गुरुवार, 20 अगस्त 2009

बुर्का बैन और बवाल


आयशा आस्मिन अपने कॉलेज इसलिए नहीं जा रही हैं क्यूंकि उनके बुर्का पहनने पर प्रबंधन को ऐतराज है |'सच का सामना' में जारा अपनी अम्मी ,अब्बा और अपने मंगेतर के सामने अपने पूर्व प्रेमी के साथ शारीरिक संबंधों का सच हँसते हुए बयां कर रही हैं|शाहरुख़ नाराज हैं क्यूंकि अमेरिका को ' खान 'नाम आतंकवादियों के नाम जैसा लगता है , |ये तीन स्थितियां प्रतीक हैं हिंदुस्तान में आज के मुसलमान के सामाजिक ,मानसिक और धार्मिक मनःस्थिति की ,वो धर्म के प्रति कट्टर है भी और नहीं भी है ,कहीं कहीं उसमे हिन्दुओं से अधिक भीरुता है तो कहीं-कहीं तालिबानियों जैसी धार्मिक रुग्णता से वो अब भी बाहर नहीं आ पाया है ,देश में लगातार बदल रहे हालात ने आज मुसलमानों और गैर मुसलमानों के बीच की दूरी को तो कम किया है ,लेकिन ये भी सच है मुसलमानों का ही एक हिस्सा इस दूरी के कम होने के खिलाफ है ,वो इस निकटता के खिलाफ खुद से भी लड़ रहा है और शेष हिन्दुतान से भी लड़ रहा है |आयशा का बुर्का पहन कर विद्यालय जाने की जिद्द एक मामूली बात नहीं है ,बल्कि ये जिद्द बतलाती है की आज भी देश के मुसलामनों की एक बड़ी तादात अपने व्यक्तिगत और सामाजिक सरोकारों को धर्म के साथ ,और बेहद कट्टरता के साथ ही पूरा करना चाहती है ,यहाँ तक की अपने मौलिक अधिकारों को भी वो धर्म की चाशनी के साथ ही लेना चाहती है |यही धार्मिक अतिवादिता मौजूदा दौर में उसकी मुश्किलें बढा रही हैं |
अगर कभी आप बनारस के संपूर्णानंद संस्कृत विश्विद्यालय परिसर में जायेंगे ,तो ज्यादातर अध्यापक आपको धोती कुरता और चन्दन लगाये मिलेंगे ,वहां के छात्रों ने परिसर से भगवा प्रतीकों को बाहर खदेड़ने की कोशिश की मगर वो असफल रहे ,नतीजा ये पूरा विश्वविद्यालय हिन्दुओं के मदरसे में तब्दील होता चला गया , संस्कृत की पढाई में भगवा रंग कुछ इस तरह पड़ा कि परिसर से विद्वानों की पैदावार पूरी तौर से ख़त्म हो गयी |ऐसा ही कुछ देश के तमाम विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में हो रहा है वहां धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल खुलेआम किया जा रहा है | यहाँ सवाल न तो बुर्के का है न ही चन्दन टीके का ,बात सिर्फ ये है कि सार्वजनिक स्थानों पर धर्म के प्रतीकों का किस हद तक इस्तेमाल किया जाना चाहिए |कर्नाटका की घटना के सम्बंध में आयशा ने कहा है कि पहले कॉलिज स्टूडंट यूनियन के प्रेजिडंट ने उसके हेडस्कार्फ पहनने का विरोध किया। प्रेजिडंट ने कहा कि 'अगर तुम हेडस्कार्फ पहनना बंद नहीं करोगी तो हम लोग भी भगवा स्कार्फ बांध कर आएंगे।'और उसके बाद प्रिंसिपल ने लिखित रूप से उन्हें बुरका पहन कर विद्यालय न आने का फरमान सुना दिया |एक और मामला दक्षिण कन्नड़ जिले के उप्पिनांगडी के एक सरकारी कॉलिज का है। यहां के प्रिंसिपल ने सोमवार को 50 मुस्लिम छात्राओं को क्लास में महज इसलिए नहीं जाने दिया कि उन्होंने बुर्का पहन रखा था। प्रिंसिपल ने सभी स्टूडंट्स से एक कागज पर दस्तखत करवा लिए थे जिसमें कहा गया था कि वे यूनिफॉर्म पहनेंगे।अगर प्रबंधन द्वारा बुर्के पर प्रतिबन्ध महज विद्यालय से धार्मिक प्रतीकों को दूर करने के लिए की गयी है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए ,लेकिन अगर इस बात में कहीं से भी प्रबंधन का धर्म से जुड़ा पूर्वाग्रह है तो हम उसका पुरजोर विरोध करते हैं |ये बेहद खेदपूर्ण है कि परिसर में जींस टॉप पर प्रतिबन्ध लगने पर हो-हल्ला मचाने वाले तमाम संगठन आश्चर्यजनक तौर से इस असहज बुर्कानाशिनी पर अपने होंठ सी लेते हैं ,उन्हें बुर्के के पीछे छिपी आँखों की नाउम्मीदी नजर नहीं आती ,वहीँ नारी अधिकारों पर बात करने वाली तमाम एजेंसियों के लिए सवालों और जवाबों का दायरा सिर्फ हिन्दू स्त्रियों के इर्द गिर्द ही मौजूद है ,उनके पास न तो ऐसे सवालों के साथ खड़े होने का साहस है और न ही समय |हाँ ,शाहरुख खान के अपमान और जरा की सच्चाई पर जेरे बहस में सभी शामिल होना चाहते हैं |
