शनिवार, 28 मार्च 2009

आजाद भारत का गांधी


वो देश के पहले प्रधानमन्त्री पंडित नेहरु का वंशज है ,वो महात्मा गाँधी के नाम की चादर ओढ़ कर देशज राजनीति की सरमायादारी का दावा करने वाले परिवार का एक सदस्य है ,वो उस माँ का बेटा है जिसे गाय का दूध पीना भी हिंसक लगता है,परन्तु अपने पुत्र की शाब्दिक हिंसा से उसे कोई ऐतराज नहीं वो उसे गर्व का विषय मानती है ,वो उस पिता का पुत्र है जो सत्तर के दशक में परदे के पीछे देश के अघोषित प्रधानमंत्री का किरदार निभा रहा था और उस वक़्त देश का अल्पसंख्यक त्राहिमाम कर रहा था ,ये वो व्यक्ति है जिसे शिव सेना का सुप्रीमो ये कह कर सम्मान करता है कि ये वो गाँधी है जिसे हम पसंद करते हैं ,वो उस राजनैतिक दल की नुमाइंदगी करता है ,जिसकी वादाखिलाफी और बड़बोलेपन ने राष्ट्रीय राजनीति में उसे हाशिये पर धकेल दिया है |जी हाँ ये वरुण गाँधी है ,वो वरुण गाँधी जिसका लोकसभा में पहुंचना लगभग तय है ,उसने देश के मुसलमानों को को पकिस्तान भेजे जाने और हिंदुओं की तरफ उठे हर हाथ को काट देने की बात कही और अपनी विजयश्री सुनिश्चित कर ली |कल को वो देश का प्रधानमन्त्री ,किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री या फिर कोई कैबिनेट मिनिस्टर भी हो सकता है |लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स के लोकतान्त्रिक और भेदभाव रहित वातावरण में शिक्षाप्राप्त वरुण ने पीलीभीत में जो कहा वो सिर्फ एक बचकाना बयान नहीं था ,विवादास्पद बयान के बाद जमानत की अर्जी वापस लेने और न्यायलय में उपस्थित होने के दौरान किया गया हाई प्रोफाइल ड्रामा,उस रणनीति का हिस्सा था जिसका इस्तेमाल भारतीय राजनीति में आम हो गया है ,यानि कि अगर आगे बढ़ना है तो विवाद में रहो |सच ही तो है आज समाचार चैनलों ,अखबारों की सुर्खियों और राजनैतिक गैर राजनैतिक मंचों पर वरुण और सिर्फ वरुण की चर्चा है | यहाँ पर सवाल सिर्फ वरुण के बयान और उसके बाद पैदा की गयी परिस्थितियों का नहीं है सवाल ये भी है कि ऐसे माहौल में जहाँ वोटों का निर्धारण उम्मीदवार की कट्टरता और उसकी विवादित छवि से होता हो ,चुनावों के नतीजे कितने पारदर्शी होंगे ?और क्या उन नतीजों की लोकतांत्रिक व्याख्या करना संभव होगा?
ये बात तो पूरी तरह से साफ़ है कि ये सारा खेल पूरी तरह से सुनियोजित है ,ये भी साफ़ है कि वरुण का बयान और उसके बाद की ड्रामेबाजी उत्तर प्रदेश में नेस्तनाबूद हो चुकी भाजपा के पॉलिटिकल गेम प्लान का हिस्सा है ,इस पूरे मामले के बाद प्रदेश में अगर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ता है तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए |साथ में ये भी तय है कि आने वाले दिनों में वरुण अपने इसी बयान की माफ़ी मांगेंगे ,लेकिन तब तक काफी देर होचुकी होगी .दिल तब भी टूटे थे जब बाबरी मस्जिद टूटी थी,दिल तब भी टूटे थे जब गुजरात में निर्दोष हिन्दुओं कि सामूहिक हत्या के बाद ,बदले की कार्यवाही में हजारों मुस्लिम भी मारे गए थे ,दिल तब भी टूटे थे जब देश में लगातार सीरियल बम्ब ब्लास्ट किये जा रहे थे .अगर राजनीति विज्ञानं में इस पूरे सन्दर्भ की मीमांसा की जाए तो लगता है जैसे देश में अलग अलग जगहों पर अलग अलग दलों के प्रभुत्व की वजह सिर्फ उनको मिलने वाला जन समर्थन नहीं है बल्कि भीड़ का वो स्तरीकरण है जिसमे कोई एक दूसरे पर भारी हो जाता है ऐसे में ये कहना ग़लत नही होगा कि लगभग सवा अरब की जनसँख्या वाले भारत में लगभग आधी आबादी डर डर के साँसे ले रही है वो हिन्दू,मुस्लिम,सिख किसी की साँसे हो सकती हैं ,वो डर वरुण ,तोगडिया ,मोदी ,जगदीश ,सज्जन ,शाहबुद्दीन ,मुख्तार ,राज ठाकरे किसी का भी हो सकता है |ऐसे में कहाँ लोकतंत्र कैसा लोकतंत्र ?

