने के एडवांस चेक ले जाना ,जब तक पढना हो तब तक पढना" |"क्या ?.!!!!!!..................शुभकुमारी इस बार हंस भी रही ,रो भी रही थी ,उसने दरखास्त को हांथों में लिए और उनके साथ में उनमे बैठी चार भैंसों को चिंदी चिंदी करके फेंक दिया |मेरे दोस्त के आगे हाँथ जोड़े खड़ी शुभकुमारी ने जाते जाते कहा ''हमें मोहल्ले वाले भैंस कहते हैं ,शायद उसी की तरह मोटी और काली हूँ ,और कुछ काम भी नहीं करती ,इसलिए सोचा था पढने के लिए भैंस ही खरीदना ठीक होगा ,आपने हमें गाय समझा,इसका धन्यवाद |

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

चूल्हा ,चक्कड़ और चौथी दुनिया की कवितायें -२



चौथी दुनिया का मौसम आजकल बेहद खुशगवार है ,हो भी क्यों न ,शेफाली पाण्डेय ,जेनी शबनम ,आशा प्रकाश ,पारुल , शिखा वार्ष्णेय ,प्रीति टेलर ,कुसुम ठाकुर ,संगीता , सरीखे नामों ने समूची समकालीन कविता के उबाऊ स्वरुप को बदल कर रख दिया है यहाँ इन्टरनेट पर ये महिलायें जो कुछ भी लिख रही हैं ,वो हिंदी कविता के परम्परागत चेहरे को बदलने की अभिनव कोशिश है ,उनकी ये कोशिश रंग ला रही है वो पढ़ी जा रही हैं और खूब पढ़ी जा रही हैं ,ये सच है की खुद को हिंदी कविता का प्रतीक मानने वाली कलम अभी फिलहाल इन्हें और इनकी रचनाओं को स्वीकार नहीं कर पा रहा है या कहें उन्हें साथ लेकर चलने में उन्हें गुरेज है मगर ये कहना गलत नहीं होगा की जब कभी आधुनिक कविता की चर्चा होगी तो रसोईघर में बर्तनों के साथ लड़ाई कर रही ,या फिर दफ्तरों की दम तोड़ती कुर्सियों पर अपनी गृहस्थी को संजोने की महान कोशिश में जुटी इन महिलाओं की कविताओं को जगह न देना ,हिंदी और हिंदी कविता के साथ सबसे बड़ी बेईमानी होगी हमने कुछ समय पहले चंद कवियत्रियों के रचना संसार की चर्चा की थी ,आज हम फिर कुछ एक की कविताओं पर बात करेंगे ,जिनका हम जिक्र नहीं कर पा रहे हैं ,संभव है हमने उन्हें न पढ़ा हो ,लेकिन उनकी रचनाधर्मिता पर हमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है ,क्यूंकि हम जानते हैं की चौथी दुनिया के दरवाजे में घुसने के बाद घुटन ,पुरुषवादी समाज से उपजी कुंठाएं और संत्रास ख़त्म हो जाते हैं ,यहाँ हम उनको पढ़ रहे हैं जिन्होंने सिर्फ कविता लिखना नहीं ,१०० फीसदी जीना सीख लिया है


एक ऐसे वक़्त में जब हिंदी कविता से हास्य और व्यंग्य पूरी तरह से गायब हो चुका है ,ठेठ मंच हो या साहित्यिक पत्रिकाएं व्यंग्य के नाम पर सिर्फ पहचान बनाने और भीड़ जुटाने की जैसे तैसे कोशिशें की जा रही हो ,शेफाली पाण्डेय को पढना निस्संदेह बेहद सकून देने वाला होता है ,बच्चों को इंग्लिश पढ़ने वाली शेफाली के लिए कविता सिर्फ विचारों के उत्सर्जन का माध्यम नहीं है बल्कि खुद के और औरों के जिन्दा रहने के पक्ष में दिया गया हलफनामा है उनकी कविता सबकी कविता है वो सब्जियों के मोल भाव कर रही किसी आम महिला की कविता हो सकती है या महंगाई से सर पिट रहे दो जवान बेटियों के बाप की कविता उनकी खुद को बयां करती इस व्यंग्य की गंभीरता पर निगाह डालें -

सूनेपन से त्रस्त हूँ
वैसे बेहद मस्त हूँ
करीने से सजा है मकां मेरा
मैं इसमें बेहद अस्त-व्यस्त हूँ

जेनी शबनम जी की ग़जलें ,बादलों और हवाओं का रंग हैं ,धूप और साए की जुबान है जेनी की ग़जलों की सबसे बड़ी खासियत उनकी सरल भाषा है उन्होंने ग़जल को पारंपरिक क्लिष्टता और अपरिचित भाषा से मुक्त करके हर किसी तक पहुँचने का काम किया है उनकी बिम्ब रचना और प्रतीक चयन में अभिव्यक्ति की व्यापकता देखते ही बनती है , पति और बच्चों के साथ जिंदगी के हर पल को संजीदगी से जी रही जेनी जी की दो लाइनें ,उनकी ग़जलों के वजन को बयां करती हैं -

ख्यालों के बुत ने, अरमानों के होठों को चूम लिया
काले लिबास सी वो रात,तमन्नाओं की रौशनी में नहा गई

दिल्ली की सुनीता शानू एक स्थापित स्वतंत्र पत्रकार हैं , आप में से बहुत लोगों ने उन्हें देश की प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में पढ़ा होगा,मगर ये सब कुछ चौथी दुनिया में आकर ही संभव हुआ एक व्यंगकार के रूप में उनकी रचनाएँ ,मानवीय जीवन की कठोरता पर भरपूर प्रहार करती हैं ,जहाँ हम आप मौन हो जाते हैं और एक तरह की मानसिक ब्लोकिंग हो जाती है ,वहां से सुनीता की कविता शुरू होती है


उम्मीदों और खुशियों से भरी
एक मीठी सी धुन गाता हुआ वह
चलाये जा रहा था
हाथो को सटासट...