मेरी एक इरानी मित्र हैं अजीन घहेरी शर्गेही ,वो तेहरान के एक प्रौद्योगिकी संस्थान से इंजीनियरिंग में पोस्ट ग्रैजुएशन कर रही हैं ,वो बताती हैं कि हमारे कॉलेज प्रबंधन ने हम लड़कियों के लिए स्कूल में स्कार्फ पहनकर आना अनिवार्य कर दिया तो विद्यालय के सभी छात्र -छात्रों ने एक साथ कक्षाओं का बहिष्कार कर दिया,वो कहती हैं 'जब हम इस कट्टरपंथी देश में घर और बाहर जींस पहनते हैं और वो हमारे लिए आरामदेह है तो कॉलेज में क्यूँ न पहने '?|हिंदुस्तान में मुस्लिम अविवाहित लड़कियों पर अलग से बातचीत बहुत कम की जाती है ,मेरे एक मुस्लिम मित्र अनवर ने कुछ दिनों पहले अल्पसंख्यक महिलाओं में शिक्षा की स्थिति पर एक लेख लिखा था ,और उसने इसके लिए मुस्लिम समुदाय में धर्म के नाम पर जबरन थोपी जा रही दुश्वारियों को जिम्मेदार बताया था ,ये सही भी है भारी तादात में मुस्लिम लड़कियां ऊँची तालीम हासिल सिर्फ इसलिए नहीं कर पाती क्यूंकि उन्हें बचपन से ही ताउम्र पर्दादारी के लिए तैयार किया जाता है और इस पर्दादारी के लिए पुरुषों के अपने तर्क होते हैं उन तर्कों पर की जाने वाली टिप्पणियों को वो कभी बर्दाश्त नहीं कर पाते |तालिबानियों ने भी पिछले दिनों जब स्वात घाटी पर अपना कब्जा जमाया तो सबसे पहले लड़कियों के विद्यालयों को बारूद से उडा दिया ,कम उम्र की छात्रों को बुर्कानशीं बनाना कहीं न कहीं से उसी मानसिकता का प्रतिबिम्ब है |आयशा के कालेज के प्राचार्य एस. माया का कहना है कि उसे स्पष्ट तौर पर कह दिया गया है कि कक्षा में बुर्का पहनने की इजाजत नहीं दी जाएगी। हमारे कालेज में 23 और मुस्लिम छात्राएं हैं, लेकिन कोई बुर्का नहीं पहनती। हम किसी छात्र को उसके धर्म के प्रतीक वाली पोशाक पहनने की इजाजत नहीं दे सकते। मंगलूर विश्वविद्यालय के कुलपति का कहना है कि कालेज से इस प्रकरण पर जवाब मांगा गया है। जवाब मिलने के बाद ही वह कोई कार्रवाई करेंगे। कुलपति ने यह भी कहा कि आयशा चाहे तो वह दूसरे कालेज में दाखिला दिलवाने में उसकी मदद कर सकते हैं। जानकारी मिली है की आयशा के अभिभावकों ने ने ऐसे कालेज में दाखिला कराने की कोशिश शुरू कर दी है, जहां बुर्का पहनने पर कोई आपत्ति न उठे।
अभी कुछ ही दिन हुए जब फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने अपने देश में बुर्के पर प्रतिबन्ध लगाये जाने का ऐलान करते हुए अपने देश की संसद में कहा था की 'हम अपने देश में ऐसी महिलाओं को नहीं देख सकते जो पर्दे में कैद हों, सभी सामाजिक गतिविधियों से कटी हों और पहचान से वंचित हों। यह महिलाओं की गरिमा के हमारे विचार से मेल नहीं खाता।मगर, साथ ही, सारकोजी ने यह भी कहा कि 'हमें गलत लड़ाई नहीं लड़नी चाहिए। हमें हर हाल में यह सुनिश्चित करना चाहिए कि फ्रांस में इस्लाम धर्म को मानने वाले लोगों का भी उसी प्रकार सम्मान हो जैसा किसी भी दूसरे धर्म के लोगों का होता है।हमारे यहाँ हिंदुस्तान में स्थिति फ्रांस से बिलकुल अलग है वहां के राष्ट्रपति को इस्लाम के सम्मान को सुनश्चित करने का वक्तव्य संसद में देना पड़ता है ,हिंदुस्तान का चरित्र ही सर्व धर्म समभाव वाला है ,मगर अफ़सोस, वहां पर कडाई से बुर्के पर प्रतिबन्ध लगा दिए जाते हैं और हमारे यहाँ अगर कहीं इस पर आपति की जाती है ,तो अपने नंबर बढाने में लगे राजनैतिक दल ,खुद को मसीहा साबित करने में जी जान से जुटे धार्मिक संगठन और खुद को निरपेक्ष साबित करने का घटिया खेल - खेल रहे चैनल्स अलग अलग तरीके से इसका विरोध करने लगते हैं |ये अति है हमें कुछ भी पहनने -ओढ़ने और अपने धर्र्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल की स्वतंत्रता होनी चाहिए ,लेकिन हमें स्वतंत्रता की व्यक्तिगत और सार्वजानिक किस्मों को भी समझना होगा ,देश की महिलाओं का ,और हम सभी का भला इसी में है |