जिस वक़्त मेनका गाँधी के पुत्र वरुण पीलीभीत की अदालत में आत्मसमर्पण कर रहे थे ,ठीक उसी वक़्त दिल्ली में सी.बी.आई ८४ के सिख दंगों में शामिल जगदीश टाईटलर के खिलाफ चल रही न्यायिक कार्यवाही वापस लेने के लिए कोर्ट में हलफनामा दे रही थी |वैसे तो इन दोनों घटनाओं में कोई साम्यता नहीं दिखती ,लेकिन अगर गहराई से देखा जाये तो ये साफ़ पता चलता है की इन दोनों घटनाओं का राजनैतिक नफा ,देश के दो बड़े राजनैतिक दल पूरे मनोयोग से भजायेंगे ,एक ने इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद दिल्ली की सड़कों पर भीड़ को ललकार कर भारी तादात में सिखों की बलि ले ली तो दूसरा भगवा झंडे के नीचे हिन्दुओं की तरफ उठे हर हाँथ को काट देने की बात करता है , अपने पुत्र के बयान पर उसकी पीठ ठोंकने वाली मेनका हास्यास्पद ढंग से कहती हैं कि ८४ के दंगों में अपनी भूमिका को छिपाने के लिए कांग्रेस वरुण के खिलाफ विषवमन कर रही है ,वहीँ दूसरी तरफ उन दंगों को लेकर कांग्रेस की हर वक़्त शिनाख्त परेड करने वाले आडवानी इस बड़बोले युवक को पोस्टर ब्वाय बताकर अपने नंबर बढाने में लगे हैं |वहीँ दूसरी तरफ कांग्रेस वरुण के बयान को राष्ट्रीयता के लिए खतरा बताकर निरंतर आलोचना तो कर ही रही थी उसकी गिरफ्तारी को पॉलिटिकल प्लान बताकर मुस्लिम वोट बैंक पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने कि कोशिश कर रही है |

जैसे जैसे वक़्त बीत रहा है वरुण के समर्थन में बोलने वालों की तादात लगातार बढती जा रही है ,तमाम तथाकथित हिंदूवादी संगठन वरुण के समर्थन में आ खड़े हुए हैं ,प्रवीण तोगडिया ने ऐलान किया है कि पीलीभीत में हिन्दुओं पर मुसलमानों के कारण जो अत्याचार चल रहा है, उसका मुनासिब जवाब दिया जायेगा ,भाजपा के मुस्लिम चेहरे भी वरुण की आलोचना के बाद खुद ही अपना सर पिटते हुए उनके समर्थन में बोल रहे हैं । इन सबके बीच सारे न्यूज़ चैनल वरुण को पॉलिटिकल आइकन बनाकर प्रस्तुत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं ,चुनाव की अन्य खबरें गायब हैं ,मेरे एक पत्रकार मित्र कहते हैं कि 'वरुण की बयानबाजी के बाद उस पर कि जाने वाली आलोचना -प्रत्यालोचना से वोटों के ध्रुवीकरण का खेल शायद नहीं खेला जा सकता था अगर खबरिया चैनलों ने उसे प्रचारित न किया होता '.खुद भाजपा के सीनियर नेता बलबीर पुंज कहते है कि 'वरुण समाचार चैनलों के लिए राष्ट्रीय नेता हैं ,भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्तर का नेता बनने में उन्हें समय लगेगा '.ऐसे में सिर्फ वरुण के बयान को विषवमन बताकर ये चैनल अपनी नैतिक जिम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ सकते,पीलीभीत में कल की घटना के दौरान २० लोग घायल हुए ,भीड़ की उग्रता के पीछे कैमरों की उपस्थिति भी एक बड़ी वजह थी ,कल को अगर बवाल और भड़कता है तो उसकी एक वजह ख़बरों को जबरन पैदा करने की ये कवायत भी होगी ,जिसमे जानबूझ कर वरुण गाँधी और उसकी पार्टी को अतिरिक्त लाभ देने की कोशिश की जा रही है |ये बात सारे चैनलों को पता है कि उनकी ये तथाकथित साफगोई चुनाव नतीजों पर व्यापक असर डालने जा रही है |