कभी टेबिल तो कभी कुर्सी चमकाते
छलकती कुछ मासूम बूँदें
सुखे होंठों को दिलासा देती उसकी जीभ
खेंच रही थी चेहरे पर

हर दिशा में दौड़ता
भूल जाता था कि
कल रात से उसने भी
नही खाया था कुछ भी...

झारखण्ड की पारुल रहने वाली पारुल की कविताओं का जिक्र किये बिना चौथी दुनिया का रचना संसार अधुरा है ,उनको पढ़ते हुए कभी निराला की याद आती है तो कभी दुश्याँ सामने आ खड़े हो जाते हैं सुश्री पारुल पुखराज के बारे में ताऊ रामपुरिया कहते हैं 'सुश्री पारुल जी यानि पारूल…चाँद पुखराज का से. वैसे तो उनके व्यक्तित्व के बारे मे उनका ब्लाग ही सब कुछ कह जाता है. उनके ब्लाग पर जाते ही एक शीतलता और संगीत की माधुर्यता का एहसास होता है. उनसे मुलाकात मे भी वैसी ही एक शांत, सौम्य और निश्छलता का एहसास हुआ.

प्राणप्रन से हो निछावर
बंदिनी जब कर लिया,
अंकुशों के श्राप से फिर
प्रीत को बनबास क्यों …

मौन हो जाये समर्पण
शेष सब अधिकार हों,
नेह का बंधन डगर की
बेड़ियाँ बन जाये क्यों…
-आशा प्रकाश को हमने कुछ दिनों पहले ही पढ़ा है लेकिन यकीन मानिये उनको पढने के बाद समकालीन कविता को लेकर मेरे मन का क्षोभ पूरी तरह से ख़त्म हो गयावो जो जीती हैं ,वो लिखती हैं ,उनके लिए कवितायेँ खुद को अभिव्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है ,वो कहती हैं अगर कवितायेँ न हो तो मैं जिन्दा न रहूँ अपनी बिटिया को लिखी उनकी एक कविता के कुछ अंश --

समय उड़ गया पंख लगा
अब कंधे तक मेरे आती है
जब उलझ कहीं मै जाती हूँ
वो मुझ को अब समझाती है
माँ मै हूँ उसकी लेकिन
वो मेरी माँ बन जाती है..


जमशेदपुर की कुसुम ठाकुर के लिए कवितायेँ जिंदगी को पूरी तरीके से जीने का सलीका है ,वो जब कवितायेँ नहीं लिखती हैं तो अपनी सहेलियों के साथ दीन -दुखियों की सेवा में खुद को लीन कर देती हैं ,उनकी कविता का भाषा पक्ष इतना स्वाभाविक है की उनकी हर कविता बेहद आसानी से पाठकों का अपना हिस्सा बन जाती है -

मैं ने भी तो किया प्रयास ,
शायद मेरा कुछ दोष ही हो ।
अब जो छूटा तो हताश हूँ मैं ,
पर मैं कैसे न स्मरण करूँ ?
माना वह अब करे विचलित ,
जिसको मैं याद करूँ हर पल ।
पर यह तो एक सच्चाई है ,
जो बीत गई उसे क्यों भूलूँ ?

शिखा वार्ष्णेय लन्दन से हैं ,वो उतनी ही अधिक घरेलू हैं जितनी हिंदुस्तान के किसी छोटे से कस्बे में रहने वाली कोई महिला ,शिखा के रचना संसार में सब कुछ मौजूद है इसे ग़जल ,मुक्तक या फ़िर कोई नाम देना बेईमानी होगा अगर आप सिर्फ़ कविता को महसूस करना चाहते हैं तो यहाँ आयें ,उन्हें पढ़ते वक्त ऐसा लगता है जैसे कविता के लिए कुछ भी असंभव नही है |उनकी ये पंक्तियाँ पढ़ें-


ताल तलैये सूख चले थे
कली कली कुम्हलाई थी
धरती माँ के सीने में एक दरार सी छाई थी
कब गीली मिटटी की खुशबु बिखरेगी सर्द
में कब बरसेगा झूम के सावन
ऋतू प्रीत सुधा बरसायेगी

प्रीति टेलर चौथी दुनिया का एक ऐसा नाम है ,जिसे पढना सभी को पसंद है वो कहती हैं ' .... शायरी ,कविता ,लघुकथाएं , कुछ जिन्दगी के स्पर्श करते लेख मेरे सपनों को व्यक्त करने का माध्यम बनते है जिन्हें मैं कलमबंद करके कागज़ पर बिखेर देती हूँ उसमे अपने विचारों के रंग भर देती हूँ ..'सच कहती हैं वो उनकी खुद के प्रति इमानदारी उनकी अपनी कविता में भी प्रतिबिंबित होती है -
दर्द तो बिकता है-

यहाँ हर गली हर मोड़ पर ,
खुशियोंकी फुहारें तो बहुत कम को नसीब होती है ,
अपने होठोंकी मुस्कुराहटोंको बांटते रहो हरदम ,
निगाहों को जो नम होती है ......