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

ब्लागर्स पार्क में रिसते रिश्ते

वो डरते हैं कि रिश्तों के रिसाव से जुडा सच, उनकी निजता को भंग कर देगा |वो डरते हैं अपनी पहचान बताने में !उन्हें डर हैं अभिव्यक्ति पर रिश्तों के गहराते असर से !उन्हें लगता है सच के सामने आने से उनकी बेबाकी ,बेईमानी में तब्दील होकर सबके सामने आ जायेगी !मुझे आज ब्लोगिंग करते करीब ६ महीने हो गए ,.पिछले ३-४ दिनों से पहले मित्र सुरेश चिपलूनकर के अपने ब्लॉग और फिर विवेक भाई की चिटठा चर्चा में की गयी पोस्टिंग प्रकाशित होने के बाद ,यहाँ इन्टरनेट पर और इन्टरनेट के बाहर मेरी अपनी दुनिया में जो जो मैंने सुना ,समझा और पढ़ा ,यकीं मानिए मुझे बेहद हताश करता है |हमने कभी कहा नहीं लेकिन ये सच है कि यहाँ हिंदी ब्लाग्स की दुनिया में भी ,समय के साथ साथ नए नए किस्म के रिश्ते ,समुदाय और ग्रुप पनप रहे हैं ,ये रिश्ते उन रिश्तों से अलग हैं जिनकी चर्चा विवेक सिंह ने की है | ये सिर्फ दुनिया से अलग गांव बसाने वाली जैसी बात नहीं है बल्कि उन गांवों में कई टोले बनाने जैसा है ,इसके बावजूद टुकडों टुकडों में बटें टोलों के लोग जो आज लिख रहे हैं वो हिंदुस्तान के इतिहास में अभिव्यक्ति का सबसे प्रभावशाली अध्याय है ,यहाँ न सिर्फ बेहद साफगोई से निजता बांटी जा रही है ,बल्कि खुद को १०० फीसदी उडेला जा रहा है |मगर ये भी सच है कि इन रिश्तों ने समय के साथ साथ संगठित होकर दूसरे टोलों पर वार करने का शर्मनाक तरीका सीख लिया है,पहले समानांतर मीडिया में और हिंदी साहित्यकारों के बीच ही ऐसा होता था |