हिंदुस्तान में लोकतंत्र घिसट घिसट कर चल रहा है,अगर किसी से अपेक्षा थी तो देश के युवाओं से ,मगर अफ़सोस युवाओं के नाम पर हमारे पास सिर्फ और सिर्फ गाँधी परिवार की आज की पीढी ही बची है ,बाकी जो लोग हैं उनके पास न तो बोलने को शब्द है न देखने को आँखें या फिर ये कहिये हम बोलना चाहते ही नहीं |वरुण का बयान डेमोक्रेसी के उस मैकेनिस्म का टूटना है जिस पर देश टिका हुआ था और जिसे बनाये रखने की जिम्मेदारी हम युवाओं पर थी |मुझे धूमिल की वो कविता साँसे लेती हुई नजर आ रही है जिसमे वो कहते हैं -
वो धड से सर ऐसे अलग करता है
जैसे मिस्त्री बोल्ट से नट अलग करता है
तुम कहते हो हत्याएं बढ़ रही हैं
मैं कहता हूँ मैकेनिस्म टूट रहा है

गुरुवार, 26 मार्च 2009

माओवादियों का मायामोह


आतंकी हमलों से थर्रा रहे देश में लोकतंत्र की हत्या की तैयारियां शुरू हो गयी है ,कत्ल भी उन हाथों के द्वारा जिन्हें हमने ,खुद पर शासन करने का अधिकार दिया गुंडों माफियाओं को संसद और विधानसभाओं के गलियारों का सुख दिलाने में फिलहाल कोई राजनैतिक दल पीछे नहीं है लेकिन हम जो आपको आज सुनाने जा रहे हैं वो हिन्दुस्तान के ,मौजूदा राजनैतिक परिदृश्य की हकीकत है तो लोकतंत्र में विश्वास रखने वालो के मुँह पर तमाचा, ये वो सच है जिससे हम राजनीति का सबसे खौफनाक अध्याय कह सकते हैं उत्तर प्रदेश की सत्ता संभालने वाली बहुजन समाज पार्टी ने पहले दलितों से परहेज किया फिर सर्वजन का नारा देकर उसे भी किनारे कर अपराधी-माफियाओं का साथ लिया और अब जैसे जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आता जा रहा है बसपा ने देश भर में अशांति फैलाने वाले नक्सलियों का साथ लेना शुरू कर दिया है .लोकतान्त्रिक देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए किस्म किस्म के अलोकतांत्रिक तरीके अख्तियार करने से मुख्यमंत्री मायावती चूक नहीं रही ,चुनावी महासमर में माफियाओं की हनक को भुना रही बसपा आतंक का सृजन करने वाले माओवादियों से मदद लेने में भी हिचक नहीं रही .देश में रक्तक्रांति के बल पर समता स्थापित करने की बात कहने वाले माओवादियों ने इस लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को समर्थन देने का फैसला किया है इससे न केवल बसपा बल्कि नक्सली संगठनों के वैचारिक दिवालियेपन का पर्दाफाश हो रहा है देश के आदिवासी इलाकों में इससे नए किस्म का तनाव पनप रहा है ,सो अलग.
माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के टॉप कैडर उत्तर प्रदेश,बिहार झारखण्ड,मध्य प्रदेश और बिहार के अति नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बसपा प्रत्याशियों के पक्ष में माहौल तैयार कर रहे हैं ,हथियार बंद नक्सली गांव -गांव घूम घूमकर ग्रामीणों को बसपा के पक्ष में मतदान करने का हुक्म सुना रहे हैं और वोट न देने की स्थिति में आदिवासियों को सजा भुगतने की धमकी दी जा रही है. गौरतलब है की बहुजन समाज पार्टी ने झारखण्ड के गढ़वा सीट से पिछले उप चुनाव में कुख्यात नक्सली व पांच लाख के इनामी एरिया कमांडर कामेश्वर बैठा को मैदान में उतारा था हालाँकि उत्तर प्रदेश के नौगढ़ इलाके में पी.ए.सी की ट्रक उडाने के साथ साथ ७० से ज्यादा पुलिसकर्मियों की हत्या का आरोपी चुनाव जीतने में असफल रहा माओवादियों के समर्थन से बसपा अति उत्साहित है स्थिति का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि मायावती ने घोर नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है जबकि बसपा का वहां जनाधार नही है,वहीँझारखंड,बिहार,मध्यप्रदेश में भी उन्ही सीटों पर उमीदवार खड़े किये जा रहे हैं जिन पर नक्सालियों का आतंक चरम पर है.
जहाँ तक उत्तर प्रदेश का प्रश्न है दलितों की मसीहाई का दावा करने वाली बसपा कुख्यात नक्सालियों के दम -ख़म पर आदिवासी-गिरिजनों के वोट हासिल करेगी नक्सली कमांडर शत्रुघ्न की मौत के बाद उत्तर प्रदेश -बिहार -झारखंड सब जोनल एरिया की बागडोर थामे लाल्व्रत कॉल ,मुन्ना विश्वकर्मा एवं कमलेश चौधुरी का गैंग कई टुकडियों में गांव -गांव घूम रहा है एवं बैठकें कर आदिवासी दलितों का माइंड वाश कर रहा है आदिवासियों में नक्सलियों का आतंक इस कदर है कि कई इलाकों में सारे के सारे वोट बसपा के पक्ष में फिक्स हो रहे हैं इस बात की भी पक्की खबर है कि नक्सल प्रभावित राज्यों में बसपा के संभावित प्रत्याशियों ने अपने अपने माध्यमों से नक्सली संगठनों को समर्थन का पैगाम भेजा है यहाँ तक कि इस पूरे गठजोड़ की जानकारी बसपा के शीर्ष लीडरों को भी है ,यह भी पता चला है कि चुनावों के दौरान माओवादियों ने उन सभी सीटों पर किसी भी वारदात को अंजाम न देने का फैसला किया है ,जिन सीटों पर बसपा के प्रत्याशी मैदान में हैं समझा जाता है कि इसके एवज में पुलिस किसी भी वाँछित नक्सली पर कोई कार्यवाही नहीं करेगी ,यह भी हो सकता है कि माओवादी उत्तर प्रदेश में अगले दो सप्ताह के दौरान अपने कुछ कारकूनों को पुलिस के सुपुर्द कर दे,सूत्रों से खबर मिली है कि पिछले एक सप्ताह के दौरान नक्सली कमांडरों ने उत्तर प्रदेश की बिहार से सटी सीमा में घुसकर आधा दर्जन बैठके की हैं ,हालाँकि पुलिस इससे साफ़ इनकार कर रही है पूरे देश में लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का विरोध करने वाले नक्सली बहुजन समाज पार्टी का जिस किसी कीमत पर समर्थन कर रहे हैं ,इसका खामियाजा आने वाले समय में पूरे देश को भुगतना पड़ सकता है.