अगर आज किसी को निजता के सामने आने से डर है तो उसकी वजह भी सिर्फ यही प्रतिघात है |ऐसे में होता ये है कि बहुत कुछ ऐसा पढ़ा नहीं जा पाता जिनको पढना और न सिर्फ पढना बल्कि उन ब्लाग्स के कंटेंट में खुद को शामिल करना ,हमारी नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए थी |मैं नाम नहीं लेना चाहूँगा अभी पिछले दिनों एक ब्लॉगर साथी की एक अश्लील पोस्टिंग पर को लेकर जबरदस्त अभियान छेड़ दिया गया ,हुआ यहाँ तक कि पहले काउंटर पोस्टिंग छपी गयी फिर फ़ोन कर करके उस ब्लॉगर के खिलाफ कमेन्ट मांगे गए ,मैं भी वैसी पोस्टिंग से दुखी हुआ था ,पर क्या ये ठीक नहीं होता कि उन्हें एक मेल करके उनसे पोस्टिंग हटा लेने को कहा जाता न कि तथाकथित तौर पर खुद को नारीवादी साबित करने के लिए उसे बहिष्कृत करने की साजिश की जाती |अगर चिटठा चर्चा में छपी विवेक सिंह की चर्चा निजी है तो उस ब्लोगर के खिलाफ छेडा गया अभियान उसकी निजता के साथ किया गया बलात्कार था |
मैं अपने एक ब्लोगर साथी को कभी भूल नहीं पाता जिसने मुझे मेरी पहली पोस्टिंग के वक़्त कहा था कि 'अगर तलवार न हो मुनासिब तो ब्लॉग निकालो '|मुझे याद है मेरा वो मुस्लिम दोस्त बटाला हाउस काण्ड के बाद निर्दोषों के खिलाफ की गयी कार्यवाही को लेकर अपने ब्लॉग पर की गयी पोस्टिंग का जिक्र करते वक़्त रो पड़ा था ,उसने कहा था कि हमने अपने ब्लॉग में कुछ भी निजी नहीं रखा ,मेरा सब कुछ सबके लिए है ,लेकिन शायद अब ये संभव न होसके ,ऐसे में अब ब्लॉग लिखना इमानदारी नहीं होगी ,आज उसने पिछले ६ महीने से एक भी पोस्टिंग नहीं की |मेरा मानना है कि अगर आप अपनी निजता के खोने के खतरे से इनते चिंतित हो तो घर बैठकर विभिन्न विषयों पर अपने मित्रों और रिश्तेदारों से चचाएँ कर लो ,ब्लॉग लिखने की आखिर क्या जरुरत ?वैसे ये भी बड़ा आश्चर्य है कि मित्र को मित्र ,पति को पति भाई को भाई और प्रेमी को प्रेमी मानना तमाम खतरे खडा कर देता है |अब ये तो मुनासिब नहीं है कि आप रिश्तों को बदल दोगे ,क्या फर्क पड़ जाता है अगर कविता वाचक्नवी की जगह रचना सिंह नारी को अपना ब्लाग कहती हैं या फिर रवि रतलामी ब्लागर्स के भीष्म पितामह हैं यहाँ समस्या सिर्फ निजता की नहीं है बल्कि ब्लागवाणी में खुद की टी.आर.पी और ब्लागरों के बीच मची घुड़दौड़ से भी जुडी हुई है |जिन में सभी खुद को और अपने टोलों को विजयी देखना चाह्ते हैं |आत्मप्रशंसा और अपने टोलों की प्रशंसा में अभिव्यक्ति ,अधूरी रह जाती है ,अगर मसला सिर्फ यहीं तक रहता तो ठीक था लेकिन उसके बाद शुरू होने वाला मल्लयुद्ध हमेशा निराशाजनक रहता है |

सच तो ये है सभी ब्लॉगर जानते हैं किसकी रीढ़ कितनी सीधी है ,जब कभी आप निजता को बचाने की कोशिश करते हैं तो वो कभी उदय प्रकाश ,कभी पिंक चड्ढी तो कभी आपकी टिप्पणियों के बहाने उघड जाती है और ऐसे किसी बहाने से निजता पर से पर्दा हटता रहता है |सभी अपनों और अपने जैसों को जानते हैं ,जो नहीं जानते हैं उन्हें जाने की कोशिश करनी चाहिए ,स्वतंत्रता और निजता दोनों साथ साथ नहीं रह सकते |और हाँ सुरेश जी इलेक्ट्रोनिक मीडिया के जिन नामचीन चेहरों के रिश्तों का अपने ब्लॉग में खुलासा किया है वो हिन्दू विरोधी हैं कि नहीं मैं ये नहीं जानता ,लेकिन हाँ उनके चेहरों से रिसती हुई पिब देख सकता हूँ ,जिस वक़्त महाराष्ट्र का सिरफिरा नेता हिंदी भाषियों को लाठी ,जूतों से पिटवाता है ठीक उस वक़्त राजदीप सरदेसाई मराठी भाषा में 'लोकमत 'चैनल शुरू कर देते हैं |खुद को निरपेक्ष और लिक से अलग दिखाने की निरंतर कोशिश में लगे प्रणब राय हिंदी ,हिन्दीभाषी पत्रकारों , हिंदी पढने वालों और हिंदी के कार्यक्रमों को देखने वालों पर अपनी अंग्रेजी सोच जबरन थोपकर और उन्हें दूसरे दर्जे पर रखकर ,अब तक की सबसे बड़ी सांस्कृतिक हत्या करते हैं |ये सब इसलिए है कि मीडिया का हिस्सा होकर भी इन लोगों ने खुद को भीड़ का हिस्सा नहीं बनाया |आज अगर वो हिस्सा होते तो शायद उनके रिश्तों से उनकी पहचान नहीं होती |ब्लॉगर साथियों ,हिंदी भाषियों की एक भारी भीड़ हमारे पीछे खड़ी है ,वो जरुरी नहीं कोई साहित्यकार ,कवि ,पत्रकार या लेखक हों ,उनमे वो लोग भी शामिल हैं ,जिनके होंठ अब तक सिले हुए थे और खुद को अभिव्यक्त न कर पाना उन्हें तिल तिल कर मार रहा था ,आइये उनको भी साथ लेकर चलें ,अपना सब कुछ बांटते हुए |जिनमे आपकी निजता भी शामिल है |

सोमवार, 3 अगस्त 2009

हत्याओं के बीच तुम्हारी हत्या


प्रमिला के पेट पर पुलिस की लाठियों की चोट अब एक बड़ा घाव बन गयी है ,डॉक्टर कहते हैं कि अब वो जीवन में कभी दुबारा माँ नहीं बन सकेगी,पुलिस ने प्रमिला के साथ साथ उसके पांच साल के बेटे के हाथों को भी पीट-पीट कर लहू लुहान कर दिया था |रामसकल अब सपने देखने से डरता है,उसे डर है कि अब अगर उसने सपने में भी वो वाकया देखा तो वो मर जायेगा लगभग ५ साल पहले अरबपति आदित्य बिडला के अतिथिगृह में आलोक सिंह नाम के उत्तर प्रदेश के एक नामचीन आई.पी,एस ने उसे छत से उल्टा लटकाकर पहले ४ घंटे तक बेरहमी से पीटा फिर उसके कनपटी पर रिवाल्वर लगाकर उससे फर्जी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए,सिर्फ इतना ही नहीं बन्दूक की नोक पर उन लाशों की शिनाख्त करवा दी गयी जिनकी हत्या का आरोप उसके सर पर मढा जाना था ,उसका कसूर सिर्फ और सिर्फ इतना था कि उसने पुलिस कि मुखबिरी करने से साफ़ इनकार कर दिया था | आप यकीं करें न करें छत्तीसगढ़,उत्तर प्रदेश ,बिहार और झारखण्ड समेत देश के सभी नक्सल प्रभावित राज्यों में नक्सली उन्मूलन की कवायद बेकसूरों की हत्याओं का जरिया बन गया है। माओवादियों द्वारा मुखबिरों की हत्या का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। वहीं मुखबिरी से इंकार करने वालों के खिलाफ पुलिसिया दमन चक्र सारी हदें तोड़ रहा है। उत्तर प्रदेश ,जहाँ नक्सलवाद कि पैदावार पिछले एक दशक के दौरान तेजी से बढ़ी है वहां स्थिति और भी गंभीर है शिवजी व उसके बेटे को नक्सलियों ने गोली मार दी तो वहीं नौगढ़ की गर्भवती फुलझड़ी व प्रमिला को पुलिस ने लाठियों से पीट बेदम कर दिया। हाल यह है कि नक्सलवाद के खात्मे के लिए हर वर्ष करोड़ों रूपए खर्च किए जाने के बावजूद नतीजा सिफर है।