मंगलवार, 17 मार्च 2009

लोकतंत्र के उत्सव में चुनाव आयोग का मर्सिया



विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली लोकतंत्र में नयी सरकार का गठन होने को है ,एक बार फिर चुनावी महाभारत में जनता को अपने मताधिकार के अस्त्रों का प्रयोग करना है लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण के मतदान में अब जबकि मात्र ३० दिन रह गए हैं फिर भी पूरे देश में चुनाव का माहौल कहीं नजर नहीं आ रहा है ,अलबत्ता समूचे देश में विकास और कल्याण की योजनाओं पर पाबंदी जरुर लग गयी है ,आचार संहिता लागू होने से प्रत्याशियों और पार्टियों का वास्तविक खर्च कम हुआ है या नहीं हुआ है ये तो अलग विषय है लेकिन जनता के लिए मुश्किलों का एक और दौर शुरू हो गया है आलम ये है की लोकतंत्र का उत्सव चुनाव आयोग की नीतियों की वजह से आम हिन्दुस्तानियों का मर्सिया बना गया है चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था होते हुए भी नौकरशाहों द्वारा ही संचालित होती है .भारत में नौकरशाही हर मामले में दमनकारी और दंडात्मक प्रक्रिया अपनाती है चुनावों के मामले में भी यही हो रहा है ये क्या कम शर्मनाक है कि आयोग के लम्बे चौडे दावे के बावजूद देश की आधी आबादी अपने मताधिकार का ही प्रयोग नहीं कर पाती ,मगर आयोग शर्म से अपना मुँह पीटने के बजे लोकतंत्र का मसीहा बन जाता है
अभी पिछले महीने में उत्तर प्रदेश के भदोही जनपद में उपचुनाव की कवरेज कर रहा था ,उस दौरान पूरे विधान सभा क्षेत्र में पेयजल की समस्या काफी चर्चा में थी वहां फ़रवरी माह के प्रारंभ में ही आचार संहिता लागू कर दी गयी ,सूखे हुए और टूटे हुए हैण्ड पम्पों की मरम्मत का काम पुलिस ने रोक दिया ,जल निगम के वाहनों को मरम्मत के सामान सहित थाने में खडा कर दिया गया ,इसके बाद लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लागू हो गयी ,इस इलाके में दो माह तक हैण्ड पम्प सूखे रहेंगे ,और लोग बूँद बूँद को तरसेंगे ये तो केवल एक बानगी है समूचे देश में बुनियादी जरूरतों को लेकर हाहाकार की स्थिति है ,अगले तीन महीनो तक देश के नौकरशाह सीने पर मूंग दलेंगे और ये हालात बने रहेंगे अब आप ही बताइए की क्या हैण्ड पम्पों की मरम्मत से भी आचार संहिता का उल्लंघन होता है ?क्या दूर दराज के गांवों में डाक्टर्स के जाने से आचार संहिता का उल्लंघन होता है ?
चुनाव प्रचार के प्रमुख उपकरण हैं झंडे ,पोस्टर ,बैनर ,पर्चे , ध्वनि विस्तारक यन्त्र आदि ,हम सब पर पाबंदी है ,यदि हम किसी पार्टी के समर्थक है तो हमें अपने घर पर झंडा लगाने से क्यों रोका जाना चाहिए ?पूरे विश्व में चुनाव प्रचार के दौरान झंडों का प्रयोग किया जाता है ,सार्वजानिक जगहों पर पूरे पांच साल तक होर्डिंग्स लगते हैं ,अभी चुनावों की घोषणा से ठीक पहले पूरे लखनऊ शहर में केवल मायावती और अखिलेशदास ही नजर आ रहे थे ,वहीँ दिल्ली शीला दिक्षित और सोनिया गाँधी के बैनरों से पटी पड़ी थी ऐसे में चुनाव के दौरान सशुल्क होर्डिंग्स क्यूँ नहीं लगाये जाने की इजाजत दी जाती दरअसल झंडे पोस्टरों के बिना चुनाव का माहौल नहीं बन पाता,न तो छोटी मोटी सभाएँ हो पाती हैं और न तो प्रचार जोर पकड़ता है ,चुनाव आयोग एक तरह का मार्शल ला लगाकर मतदाताओं से अधिकतम वोट प्रतिशत की उम्मीद करता है ,ये कैसे संभव है ?
सच तो ये है की देश के एक चौथाई मतदाता सूचियों की खामी के कारण वोट नहीं डाल पाते अब तक एक पूरी आबादी को पहचानपत्र नहीं मिला ,इसको लेकर कोई इमानदार कवायद कभी नजर नहीं आई दरअसल चुनाव प्रचार का जो खर्च अभी तक कार्यकर्ताओं तथा अन्य लघु व्यापारियों तक पहुँचता था वह अब वोट के ठेकेदारों को मिल जाता है ,जाति और सम्प्रदाय के दावेदारों तथा दलालों का कोई नुक्सान नहीं होता,टीवी चैनलों पर अरबों के विज्ञापन आ रहे हैं किन्तु गांवो शहरों में सन्नाटा है , लोकतंत्र के उत्सव का यह उदास चेहरा जन-संवाद को भी नीरस बना देता हैचुनावों को स्वच्छ और निष्पक्ष बनाये रखने के लिए न तो विकास कार्य रोकने की जरुरत है न तो बैनर,पोस्टर सभा पर पाबंदी लगाना आवश्यक है ,जनसंपर्क और जन संवाद का खुला माहौल बनाना भी आयोग का कर्त्तव्य है