  • नक्सली संगठनों की मुखबिरी के लिए ग्रामीणों पर पुलिस का आपराधिक दबाव


  • 4 साल में 14 हत्याएं और खर्च 140 करोड़ रूपए। यह है पूर्वी उ.प्र. में नक्सली उन्मूलन का लेखा-जोखा। अफसोस, ये हत्याएं हुई हैं जिन्हें कभी धमकी तो कभी पैसे का लालच देकर माओवादियों की मुखबिरी में इस्तेमाल किया गया। तथाकथित नक्सलियों की गिरफ्तारी का दावा कर खुद अपनी पीठ ठोक रही पुलिस, निरीह ग्रामीणों की बलि चढ़ा रही है।
    हाल यह है कि चन्दौली, सोनभद्र व मीरजापुर के घोर नक्सल प्रभा
    वित इलाकों में आदिवासी गिरिजनों के सिर पर हर वक्त मौत का साया मंडरा रहा है। अगर मुखबिरी से इंकार करते हैं तो पुलिस उन्हें नक्सली घोषित कर देती है और अगर नक्सलियों की मुखालफत की तो किसी भी वक्त उन्हें छह इंच छोटा कर दिया जाता है। इस मामले का अमानवीय पहलू यह है कि पुलिस द्वारा इस खतरनाक काम में न सिर्फ युवाओं का बल्कि छोटे बच्चों व महिलाओं का भी इस्तेमाल किया जा रहा है।

    बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि पूर्व में उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुखबिरों की बकायदा मोबाइल गैंग बना रखी थी जिसमें 100 से अधिक लोग शामिल थे। उन निरक्षर आदि
    वासियों को जासूसी के लिए मोबाइल देने का कितना फायदा हुआ यह तो पता नही, पर उनमें से कुछ को तो नक्सलियों ने बेदर्दी से जरूर मार डाला, वहीं ज्यादातर ने दहशत में खुद ही जिला बदर कर लिया। पूर्वी उ.प्र. में नक्सली उन्मूलन के नाम पर बेगुनाहों की बलि चढ़ाई जा रही है। शिवजी सिंह, भोला नरेश अगरिया, राधेश्याम, देवेन्द्र, लल्लन कुशवाहा इत्यादि वो नाम है जिन्हें मुखबिरी के शक में नक्सलियों ने बेरहमी से मार डाला।

    सोनभद्र के पन्नूगंज स्थित केतारगांव के ग्रामीण बताते हैं कि पुलिस ने हमारे गांव के शिवजी को जबरन मुखबिर बनाया था। जयराम बेहद डरा हुआ था आखिर वही हुआ जि
    सका भय था। संजय कोल के गिरोह ने न सिर्फ शिवजी बल्कि उसके बेटे का भी बेरहमी से कत्ल कर दिया। गांव वाले कहते हैं कि अब फिर पुलिस वाले हमसे मुखबिरी करने को कह रहे हैं। शाम ढलने के बाद कोई भी पुलिस टीम जंगल में नहीं रहती लेकिन हमें माओवादियों की टोह लेने जंगल में ढकेल दिया जाता है। चिचलिया के राम बदन कहते हैं कि माओवादियों ने पूरे कैमूर के इलाके में मोबाइल रखने पर प्रतिबंध लगा दिया है। परन्तु पुलिस हम पर मोबाइल देकर जासूसी करने का दबाव डाल रही है, साहब पार्टी वाले हमें मार डालेंगे।’

    मुखबिरी के इस खेल में पुलिस का अमानवीय रवैया सारी हदें तोड़ रहा है, जो भी ग्रामीण सहयोग से इंकार करता है उसे या तो झूठे मुकदमे में फंसा दिया जाता है या फिर उसका शारीरिक, मानसिक उत्पीड़न प्रारम्भ हो जाता है। नौगढ़ की लक्ष्मी बताती है कि पुलिस द्वारा हमसे लगातार नक्सलियों के लोकेशन के बारे में जानकारी मांगी जा रही थी। जब हमने इनका किया तो उन्होंने न सिर्फ लाठी से दौड़ा-दौड़ा कर पीटा बल्कि मेरे बेटे को भी नक्सली बताकर गिरफ्तार कर लिया। वो कहती है, 'मैं कहां से पता लगाऊं नक्सलियों का? अब ईश्वर भी हमारी नहीं सुनता।’नौगढ़ की ही विमला की कहानी और भी दिल दहला देने वाली है वो बताती है कि मुखबिरी से इंकार करने पर मेरी गर्दन और बाल पकड़ कर पुलिस के जवान मुझे घर से बाहर निकाल लाए। मुझे तब तक पीटा गया जब तक लाठी टूट नहीं गई। विमला की साथी फुलझड़ी जो कि गर्भवती थी के पेट पर लाठियां बरसाई गईं वहीं उसे बचाने पहुंचे उसके पांच साल के बेटे के हाथों को लहुलूहान कर दिया गया। कसूर सिर्फ इतना कि इन महिलाओं ने मुखबिरी से इनकार कर दिया था।

    सोमवार, 27 जुलाई 2009

    सच का सामना :लाइव विथ मोचीराम


    साथियों ,सच का सामना में आज हमारे सामने हैं मोचीराम ,हंसिये मत यही नाम है इनका |इनको विश्वास है कि ये सच का सामना कर सकेंगे |हम हमेशा की तरह पूछेंगे २१ सवाल ,सही जवाब देने पर इन्हेमिलेंगे १ करोड़ रुपए |हमारा पहला सवाल मोचीराम आपके लिए , तुमने कितने दिन से खाना नहीं खाया ?'साहब दो दिन हो गए ,घर में एक दाना नहीं है ,पूरी फसल सूखे की भेंट चढ़ गयी ,क्या करूँ ?कहाँ जाऊं ?सही जवाब तुम जीतते हो दस हजार |बीस हजार रुपयों के लिए दूसरा सवाल 'क्या तुमने कभी चोरी की है ?.....................................चुप्पी.....................,जी की है | देखते हैं पोलीग्राफ मशीन क्या कहती है ?..ये जवाब सच है ,क्यूँ की थी चोरी ? भूख लगी थी तो पंसारी की दूकान से आटा और उस आते से रोटी पकाने के लिए जंगल से लकडी चोरी की थी सरकार ,लेकिन पुलिस रिकार्ड में ७० चोरियां दर्ज हैं.|.................... |अब हम पूछते हैं तीसरा सवाल ,तैयार हो तुम ?'जी हाँ ,सरकार ,पूछें '|ठीक है ,ये बताओ क्या तुमने कभी अपने ३ साल के बच्चे को पीटा है ?सवाल बेहद मुश्किल है सरकार ,जी हाँ पीटा है ,'जिदिया गया था हाट में बिस्कुट के लिए ,लेकिन पीटने के बाद घर आकर हम भी रोये थे साहब '|बिलकुल सही जवाब ,बेहद शानदार खेल रहे हो तुम मोचीराम अब बताओ चौथे सवाल का जवाब "तुम्हारे सामने अगर गाँव का कलेक्टर खाना खा रहा हो तो क्या करोगे ?अरे साहब ये कैसा सवाल ?सच कहूँ तो थाली छीन लूँगा |पोलीग्राफ मशीन क्या कहती हो तुम ??सही जवाब अब एक लाख रूपए से तुम सिर्फ एक सवाल दूर हो तुम मोचीराम ,पांचवां सवाल .'तुमने अपनी बीबी को रोटी के लिए बेचा की नहीं ?ब्लागरों आप बजर दबा सकते हो |हाँ बताओ 'जी हाँ बेचा था ',देखते हैं पोलीग्राफ मशीन क्या कहती है ? |ये जवाब सच है .तुम जीत गए हो एक लाख रूपए मोचीराम |बताओगे क्यूँ बेचना पड़ा था ?जमीन रेहन रखे रहे सरकार पैसा नाही दे पाए ,तो साहूकार घर पर चढाई आकर दिया रहा ,क्या करते इज्जत बचाने के लिए इज्जत बेचनी पड़ी.|ब्लॉगर साथियों बहुत अच्छा खेल रहे हैं मोचीराम .देखते हैं वो सच का सामना कहाँ तक कर पाते हैं ,आगे मंजिल मुश्किल है राहें कठिन ,ब्रेक के बाद एक बार फिर हम उनसे मुखातिब होंगे |


    ...............कैडबरी सेलेब्रेशन यानी प्यार का सगुन.......... केलोक्स कोर्न्फ्लेक्स ६ अलग अलग स्वादों में ,अब सबके लिए अलग अलग स्वाद ..........वैरी वैरी सेक्सी .................................आज रात देखिये राखी का स्वयंबर ,तीन दुल्हों के बीच फंसी राखी आखिर किसके गले में वरमाला डालती है |..........|

    एक बार फिर हाजिर हैं हम सच का सामना में |आपके सामने हॉट सिट पर बैठे हुए हैं मोचीराम ,जिन्होंने अब तक शानदार खेला है ,मोचीराम अब आगे सवाल और भी कठिन होते जायेंगे ,आप किसी भी वक़्त खेल छोड़कर जा सकते हैं ,अगला सवाल मोचीराम क्या आपने कभी आत्महत्या करने को सोचा है ? जी हां सोचा है ,बार बार सोचता हूँ |देखते हैं पोलीग्राफ मशीन का जवाब, ये जवाब सच है ,क्यूँ सोचते हैं ऐसा मोचीराम ?सरकार न घर ,न छत ,न रोटी छोटे बच्चे और उस पर कमर तोड़ता कर्ज ,क्या करूँ सरकार और कोई चारा नहीं |हमारे सामने बैठी हैं मोचीराम की पत्नी .क्या उन्होंने आपको कभी बताया कि वो आत्महत्या करना चाहते थे ?जी हाँ हम पूरे परिवार के साथ मरना चाहते थे |सातवाँ सवाल मोचीराम आपने कभी बन्दूक उठाने को सोचा है ?जी हाँ .लाल सलाम कहकर और बन्दूक उठाकर रोटी मिल जाये तो क्यूँ न कहूँ ?ये जवाब सच है |आपका जवाब सच है मोचीराम ,कुछ कहना चाहेंगे इसके बारे में ,साहब नक्सली नहीं बनेंगे तो पुलिस बना देगी ,बन ही जाएँ तो बेहतर है |मोचीराम आप चुनावों में वोट देते हैं की नहीं ?जी साहब ,वोट तो पड़ता है ,जो पैसा दे देता है २००-४०० ,उसी के नाम पर बटन दबा देते हैं ,अगला सवाल मोचीराम ,आपकी बहन का बलात्कार जब विधायक के बेटे ने किया था क्या आप वहां मौजूद थे ?.....................................जी हाँ ,था मैं ,पोलीग्राफ मशीन ,ये जवाब .................सच है |,क्या हुआ था 'सरकार घर से काम करने निकल थी मेरे साथ, रास्ते में पकड़ लिया नेता जी के बेटा ने ,हमें बहुत मारा था ,हम कुछ नहीं कर पाए बाद में बहन भी बयान से पलट गयी |क्या खूब खेल रहे हैं मोचीराम आप अब १० लाख रूपए से महज २ कदम दूर हैं |अगला सवाल क्या आपको यकीं है कि आपकी पत्नी से पैदा हुए बच्चे आपके अपने हैं ?जी हाँ यकीं है ,पोलीग्राफ मशीन जवाब दो ,|ये जवाब................ सच है ,वाह मोचीराम ,क्यों तुम्हे यकीं है सच में ?जी हाँ |झूट गाँव के लिए है ,पर मेरे लिए सच है |तुम ये खेल बीच में छोड़कर जा सकते थे, खैर |तुम देश का मतलब समझते हो मोचीराम ?जी हाँ समझता हूँ |मोचीराम ये है १० लाख रुपये के लिए अगला सवाल ,क्या तुम्हे यकीं है कि तुम आजाद देश के नागरिक हो ?जी हाँ ,है यकीं |देखते हैं पोलीग्राफ मशीन क्या कहती है |ये जवाब ..................................................अरे ये तो कुछ भी नहीं बोल रही !मोचीराम ,तुम्हे क्या हुआ ,कुछ तो बोलो ,ब्लॉगर साथियों आप ,आप भी चुप हैं !